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काम करने का माहौल किस देश में बेहतर?
- Author, लेनॉक्स मॉरिसन
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
हर देश, हर समाज का अपना मिज़ाज होता है. वहां की संस्कृति होती है. ये सब ना सिर्फ़ वहां के लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में नज़र आता है, बल्कि वहां के कारोबार पर भी इसका असर नमूदार होता है.
मिसाल के तौर पर, इस्लाम को मानने वाले देशों में शुक्रवार को छुट्टी होती है, क्योंकि इस दिन सभी को कुछ मज़हबी रस्में अदा करनी होती हैं. इसी तरह जितने यूरोपियन देश हैं, वहां रविवार की छुट्टी होती है. क्योंकि इस दिन ज़्यादातर लोग चर्च जाते हैं. जब एक संस्कृति के लोग किसी दूसरे देश में जाते हैं तो वहां के माहौल में खुद को ढालना आसान नहीं होता. उन लोगों को एक झटका सा लगता है.
पांच साल पहले चीन की निवासी शनशन ज़ू चीन से नीदरलैंड गई थीं. दरअसल वो पश्चिमी देशों में काम करने का तजुर्बा लेना चाहती थीं. यहां उन्होंने एक बड़ा फ़र्क़ देखा.
चीन में लोग दिन में काम से दो घंटे की छुट्टी लेते हैं. इस दौरान वो दोस्तों-रिश्तेदारों के साथ कहीं बाहर खाना खाने, मौज-मस्ती करने जाते हैं. कुछ लोग दो घंटे के लिए अपने घर आराम करने ही चले जाते हैं. लेकिन पश्चिमी देशों में किसी के पास समय ही नहीं. वहां किसी कर्मचारी को 30 मिनट का वक़्त भी बहुत मुश्किल से मिलता है. ऐसे में अगर किसी को चीन से निकल कर किसी पश्चिमी देश में काम करना पड़े तो उसे दिक़्क़त हो सकती है.
पश्चिमी देशों से जो लोग चीन काम करने आते हैं, उन्हें अंग्रेज़ी मीडिया हर तरह से आगाह करता है कि वहां काम करने आने पर उन्हें माहौल बदलने का सदमा झेलना होगा. मगर बहुत से चीनी जो पश्चिमी देशों में काम करने जाते हैं उन्हें वहां का माहौल देखकर झटका लगता है.
चीन से बड़ी संख्या में लोग दूसरे देशों में पढ़ने और काम के लिए जा रहे हैं. उन्हें इस तरह से गाइड नहीं किया जाता. बहुत सी कंपनियां भी चीन से बाहर निकल कर दूसरे देशों में अपना कारोबार बढ़ा रही हैं. ये कंपनियां अपने साथ भरोसे के लोगों को ले जा रही हैं. 2005 के मुक़ाबले 2015 में अकेले अमरीका ने ही चार गुना ज़्यादा चीनी कर्मचारी और उनके परिवारों को वीज़ा दिया है.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एरिक थून का कहना है कि आजकल चीन की कंपनियां बड़ी तेज़ी से बाक़ी दुनिया में अपना कारोबार बढ़ा रही हैं. ऐसे में दूसरे देशों को चीन में काम करने के तौर तरीक़े को समझना होगा.
येफिंग ली चीन में पले बढ़े हैं. लेकिन अब इंग्लैंड में रहते हैं. इनके मुताबिक़ पश्चिमी देशों में आकर चीनी लोगों को सबसे बड़ा झटका तब लगता है, जब एक छोटे से काम के लिए भी उन्हें लंबा इंतज़ार करना पड़ता है. मिसाल के लिए अगर चीन में कोई अपना बैंक खाता खुलवाना चाहता है, तो उसका काम फ़ौरन हो जाएगा.
येफिंग ली, प्रॉपर्टी का बिज़नेस करते हैं और काम के सिलसिले में अक्सर चीन जाते रहते हैं. वो कहते हैं कि चीन में कारोबार करना बेहद आसान है. लोग अपने काम से ब्रेक भी ख़ूब लेते हैं. लेकिन जब काम होता है, तो उसे पूरा करके ही घर जाते हैं. मिसाल के लिए चीन में अगर आप को कोई प्रॉपर्टी लेनी है तो आप अगले ही दिन उसे ले सकते हैं. उसके लिए भारत या किसी और देश की तरह लंबी चौड़ी प्रक्रिया से नहीं गुज़रना होगा.
12 साल पहले चीन से आकर बेल्जियम में बसने वाले जैक चेन अपना तजुर्बा बताते हैं. वो कहते हैं कि चीन में काम के बीच से छुट्टी लेना और वीक एंड पर काम करने का चलन आम है. जबकि बेल्जियम में ऐसा नहीं है. वीक एंड दोस्तों और परिवार के लिए होता है.
दुनिया में शायद ऐसा कोई देश नहीं है जहां ऑफ़िस में राजनीति ना होती हो. लेकिन चेन का कहना है यूरोपियन देशों में ज़्यादा ऑफिस पॉलिटिक्स नहीं होती. इसके मुक़ाबले चीन में ऊंचे दर्जे के लोग और मुलाज़िमों के बीच बहुत फ़ासला होता है. ये ओहदे के साथ-साथ सामाजिक दर्जे का भी होता है.
चीन में बॉस की अलग अहमियत होती है. उससे दूसरे कर्मचारियों को डर कर रहना पड़ता है. इसलिए अपनी राय देने में भी उन्हें सावधानी बरतनी पड़ती है. वहीं पश्चिमी देशों में सभी कर्मचारियों के विचारों का ख़्याल रखा जाता है.
कर्मचारी बिना किसी ख़ौफ़ के अपनी बात रख सकते हैं. अगर कोई आइडिया बहुत काम का नहीं है तो भी कभी उस कर्मचारी को नीचा नहीं दिखाया जाता. अगर बॉस के किसी आइडिया से दूसरे मुलाज़िम इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते तो भी वो उसका विरोध करने के लिए आज़ाद होते हैं. यहां अपने बॉस के साथ वो हंसी मज़ाक़ भी कर सकते हैं. लेकिन चीन में कर्मचारियों को अपने बॉस से डर कर रहना पड़ता है.
हांगकांग में लोगों को दफ़्तर के कामकाज की ट्रेनिंग देने वाले प्रोफ़ेसर डेसमंड सो का कहना है कि चीनी लोग खूब मन लगा कर काम करते हैं. लेकिन जब बात अपनी राय रखने की आती है तो चीनी इसमें काफ़ी पिछड़ते नज़र आते हैं. वो अपनी बात मज़बूती से नहीं रख पाते.
डेसमंड कहते हैं हम चीनी लोगों को सिखाते हैं कि कैसे वो आगे बढ़ कर अपने आइडिया दें. वो अपनी कामयाबी का श्रेय खुद आगे बढ़ कर लें. क्योंकि, पश्चिमी देशों के कारोबारी माहौल में खुद को बाज़ार के मुताबिक़ ढालना ज़रूरी है. वहां लोग सेल्फ़ मार्केटिंग में विश्वास रखते हैं.
चीन में इसी घुटन के माहोल की वजह से जो लोग चीन से निकल आते थे और वापस कम ही जाते थे. लेकिन हाल के कुछ वर्षों में अब चीन में भी हालात बदले हैं. अपने घर लौटने की तड़प लोगों में बढ़ी है. शेरोन-जिन बीजिंग में पैदा हुए थे. और 20 साल पहले अमरीका आकर बस गए थे.
लेकिन, अब जो नौजवान दूसरे देशों में जा रहे हैं, वो कुछ अर्से वहां कमाने के बाद वापस अपने देश आने लगे हैं. फिलहाल जो चीनी युवा अमरीका में रह रहे हैं उनका कहना है कि आज का चीन किसी भी लिहाज़ से अमरीका से कम नहीं. बीस साल पहले हालात और थे. आज चीन में रोज़गार के अच्छे मौक़े मिलने लगे हैं. चीन एक बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर ख़ुद को स्थापित कर रहा है. लिहाज़ा अब लोग अपने घर लौट कर अपने परिवार के बीच रहना पसंद कर रहे हैं.
चीन के शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक़ 2015 में चीन से क़रीब 5 लाख 23 हज़ार 7 सौ छात्र विदेशों में पढ़ने गए थे. इसमें से 70 से 80 फ़ीसद छात्र वापस अपने देश आ गए. क्योंकि अब अपने ही देश में रोज़गार के अच्छे मौक़े मिलने लगे हैं.
(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)
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