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शनिवार, 28 जनवरी, 2006 को 05:01 GMT तक के समाचार
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फ़ैशन के दौर में बदल रहा है बुर्क़ा

बुर्क़ा
लोग डिज़ाइनर बुर्क़ों को काफ़ी पसंद कर रहे हैं.
गर्दा, पर्दा और ज़र्दा के लिए मशहूर भोपाल शहर में अब पर्दा फैशन में शुमार हो चुका है.

भोपाल की हुकूमत कई वर्षों तक बेगमों के हाथ में रही. यही वजह है कि शहर पर्दादारी में आगे रहा है. यहां पर्दे की रवायत रही है और बुर्क़ा हमेशा से पहना जाता रहा है.

पिछले दशकों में पर्दे के लिए इस्तेमाल होने वाले बुर्क़े के अलग-अलग रुप देखे गए हैं मगर अब भोपाल में बुर्क़ा बिल्कुल नए रुप में नज़र आ रहा है.

औरतें इसका इस्तेमाल दूसरों की नज़र से बचने की बजाए उनकी नज़र में आने के लिए कर रही हैं.

इस्लाम में औरतों के लिए पर्दा ज़रुरी करार दिया गया है और कहा गया है कि औरत को अपने हुस्न की नुमाइश नहीं करनी चाहिए मगर वक्त के साथ औरतों ने अपने लिए रास्ता ढूंढ निकाला है.

बुर्क़े की दुकानों पर अब काले बुर्क़े के कद्रदानों की तादाद काफी घट चुकी है.

शहर में ऐसे बुर्क़े बन रहे हैं जिसमें एम्ब्राइडरी कुरेशिया और लहसु का काम किया जा रहा है और औरतें इन बुर्कों को हाथों-हाथ ले रही है.

बदलाव

बुर्क़े के ख़रीददार अब उस पर ज़्यादा से ज़्यादा काम चाहते हैं जो सूट पर किए गए काम से किसी भी सूरत में कम न दिखे.

बुर्क़ा बनाने वाले इरफ़ान ख़ान मानते हैं कि वक्त ने अब पर्दे को भी बदलकर रख दिया है.

वो बताते हैं, "उन पर होने वाला काम इस तरह का होता है कि हर कोई तारीफ़ किए बग़ैर नहीं रह सकता."

शायद यही वजह है कि अब बुर्क़े का इस्तेमाल वे लोग भी कर रहे हैं जिनके घरों में पर्दे के लिए ज़बरदस्ती नहीं की जाती.

29 वर्ष की रेहाना अपने घर से बाहर बचपन से ही पर्दे में जाती रही हैं. काले बुर्क़े के अलावा उन्होंने कुछ भी इस्तेमाल नहीं किया मगर अब वह भी फ़ैशन के रंग में रंगी नज़र आ रही हैं.

 डिज़ाइनर बुर्क़ा एक तरफ तो मेरे जिस्म को पूरी तरह से ढक देता है वहीं दूसरी तरफ फ़ैशन करने की हसरत भी पूरी हो जाती है
रेहाना, एक मुस्लिम सुवती

रेहाना कहती है, "डिज़ाइनर बुर्क़ा एक तरफ तो मेरे जिस्म को पूरी तरह से ढक देता है वहीं दूसरी तरफ फ़ैशन करने की हसरत भी पूरी हो जाती है."

बुर्क़ा डिज़ाइनर मुमताज़ अब बुर्क़े को बिल्कुल भी पर्दे की चीज़ नहीं मानती हैं.

उनका कहना है कि बुर्क़ा अब फ़ैशन में है और आप जितना चाहें उस पर सजावटी काम करवा सकते हैं.

मुमताज़ के पास बुर्क़ा डिज़ाइन करवाने वाले लोगों की तादाद में एकाएक इज़ाफा हुआ है. उनका कहना है कि लोग अब बुर्के पर चिकन और ज़रदोजी का काम करवाना चाहते हैं.

कॉलेज जाने वाली मुसलमान लड़कियां इन डिज़ाइनर बुर्क़ों के ज़रिए फ़ैशन करने की अपनी तमन्ना को भी पूरा कर रही है.

19 वर्ष की अस्मा नासिर शहर के एमएलबी कॉलेज में पढ़ रही हैं.

कई वर्षों तक अस्मा काले बुर्क़े में ही क्लास में जाती थी और दूसरों की नज़र से अपने आप को बचाए रखती थीं मगर अब वह पूरी तरह फैशन के रंग में देखी जा सकती है.

उनका कहना है कि घर वालों की नज़र में तो वह पूरी तरह से इस्लाम के मुताबिक़ पर्दा कर रही हैं. साथ ही तरह-तरह के डिज़ाइनर बुर्क़े पहनकर वह कॉलेज में दूसरों से कम भी नज़र नहीं आती हैं.

विरोध

इन सबके बीच औरतों का ऐसा तबका है जो इस नए चाल-चलन को सही नहीं मानता है.

रज़िया हामिद उन्हीं महिलाओं में से एक हैं.

बुर्क़ा
कई महिलाएं बुर्क़े में इस तरह के काम को ग़लत मानती हैं.

उनका कहना है कि पर्दा मर्दों की नज़र से बचने के लिए मुसलमान औरतों के लिए ज़रुरी बताया गया है.

उनका मानना है कि जब इसी बुर्क़े पर नई-नई डिज़ाइन होगी तो लोग अपने आप उस लड़की की तरफ देखेंगे और वहीं पर्दे का मतलब ख़त्म हो जाएगा.

भोपाल में इन दिनों एक सामान्य काला बुर्क़ा दो सौ रुपए में ख़रीदा जा सकता है मगर डिज़ाइन वाले बुर्क़े की कीमत उस पर किए काम से तय होती है.

बुर्क़ा बनाने वाले अतीक़ अहमद मानते हैं कि यह नया फ़ैशन उनके लिए काफी फ़ायदेमंद साबित हो रहा है.

अतीक़ के मुताबिक़ अब लोग कई बार ख़ुद ही बुर्क़े के लिए ड़िज़ाइन लेकर आते हैं.

शादी-ब्याह में शामिल होने के लिए मंहगी डिज़ाइन वाले बुर्क़े ही औरतों की पसंद होते हैं जो कई बार सूट की कीमत से भी ज़्यादा होते हैं.

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