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ऑफ़िस में ग़ुस्सा आए तो क्या करना चाहिए?
- Author, एलिसन बैरेन
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
ऑफ़िस में काम करना आसान नहीं है. तरह-तरह के लोगों से आपका वास्ता पड़ता है.
कुछ लोग अगर दोस्ती करने लायक़ मिलते हैं तो कुछ लोग ऐसे भी मिलते हैं जो अक्सर आपके ग़ुस्से का सबब बनते हैं.
ग़ुस्सा आने पर आपका दिल चाहता है जितनी शिद्दत से आप चीख चिल्ला कर अपना गुस्सा निकाल सकते हैं निकाल लें. लेकिन अफ़सोस आप ऐसा भी नहीं कर सकते. क्योंकि ये ऑफिस की तहज़ीब के ख़िलाफ़. यहां तो आपको शांत और संयमित रहना पड़ता है.
हां बहुत ग़ुस्सा आने पर झुंझला कर लोगों को जवाब दे सकते हैं. लेकिन वो भी एक हद तक. आपको अपने क्रोध पर क़ाबू रखना ही पड़ता. अगर ऐसा नहीं करेंगे तो हो सकता है आपको नौकरी से हाथ ही धोना पड़ जाए.
ब्रिटिश मनोचिकित्सक लूसी बेरेसफोर्ड कहती हैं कि हमारे साथ काम करने वाले करीब 83 फ़ीसद कर्मचारी ऑफिस में ग़ुस्से का शिकार होते हैं.
कुछ इसी तरह के आंकड़े अन्य रिसर्च में भी पाए गए हैं. अपना ग़ुस्सा निकालने के लिए जब किसी पर वश नहीं चलता तो ऑफिस के कंप्यूटर, प्रिंटर या अपने से कमज़ोर कर्मचारियों पर अपनी नाराज़गी निकालने लगते हैं.
ये समस्या किसी एक देश की नहीं है. बल्कि कमोबेश हर देश में लोग इस परेशानी से जूझते हैं. इसीलिए ऐसे तरीक़े तलाशे जा रहे हैं जिनके ज़रिये आप अपना ग़ुस्सा भी बाहर निकाल सकते हैं. और नौकरी में भी बने रह सकते हैं.
इसी साल मार्च महीने में ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में एड हंटर नाम के शख्स ने 'द ब्रेक रूम' नाम से एक हॉल बनाया. लोग यहां आकर लोग अपना ग़ुस्सा निकाल सकते हैं.
लेकिन इसके लिए आपको अपनी जेब हल्की करनी होगी. यहां बेस बॉल बैट लेकर आप चीज़ों के साथ तोड़-फोड़ कर सकते हैं और अपनी नाराज़गी ख़त्म कर सकते हैं.
हमें बचपन से ये सिखाया जाता है कि चीज़ें नहीं तोडनी चाहिए क्योंकि उनके टूटने के बाद फिर से खरीदना पड़ेगा. पैसे बेवजह खर्च होंगे. लेकिन इस 'रेज रूम' में या ग़ुस्से वाले कमरे में आकर आप बेधड़क कोई भी चीज़ तोड़ सकते हैं. जिसके पैसे आपने दिये हैं. आपका ग़ुस्सा भी निकल जाएगा और मज़ेदार खेल भी हो जाएगा.
जुलाई 2015 में स्टीपन श्यू नाम के एक शख्स ने कनाडा के टोरंटो में बैटल स्पोर्टस नाम से एक रेज रूम खोला था. स्टीफ़न कहते हैं कि ग़ुस्सा निकालने के लिए लोगों को दफ़्तर का सामान तोड़ने में काफ़ी मज़ा आता है. जैसे प्रिंटर या कंप्यूटर. क्योंकि ये दफ़्तर की नुमाइंदगी करते हैं. इसी का फ़ायदा उठाने के लिए स्टीफ़न ने बैटल स्पोर्ट्स नाम से कंपनी खोली है.
ये रेज रूम धीरे-धीरे सारी दुनिया में बढ़ते जा रहे हैं. हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में रेज रूम खुला है. वहीं, अमरीका के टेक्सस और डलास शहरों में भी ये गु़स्सा निकालने वाली जगहें बनाई जैसे ह्यूस्टन में ''टैंट्रम एलएलसी'' या जैक्सनविल का स्मैश शैक.
लेकिन यहां आने वाले ग्राहकों को एक डिस्कलेमर साइन करना पड़ता है. साथ ही चेहरे पर एक नक़ाब और हाथों में दस्ताने पहनने पड़ते हैं. ये सब ग्राहकों की हिफ़ाज़त के लिए ही किया गया है.
ऐसे ग़ुस्सा निकालने वाले कमरों में वक्त बिताने के लिए ग्राहकों को कई तरह के पैकेज भी दिये जाते हैं. जैसे 10 से 45 मिनट अगर रेज रूम में बिताने हैं तो उसके लिए आपको 20 डॉलर से लेकर 100 डॉलर तक ख़र्च करने होंगे. बहुत से लोग लंबे वक़्त के लिए बुकिंग भी करते हैं. साथ ही वो उस सामान की बुकिंग भी करते हैं जिसे पर वो अपना ग़ुस्सा निकालना चाहते हैं.
ऑस्ट्रेलिया में काम का दबाव यहां कंपनी के मालिक और कर्माचारी दोनों के लिए ही फिक्र की बात बन गई है. 2013 में सेफवर्क ऑस्ट्रेलिया नाम की एक संस्था ने एक सर्वे किया था. जिसके मुताबिक़, कर्मचारियों के गुस्से की वजह से ऑस्ट्रेलिया को क़रीब दस अरब ऑस्ट्रेलियन डॉलर का नुक़सान उठाना पड़ता है.
बैटल स्पोर्ट्स के स्टीफ़न श्यू का कहना है लोगों को प्रिंटर पर ग़ुस्सा निकालना शायद ज़्यादा पसंद हैं. तभी तो उनके बैटल रूम में हफ्ते भर में करीब 15 प्रिंटर इसका शिकार होते हैं. स्टीफ़न के मुताबिक़ उनके सत्तर फ़ीसद ग्राहक महिलाएं होती हैं.
बैटल स्पोर्टस रेज रूम में आने वालों की संख्या अच्छी खासी है. यहां किसी खास उम्र के लोग ही नहीं आते हैं बल्कि 19 साल के बच्चों से लेकर 50 साल से ज़्यादा की उम्र के लोग भी आते हैं. ब्रेक रूम में जो ग्राहक आते हैं उनमें ज़्यादातर पेशेवर लोग हैं.
यूं तो ऐसे रेज रूम की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है. पर कुछ मनोवैज्ञानिक इसे सही नहीं मानते. अमरीका की ओहायो यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर ब्रैड जे बुशमैन का कहना है चीज़ों पर ग़ुस्सा निकालना, कोई अच्छी बात नहीं है.
बल्कि गुस्से में कुछ भी नहीं करना ज़्यादा बेहतर तरीक़ा है. जब आपको गुस्सा आता है तो आपका ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है, दिल की धड़कन बढ़ जाती है. और जब चीज़ों को तोड़कर गुस्सा निकालते हैं तो गुस्सा उससे कम नहीं होता बल्कि बढ़ जाता है. ग़ुस्से की आदत बनी रहती है. जिस बात की वजह से ग़ुस्सा आया होता है वो बात आपके ज़ेहन से नहीं निकलती.
ग़ुस्से पर क़ाबू पाने का बेहतर तरीक़ा ये है कि जब भी ग़ुस्सा आए तो खुद को ऐसे काम में व्यस्त कर लें जिससे आपको खुशी मिले. एक से दस तक गिनती गिनकर, या गहरी सांस लेकर भी नाराज़गी को नियंत्रित किया जा सकता है.
आप कोई मज़ाक़िया फ़िल्म या कार्टून देख सकते हैं. जिससे आपका मूड बदलेगा. आप अपना पसंदीदा संगीत भी सुन सकते हैं. ग़ुस्सा आने पर आप कोई पहेली हल करने का काम भी शुरू कर सकते हैं. इससे ध्यान बंटेगा. जिस वजह से ग़ुस्सा आ रहा हो, उसके बारे में नए नज़रिए से सोचने की कोशिश भी आप कर सकते हैं.
स्टीफ़न श्यू का भी यही कहना है. रेज रूम आपके गुस्से को निकालने का एक तरीक़ा हो सकता है लेकिन ये स्थाई इलाज नहीं है. ये सिर्फ एक विकल्प है.
(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)
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