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रविवार, 30 जुलाई, 2006 को 03:50 GMT तक के समाचार
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सौरभ गांगुली नहीं थे 'राइट च्वाइस'
राहुल द्रविड़ के साथ जॉन राइट
राइट ने भारतीय क्रिकेट से जुड़े कई मुद्दों पर अपनी राय रखी है
भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सौरभ गांगुली को टीम से बाहर निकालने का आरोप भले ही नए कोच ग्रेग चैपल पर लगता हो लेकिन पुराने कोच जॉन राइट भी गांगुली को कप्तानी से हटाना चाहते थे.

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कोच जॉन राइट ने अपनी पुस्तक ' इंडियन समर्स' मे लिखा है कि जब वो कोच के तौर पर अपने अंतिम चरण में थे तब वो चाहते थे कि भारतीय टीम के नेतृत्व में बदलाव हो.

 कोच के रुप में अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में गांगुली को कप्तानी से हटाने के कई पुख्ता कारण थे.
जॉन राइट, पूर्व कोच

राइट लिखते हैं " कप्तान के तौर पर और क्रिकेट में योगदान के साथ साथ रिकार्डों के लिए भी मैं सौरभ गांगुली का बहुत सम्मान करता हूं. हालांकि कोच के रुप में अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में गांगुली को कप्तानी से हटाने के कई पुख्ता कारण थे. "

गुरुवार को न्यूज़ीलैंड में राइट की पुस्तक का लोकार्पण हुआ है. इसमें राइट ने लिखा है कि जिस तरह वो कप्तानी बदलना चाहते थे उसी तरह संभवत सौरभ गांगुली भी किसी न किसी समय कोच की बदली ज़रुर चाहते थे.

हालांकि ऐसा नहीं हुआ और राइट के बाद कोच पद संभालने आए ग्रेग चैपल के कार्यकाल में गांगुली को न केवल कप्तानी से हाथ धोना पड़ा बल्कि टीम से ही उनकी छुट्टी हो गई.

राइट लिखते हैं कि उनके और सौरभ के बीच मतभेदों के बावजूद दोनों ने मिलकर काम किया और भारतीय टीम को नई बुलंदियों तक पहुंचाने की कोशिश की लेकिन अंतिम चरण में ऐसा संभव नहीं हुआ.

राइट का यह भी कहना है सौरभ गांगुली ने ही ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ 2004-05 में हुई घरेलू सीरीज़ के दौरान सुनील गावस्कर को टीम का सलाहकार बनवाया और इसके लिए उनसे ( राइट ) कोई सलाह मशविरा नहीं किया गया.

राइट लिखते हैं " ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ 2004 में बेंगलूर के पहले टेस्ट से दो दिन पहले मुझे सूचना दी गई कि महान बल्लेबाज़ सुनील गावस्कर बल्लेबाज़ी के सलाहकार के रुप में टीम के साथ रहेंगे."

क्षेत्रीय राजनीति

राइट ने अपनी पुस्तक में टीम के चयन में क्षेत्रीय राजनीति के हावी होने की बात भी लिखी है.

गांगुली और चैपल
राइट के कार्यकाल में न सही चैपल के कार्यकाल में सौरभ की छुट्टी हो ही गई

वो लिखते हैं कि चयन प्रक्रिया के दौरान पहले छह सात नाम पर तो कोई विवाद नहीं होता था लेकिन बाद के चार पांच खिलाड़ियों के लिए खींचतान होती थी. क्षेत्रीय दबाव डाले जाते थे.

राइट कहते हैं कि ये वो स्थान थे जहां नए खिलाड़ियों को निखरने का मौका दिया जा सकता था और इससे टीम का स्वरुप तय हो सकता था.

उनका कहना है कि क्षेत्रीय राजनीति का सबसे अधिक शिकार मोहम्मद क़ैफ और वीवीएस लक्ष्मण रहे हैं. उनका कहना है कि ये दोनों ज़बर्दस्त क्रिकेटर रहे लेकिन एक दो प्रदर्शन ख़राब होते ही इन्हें टीम से निकाला जाता रहा.

राइट कहते हैं कि भारत में अभी भी सुपरस्टार खिलाडियों के ख़राब प्रदर्शन के बावजूद उन्हें टीम में रखे जाने पर कोई सवाल नहीं उठाया जाता जो ग़लत है.

राइट की पुस्तक में कही गई इन बातों पर भारत के पूर्व ख़िलाड़ियों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है और बीसीसीआई प्रमुख शरद पवार ने कहा है कि चयन प्रक्रिया में कोई क्षेत्रीय राजनीति काम नहीं करती.

राइट के कार्यकाल के दौरान बीसीसीआई प्रमुख रहे जगमोहन डालमिया ने इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं की है.

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