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इस्लाम के अनुरूप खेल की पोशाक | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तरी कीनिया में मुसलमान लड़कियों ने पहली बार वॉलीबॉल खेलना शुरू किया है क्योंकि अब उनके पहनने के लिए इस्लाम के अनुरूप एक विशेष पोशाक तैयार की गई है. परंपरागत विचार वाले लोगों का मानना रहा है कि लड़कियों को जिलबाब पहनना चाहिए लेकिन साधारण जिलबाब पहनकर खेलना कोई आसान काम नहीं है. खेल के सामान बनाने वाली कंपनी नाइकी ने इन लड़कियों के साथ मिलकर नए डिज़ाइन तैयार किए हैं जो खेल और इस्लाम दोनों के अनुकूल हो. पहले इन पोशाकों को पुरूषों ने ख़ारिज़ कर दिया था लेकिन अब लड़कियों ने उन्हें राज़ी कर लिया है कि ये पोशाक सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप हैं. संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी मामलों की संस्था के ओलिवर डेल्यूर ने भी इन पोशाकों को पहनकर खेल रही लड़कियों का शुरूआती मैच देखा. उनका कहना था, "इसे पहनकर लड़कियाँ बहुत आसानी से भाग-दौड़ कर सकती हैं, इसका कपड़ा बहुत ही अच्छा है, यह अंदर से एक स्पोर्ट्स सूट है जिसमें जिलबाब बाहर से जुड़ा है." नाइकी ने चार डिज़ाइन तैयार किए थे, शरणार्थी शिविर की लड़कियों ने सबसे लंबे और ढीले पोशाकों को चुना. डेल्यूर कहते हैं, "लड़कियों को इसकी वजह से आज़ादी का एहसास हो रहा है." उत्तरी कीनिया के शरणार्थी शिविरों में लगभग डेढ़ लाख सोमालियाई शरणार्थी रहते हैं जो पंद्रह वर्ष पहले वहाँ लड़ाई छिड़ने पर भाग आए थे. इन शिविरों में वैसे तो सबका जीवन कठिन है लेकिन ख़ास तौर पर लड़कियों को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. इस शरणार्थी शिविर में काम करने वाली महिला कर्मचारी अदर उस्मान हैदर कहती हैं, "इन लड़कियों को बहुत मुश्किलों और भेदभाव का सामना करना पड़ता है, खेल की वजह से उन्हें रोज़मर्रा के तनाव से थोड़ी राहत मिल जाती है. | इससे जुड़ी ख़बरें परदे के पीछे आज़ादी की एक बयार28 जुलाई, 2005 | पहला पन्ना नीदरलैंड में बुर्क़ा पाबंदी पर विचार22 दिसंबर, 2005 | पहला पन्ना बार्बी के मुक़ाबले एक अनोखी गुड़िया13 जनवरी, 2006 | मनोरंजन फ़ैशन के दौर में बदल रहा है बुर्क़ा28 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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