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अबला नारी की तरह प्रताड़ित हुई हॉकी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक पूर्व हॉकी खिलाड़ी होने के नाते मुझे निराशा तो उसी समय हुई थी जब चिली में हुई क्वालीफ़ाइंग प्रतियोगिता में हम जीत नहीं पाए थे. ये पहला मौक़ा है जब हॉकी टीम ओलंपिक में नहीं जा रही है. हमें इसका काफ़ी सदमा है. ओलंपिक में हॉकी टीम नहीं जा रही है. ये काफ़ी शर्म की बात है. भारत की ओलंपिक में चर्चा तो हॉकी के बिना होती ही नहीं है. लेकिन अब ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम नहीं जा रही है. हमें दुख तो है लेकिन ये शर्म की भी बात है कि इतना बड़ा देश होने के बावजूद हम क्वालीफ़ाई तक नहीं कर पाए. हम नाकाम हुए और ऐसे नाकाम हुए कि हम ओलंपिक में भी हिस्सा नहीं ले पा रहे हैं. हॉकी के साथ बहुत दिनों से नाइंसाफ़ी हो रही थी. ऐसे लोग हॉकी फ़ेडरेशन से जुड़े रहे, जिनका हित हॉकी से जुड़ा नहीं था बल्कि उनका अपना ख़ुद का हित था. प्रताड़ना लोग हॉकी फ़ेडरेशन से जुड़कर विदेश जाते थे, अय्याशी करते थे, घूमते थे- लेकिन इन सबके बीच हॉकी की दुर्दशा हो गई. हॉकी इतना प्रताड़ित हुई कि आख़िर में उसने दम तोड़ दिया. इसके लिए किसी को चिंता नहीं हुई. मैं तो मानता हूँ कि हॉकी अबला नारी की तरह एक-एक का दरवाज़ा खटखटाया. सरकार के पास गई, मीडिया, प्रेस...सबके पास. लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है कि कोई भी उसके साथ खड़ा नहीं हुआ. फ़ेडरेशन, अधिकारी, सरकार- सभी मूक दर्शक बने रहे. हॉकी पिटती रही और आज ये हाल है कि हॉकी इस स्थिति में पहुँच गई है. जब तक नई फ़ेडरेशन नहीं बनाई जाती. उम्मीद नहीं हो सकती. फ़ेडरेशन में सही आदमी आना चाहिए. अभी तक तो ऐसा नहीं लग रहा है कि कोई परिवर्तन आ गया हो. जब तक भारतीय खेलों में सुधार नहीं होगा, तब तक कुछ नहीं होगा. (पंकज प्रियदर्शी से बातचीत पर आधारित) |
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