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उम्मीद से भरी है आगे की राह... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में बात जब क्रिकेट की होती है, तो पुरुष क्रिकेट का तो कोई मुकाबला ही नहीं है. महिला क्रिकेट उससे कहीं पीछे है लेकिन धीरे-धीरे हमने भी क़दम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं. पिछले कुछ महीनों से भारत में महिला क्रिकेट एसोसिएशन(डब्ल्यूसीएआई) का बीसीसीआई के तहत आ जाना महिला क्रिकेट के लिए बहुत ही फ़ायदेमंद साबित हुआ है. सबसे बड़ा फ़ायदा तो बेहतर सुविधाओं और मीडिया कवरेज में देखने को मिला है. अगर आप लगातार ख़बरों में बने हुए हैं तभी लोगों को पता चलता है कि महिला क्रिकेट में कुछ हो रहा है. ये एक चक्र की तरह है. महिला क्रिकेट के बारे में कुछ न कुछ ख़बर आती रहनी चाहिए और इसी तरह लोग जुड़ते जाते हैं. अगर आपने एक सिरीज़ साल के शुरू में खेली और फिर लंबे समय तक कुछ नहीं हुआ, तो महिला क्रिकेट में लोगों की दिलचस्पी भी नहीं होगी. पर एक चीज़ जिसकी कमी बेहद महसूस होती है वो है सरकार की ओर से प्रोत्साहन की. कोई भी अगर अच्छा काम करता है तो उम्मीद होती है कि उसे शाबाशी मिलेगी. पुरस्कार के ज़रिए आपकी मेहनत को पहचान मिलती है. लेकिन जब भी पुरस्कारों और सम्मान की बात आती है तो महिला क्रिकेट खिलाड़ियों को नज़रअंदाज़ किया जाता है. पुरुष खिलाड़ियों को तो अकसर पुरस्कार मिलते रहते हैं लेकिन महिला क्रिकेट खिलाड़ियों को ये मौका नहीं मिलता. यहाँ सरकार को अपनी नीति सुधारने की ज़रूरत है. जब क्रिकेट के लिए पुरस्कार दिए जाते हैं तो महिला और पुरुष खिलाड़ियों को अलग-अलग नज़रिए के देखना चाहिए क्योंकि महिलाओं को अपना प्रदर्शन दिखाने के लिए बहुत कम मैच मिलते हैं. जबकि पुरुष क्रिकेट खिलाड़ी साल में बहुत सारे मैच खेलते हैं. इस लिहाज से दोनों के प्रदर्शन की तुलना नहीं होनी चाहिए. खिलाड़ियों को प्रोत्साहन देने के लिए राज्य सरकारों को आगे आना चाहिए. जैसे हमारी गेंदबाज़ नीतू डेविड को ही लीजिए. उनके नाम अभी भी एक विश्व रिकॉर्ड लेकिन उनकी अपने राज्य ने उनको कभी तवज्जो नहीं दी. मैं भाग्यशाली रही हूँ कि आंध्र प्रदेश में मुझे काफ़ी सम्मान मिला है. जहाँ तक बात परिवार से मिलने वाली समर्थन की है, तो मुझे परिवार से काफ़ी प्रोत्साहन मिला है. उम्मीद की किरण वैसे अतीत की बात करें तो 70-80 के दशक में महिला क्रिकेट काफ़ी लोकप्रिय था और मीडिया कवरेज भी थी-शांता रंगास्वामी, डायना एडुल्जी जैसी दिग्गज खिलाड़ी थीं. लेकिन उसके बाद लंबे समय तक महिला क्रिकेट में कुछ ख़ास नहीं हुआ. राज्यों में हालत ये थी खिलाड़ियों को अपनी जेब से पैसा खर्च कर खेलना पड़ता था. साल में सिर्फ़ एक या दो सिरीज़ खेलने को मिलती थी- लोगों को कुछ पता ही नहीं रहता था कि महिला क्रिकेट में क्या हो रहा है. पहले महिला क्रिकेट एसोसिएशन एक स्वतंत्र बोर्ड था, बीसीसीआई से उसे मदद नहीं मिलती थी और पैसे की कमी रहती थी. विदेशों में जाकर दौरा करना तो और भी मुश्किल था क्योंकि इसके लिए प्रायोजकों की ज़रूरत होती है. लेकिन बीसीसीआई के आने से ज़्यादा क्रिकेट खेलने का मौका मिलेगा. अब घरेलू क्रिकेट में भी पैसा कमाया जा सकता है और हमें खेलने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के मैदान भी मिलने लगे हैं. ज़ाहिर है बेहतर सुविधाओं से खेल का स्तर अच्छा होता है और बहुत सारी लड़कियों को आगे आने का प्रोत्साहन मिलता है. जब घरेलू क्रिकेट का स्तर ऊपर उठता है तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रदर्शन में सुधार होता है भारत में पुरुष क्रिकेट खिलाड़ियों ने जो मानक स्थापित किए हैं, वहाँ तक पहुँच पाना बड़ा मुश्किल काम है. पर मैं यही उम्मीद करती हूँ कि बीसीसीआई के आने से जो भी सुविधाएँ महिला क्रिकेट खिलाड़ियों को मिलेंगी, हम उसका हम पूरा-पूरा फ़ायदा उठा पाएँगे और महिला क्रिकेट के लिए बेहतर मानक स्थापित करेंगे. (वंदना के साथ बातचीत पर आधारित) | इससे जुड़ी ख़बरें विंबलडन में महिलाओं को बराबरी का दर्जा22 फ़रवरी, 2007 | खेल भारतीय महिला टीम ने जीता एशिया कप21 दिसंबर, 2006 | खेल विवादों के बावजूद शांति सम्मानित18 दिसंबर, 2006 | खेल महिला टीम ने फिर जीता एशिया कप05 जनवरी, 2006 | खेल महिलाओं का आठवाँ क्रिकेट विश्व कप22 मार्च, 2005 | खेल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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