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अब बाज़ार में आएगी 'सौरभ साड़ी' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
फ़िल्मी सितारों के नाम पर 'परफ़्यूम' और फैशन की दूसरी वस्तुएँ बनने की ख़बरें तो अक़्सर आती हैं लेकिन क्या किसी पुरुष क्रिकेटर के नाम से महिलाओं के वस्त्र बनने की बात आपने सुनी है? यह कुछ अजीब भले लगे, लेकिन है सोलह आने सच. पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता समेत राज्य के बाज़ारों में जल्द ही 'सौरभ साड़ी' बाज़ार में आने वाली है. यानी सौरभ गांगुली अब साड़ियों पर भी हाथों में बल्ला लिए नज़र आएंगे. इन साड़ियों की क़ीमत होगी महज चार सौ पचहत्तर रुपए. बर्दवान ज़िले के कटवा में हथकरघा बुनकर समन्वय समिति ने विश्वकप क्रिकेट और पूर्व भारतीय कप्तान सौरभ गांगुली की लोकप्रियता को भुनाने के लिए यह अनूठा प्रयोग किया है. और उनका यह प्रयोग सिर्फ सौरभ तक ही सीमित नहीं रहेगा. समिति के प्रबंधक अचिंत्य कुमार मजूमदार कहते हैं,''अगर बाज़ार में इन साड़ियों की बढ़िया माँग रही तो इसके बाद सचिन, सानिया और फुटबॉलर बाइचुंग भूटिया के नाम पर भी ऐसी साड़ियाँ बनाने की योजना है.'' 'थीम का दौर' आखिर सौरभ साड़ी बनाने का ख़याल कैसे आया? मजूमदार कहते हैं कि यह थीम का दौर है. राज्य में दुर्गा पूजा से लेकर शादियाँ तक किसी न किसी थीम पर आधारित होती हैं. विश्वकप, भारतीय क्रिकेट टीम में महाराज की शानदार वापसी और उनकी लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए सौरभ साड़ी बनाने का फ़ैसला किया गया. वो कहते हैं,''यह काम आसान नहीं था. समिति के 360 में से 20 सदस्यों को चुनकर इसका प्रशिक्षण दिया गया. इसके लिए कोलकाता से चार प्रशिक्षकों को बुलाया गया था.'' यह बंगाल की पारंपरिक ताँत साड़ी होंगी जिसके आँचल पर हाथों में बल्ला लिए सौरभ टीम की ड्रेस में नज़र आएंगे. साड़ी के बाकी हिस्सों पर भी गेंद, बल्ले, विकेट और भारतीय टीम के लोगो की तस्वीर होगी. यह पूरी बुनाई हथकरघे पर धागों के ज़रिए की जाएगी. समिति के सचिव रघुनाथ दत्त बताते हैं, ''राज्य में क्रिकेट और सौरभ एक-दूसरे के पर्याय हैं. स्थानीय लोगों में उनके प्रति भारी दीवानगी है. इसलिए हमने यह नई साड़ी बनाने का फ़ैसला किया.'' वो कहते हैं,'' सबसे पहले समिति के एक सदस्य पार्थसारथी ने कपड़े पर सौरभ की तस्वीर बनाई. उसके आधार पर एक बुनकर संदीप राय ने साड़ी पर इस तस्वीर को उकेरा. उनसे बाकी लोगों ने भी यह कारीगरी सीखी.'' अचिंत्य कहते हैं कि साड़ी के आँचल पर सौरभ की तस्वीर उकेरने में ही ज़्यादा समय लगा. समिति ने फिलहाल ऐसी सिर्फ़ डेढ़ सौ साड़ियाँ बनाने का फ़ैसला किया है. दत्त कहते हैं कि बाद में माँग के आधार पर और साड़ियाँ बनाई जाएंगी. हासिल है महारत दो बुनकर दो दिनों में ऐसी एक साड़ी बना लेते हैं. वैसे, साड़ी पर जीवंत तस्वीर उकेरने में बंगाल के बुनकरों की कोई सानी नहीं है. दक्षिण बंगाल में बनने वाली बालूचरी साड़ियों में महाभारत और रामायण से लेकर तमाम पौराणिक गाथाएं उकेरी जाती रही हैं.
राज्य का ताँत उद्योग बीते कुछ वर्षों से मंदी के दौर से गुजर रहा है. लेकिन पहले सौरभ और फिर सचिन, सानिया और बाइचुंग साड़ियों के ज़रिए वह भी महाराज की तरह वापसी की उम्मीद कर रहा है. पहली साड़ी का नमूना कोलकाता स्थित हस्तकरघा ताँत कार्यालय में दिखाने के बाद अगले सप्ताह तक इन साड़ियों की बाजार में बिक्री शुरू हो जाएगी. दत्त बताते हैं कि विश्वकप के पहले ही इसे बाजार में पेश किया जाना था. लेकिन विभिन्न वजहों से इसमें देरी हो गई. कोलकाता के एक बड़े साड़ी विक्रेता अनिरुद्ध चटर्जी कहते हैं कि इस समय थीम-आधारित डिजाइनर साड़ियों की माँग है. बाज़ार में आने पर 'सौरभ साड़ी' की माँग बढ़िया रहने की उम्मीद है. ख़ासकर विश्व कप के दौरान इनकी अच्छी बिक्री होगी. इसके अलावा कीमत भी आम लोगों की पहुँच के भीतर है. | इससे जुड़ी ख़बरें सौरभ के लिए 'एक आख़िरी मौका'26 सितंबर, 2006 | खेल सौरभ गांगुली के समर्थन में प्रदर्शन15 दिसंबर, 2005 | खेल सौरभ गांगुली ने अभी चुप्पी साधी24 सितंबर, 2005 | खेल गांगुली मामले पर पवार की सफ़ाई15 दिसंबर, 2005 | खेल कप्तान को कभी-कभी ढील देनी चाहिए07 अगस्त, 2005 | खेल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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