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शनिवार, 06 अक्तूबर, 2007 को 17:59 GMT तक के समाचार
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नए चैंम्पियन को अच्छे प्रदर्शन की आस

आशुतोष सिंह (फ़ाइल फ़ोटो)
आशुतोष सिंह ने गुणेश्वरन को फ़ाइनल में हरा कर टेनिस की राष्ट्रीय चैंपियनशिप जीती
दिल्ली में शुक्रवार को संपन्न हुई टेनिस की राष्ट्रीय चैंम्पियनशिप में आशुतोष सिंह नए चैंम्पियन बने हैं.

आशुतोष सिंह ने फ़ाइनल में गुणेश्वरन को हराया. शनिवार को वे बीबीसी के दिल्ली स्टूडियो में आए और बीबीसी ने उनसे की विशेष बातचीत. प्रस्तुत है इस बातचीत के कुछ अंश:

किस तरह तय हुआ यह सफ़र ?

सफ़र काफ़ी कठिन था. टूर्नामेंट का फ़ील्ड काफ़ी स्ट्रांग था. मैं ख़ुद को भाग्यशाली मानता हूँ कि ये चैंम्पियनशिप जीत पाया. टूर्नामेंट के दो खिलाड़ी मैच के लिए फ़िट नहीं थे, उन्हें बीच में ही मैच छोड़ना पड़ा. लेकिन मैं सेमीफ़ाइनल और फ़ाइनल में अच्छा खेला.

आप सेकेंड सीड थे और फ़ाइनल में आपके प्रतिद्वंदी गुणेश्वरन तीन सीडेड खिलाड़ी को हरा चुके थे. आपने अपनी मनःस्थिति को किस तरह काबू में रखा?

हर मैच के पहले दबाव तो रहता ही है. लेकिन मुझे फ़ाइनल में खेलने का तर्ज़ुबा रहा है. इससे मुझे मदद मिली. गुणेश्वरन काफी युवा खिलाड़ी है, शायद मैच की चकाचौंध से वे घबरा गए.

हाँ, उन्होंने ऐसा माना भी. पर क्या आपको नहीं लगता कि एक अच्छे खिलाड़ी में बड़े दर्शक वर्ग, कैमरा वग़रैह के सामने खेलने के लिए तैयार रहना चाहिए. क्या भारत में खिलाड़ियों को मिलने वाली ट्रेंनिग में कुछ कमी है?

 हाल के तीन-चार सालों में लोगों की रूचि टेनिस में बढ़ी है. विशेष रूप से सानिया मिर्ज़ा की लोकप्रियता के बाद
आशुतोष सिंह

जी हाँ, हमारे यहाँ बड़ी संख्या में दर्शकों के सामने मैच खेलने का मौक़ा काफ़ी कम मिलता है. इससे राष्ट्रीय चैंम्पियनशिप जैसे टूर्नामेंट में खेलने में परेशानी तो होती ही है. और यह व्यक्ति विशेष पर भी निर्भर करता है. मेरी शुभकामना है कि वे अगली बार अच्छा खेलें. वे अच्छे खिलाड़ी हैं

टेनिस आपको विरासत में मिली, आपके पिता भी डेविस कप खिलाड़ी रहे है. पर भारत में टेनिस में आम लोगों की रूचि के बारे में आप की क्या राय है?

हाल के तीन-चार सालों में लोगों की रूचि टेनिस में बढ़ी है. विशेष रूप से सानिया मिर्ज़ा की लोकप्रियता के बाद. जब कोई सराहना करता है तो काफ़ी अच्छा लगता है.

लिएंडर पेस और महेश भूपति के बाद पुरूषों की टेनिस में कोई बड़ा नाम उभर कर नहीं आया ऐसा क्यों?

हमारे यहाँ चैलेंजर्स और एटीपी टूर्नामेंट उतने नहीं होते जितने कि अमरीका या यूरोप में होते हैं. हर देश में सात-आठ इवेंट्स होते हैं हमारे यहाँ एक या दो ही हो पाता है.

आम तौर पर वहाँ पर जो खिलाड़ी अच्छा करते हैं वे अपने घरेलू वातावरण में ही खेलते रहते हैं. हम क्षेत्रीय स्तर पर अच्छा करते है.

हमें एटीपी टूर्नामेंट में कम अंक मिलते हैं. हमारे यहाँ भी अगर बड़े चैंलेजर्स हो तो हम ज़्यादा अच्छा करेंगे. हमारी रैंकिंग भी अच्छी होगी, इससे हमें फ़ायदा मिलेगा.

क्या अब भी ऐसा माना जाए कि टेनिस सिर्फ़ पैसे वालों का खेल है?

नहीं, अब ऐसा नहीं है. फ़ेडरेशन ज़मीनी स्तर पर काफ़ी काम कर रही है. साथ ही एआईटीए (ऑल इंडिया टेनिस एसोसिएशन) अच्छा काम कर रही है. अगर आप अच्छा प्रदर्शन करेंगे तो प्रायोजक भी मिल जाते हैं.

रामनाथन कृष्णन, रमेश कृष्णन, विजय अमृतराज, लिएंडर पेस, महेश भूपति के बाद ग्रैंड स्लैम में कोई पुरुष खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन कर पाएगा?

हम तो यही उम्मीद करते हैं कि आने वाले दिनों में हम अच्छा प्रदर्शन करें. पृजनेश, यूकी भांबरी जैसे युवा खिलाड़ी हैं. इनसे काफ़ी उम्मीदें हैं. इनके पास अच्छे प्रायोजक भी हैं.

विदेशी खिलाड़ियों से अपनी तुलना करने पर क्या कमी महसूस करते हैं?

विदेशों में जूनियर खिलाड़ियों को पच्चीस-तीस सप्ताह तक प्रशिक्षकों के साथ रहकर सीखने का मौक़ा मिलता है. इससे काफ़ी फ़ायदा होता है.

हमारे यहाँ दो-तीन सप्ताह ही भेजा जाता है. हम कम खेलते हैं पर उम्मीद काफ़ी होती है और हम पर दबाव भी रहता है.

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