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भारतीय हॉकी में सुधार से रिक का मोहभंग | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ऑस्ट्रेलियाई पूरी दुनिया में लड़ने और जीतने के लिए जाने जाते हैं. लेकिन ऑस्ट्रेलियाई हॉकी के महान खिलाड़ी रहे रिक चार्ल्सवर्थ ने मात्र छह महीने में ही हार मान ली और भारतीय हॉकी को अप्रासंगिक बनने से बचाने से अपने को अलग कर लिया. उनके ऐसा करने का कारण चाहे खिलाड़ियों के प्रशिक्षण शिविर से ज़्यादा सेमिनार और वर्कशॉप में शामिल होना या लगातार ऑस्ट्रेलिया आने-जाने की उनकी 'नाजायज़ माँग' रही हो. लेकिन कड़वी सच्चाई यही है कि चार्ल्सवर्थ ने ये बहुत जल्दी महसूस कर लिया कि एक ऐसी व्यवस्था में काम करने का कोई नतीजा नहीं निकलने वाला जिसके पास देने के लिए बहुत कम चीज़ें हैं. इससे यह सवाल पैदा होता है कि जिस देश ने 1928 के बाद से आठ ओलंपिक में हॉकी का स्वर्ण पदक जीता हो, उसके पास आज किसी को देने के लिए बहुत कम चीज़ें हैं. पूरी दुनिया इसके लिए भारतीय हॉकी फ़ेडरेशन के पूर्व प्रमुख कँवरपाल सिंह गिल और उसके सचिव के. ज्योतिकुमारन को ख़लनायक साबित करने में लगी हुई है. ऐसे में इस बात को याद करना लाज़िमी हो जाता है कि अंतरराष्ट्रीय हॉकी फ़ेडरेशन (एफ़आईएच) ने ही ख़ुद एशियाई हॉकी को बढ़ावा देने के लिए अपने भारी-भरकम संसाधन से ख़ास मदद नहीं की. इसकी शुरूआत वर्ष 1975 में उसी दिन हो गई थी जिस दिन एफ़आईएच ने मोंट्रियल ओलंपिक के मेज़बानों को हॉकी का खेल प्राकृतिक घास के बदले कृत्रिम घास पर करवाने की अनुमति दी थी. उस समय यह तर्क दिया गया था कि कनाडा में भयंकर जाड़े के कारण हॉकी मैच के लिए सही तौर से प्राकृतिक घास को उगा पाना करीब-करीब असंभव है. भारत की तरफ़ से अजीतपाल सिंह के नेतृत्व में वही हॉकी टीम मोंट्रियल गई जिसने मलेशिया विश्व कप में स्वर्ण पदक जीता था. आशंकाएँ सही साबित हुईं और 1928 के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि भारत को हॉकी के लिए ओलंपिक में कोई पदक न मिले. वर्ष 1975 के बाद भारत मात्र एक बार ओलंपिक या विश्व कप हॉकी के सेमीफ़ाइनल तक पहुँच सका. अफ़ग़ानिस्तान पर रूस के हमले के ख़िलाफ़ अमरीका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों ने मॉस्को ओलंपिक का बहिष्कार कर रखा था और कमज़ोर चुनौतियों के कारण भारत ने वहाँ हॉकी का आठवाँ स्वर्ण पदक जीता था. कृत्रिम घास वाला मैदान क्यों ? यूरोपीय देशों के लिए कृत्रिम घास वाला मैदान बनाना और वहाँ के ठंडे मौसम में उसका रखरखाव करना आसान था. इसके साथ ही उन्हें प्राकृतिक मैदान में गेंद की उछाल को लेकर बनी रहने वाली अनिश्चितता से भी छुटकारा मिल गया. फिर क्या था, एशियाई खिलाड़ियों के हॉकी की छड़ी का जादू पुराने दिनों की बात हो गई. उनकी फुर्ती, उनकी ताक़त और मैदान में डटे रहने की क्षमता पर दबाव दिखने लगा. आर्थिक दिक्कतों के कारण भारत को पहला कृत्रिम हॉकी पिच वर्ष 1982 में तब मिला जब यहाँ एशियाई खेल होने वाले थे. आज मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम के नाम से प्रसिद्ध मैदान को उस समय हॉकी के आयोजन स्थल में बदला गया था. कृत्रिम हॉकी पिच की अपनी ख़ास ज़रूरतें होती हैं. गेंद, जूते और यहाँ तक कि छड़ी भी घास वाली हॉकी से अलग होती हैं. कृत्रिम पिच पर खेलने के लिए जिस गेंद और जूतों की ज़रूरत होती है, वह भारत में आज भी नहीं बनाया जाता है और उसे विदेश से मँगाना पड़ता है. खिलाड़ियों की मुश्किलें हॉकी के किसी भी भारतीय युवा खिलाड़ी का सामना पहली बार कृत्रिम हॉकी पिच से तब होता है जब वह 15-16 साल की उम्र का होता है और उसके स्कूल की टीम दिल्ली में खेले जाने वाले किसी महत्वपूर्ण टूर्नामेंट में शामिल होती है. और तब उन्हें महसूस होता है घास वाली हॉकी के जूते पहनकर खेलना उनके लिए छाले को न्योता साबित हो सकता है. सीधी छड़ी के साथ खेलने के दिन बीत चुके होते हैं और हर किसी को कमर को झुकाकर और छड़ी को मैदान पर सपाट रखकर गेंद को रोकना पड़ता है. ये ऐसा है जो घास वाले मैदान पर ख़तरनाक साबित हो सकता है, जिसके ये नौजवान आदी होते हैं. तो बात पहुँच जाती है फिर से हॉकी सीखने और खेलने की लेकिन अगर वे लगातार राष्ट्रीय कैंप के हिस्सा न हों तो उनके लिए इस मैदान पर खेलने के गुर सीखने के बहुत कम अवसर होते हैं. इस सबके बावजूद भारत के पास आज भी मात्र 21 कृत्रिम हॉकी पिच है जबकि नीदरलैंड जैसे छोटे से देश के पास ऐसे 250 से ज़्यादा मैदान हैं. ऐसी स्थिति में इस बात का अनुमान लगाना मुश्किल है कि एक खिलाड़ी और एक कोच के तौर पर सफल रहे चार्ल्सवर्थ पूरी आज़ादी देने के बाद भी भारत में अपना लक्ष्य हासिल कर पाते. कम से कम तब तक तो नहीं, जब तक कि सच्चे मायने में हॉकी ज़मीनी स्तर पर न लौट आए. अंतरराष्ट्रीय हॉकी फ़ेडरेशन वर्ष 2010 में भारत में होने वाले विश्वकप हॉकी का आयोजन घास वाली पिच पर करवाना चाहता है. ओलंपिक की लुप्तप्राय सूची से हॉकी को बाहर रखने की दिशा में यह क़दम होगा. यूरोप और ऑस्ट्रेलिया इस तरह से पीछे जाने वाले क़दम पर एतराज़ कर सकते हैं लेकिन यह हॉकी के बचे रहने का सवाल है. अगर ऐसा नहीं होता है तो हॉकी की छड़ी एक दिन संग्रहालय की शोभा बढ़ाएँगी और आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाएँगी कि कोई खेल हुआ करता था जो एक घुमावदार छड़ी और गेंद के साथ खेला जाता था. |
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