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दृष्टिहीनों की भारत-पाक क्रिकेट श्रृंखला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली में भारत और पाकिस्तान के दृष्टिहीन खिलाड़ियों की टीमों के बीच खेली जा रही पाँच मैचों की क्रिकेट श्रृंखला की मंगलवार को घोषणा की गई. भारत और पाकिस्तान के बीच हाल ही ख़त्म हुई क्रिकेट श्रृँखला के बाद अब दोनों देशों के बीच एक यह ख़ास क्रिकेट श्रृंखला भी खेली जानी है. शारीरिक रूप से सामान्य खिलाड़ियों का मैच देखने वालों को लिए इन टीमों के बीच खेला जाने वाला क्रिकेट मैच किसी अजूबे से कम नहीं होगा. वजह यह है कि दोनों ही टीमों के खिलाड़ी दृष्टिहीन हैं और ऐसे में मैच तकनीक पर कम, उनके शारीरिक कौशल और उनके ‘सिक्स्थ सेंस’ पर ज़्यादा निर्भर करता है. और अगर खिलाड़ी इस तरह के हों, मैच क्रिकेट का हो, तो खेल का रोचक होना लाजिमी ही है. 28 अप्रैल से शुरू होने वाली इस क्रिकेट श्रृंखला के तहत दोनों देशों की क्रिकेट टीमों के बीच पाँच मैंच खेले जाएँगे. कपिल और तेंदुलकर भी इन टीमों को कम आँकने वालों के लिए एक ख़ास ख़बर, टीमों में तेंदुलकर भी हैं और कपिल भी. भले ही ये भारतीय क्रिकेट टीम के न हों पर इनके खेल को देखते हुए इनके प्रतिद्वंदी इन्हें कपिल और तेंदुलकर के रूप में ही याद करते हैं. भले ही पाकिस्तान के साथ पिछली श्रृँखला में दृष्टिहीनों की यह भारतीय टीम मैच हारकर आई हो पर वहाँ के खिलाड़ी इनके खेल को याद करते हैं. हालांकि कपिल कहे जाने वाले भारतीय टीम के कप्तान मानवेंद्र सिंह पटवाल राहुल द्रविड़ को अपना आदर्श मानते हैं. वो बताते हैं, “हम जीतने के लिए खेलेंगे. हम आजकल दोनों वक्त तैयारी में जुटे हैं और यह सिरीज़ हर हाल में जीतेंगे.” टीम के सचिन, राजेंद्र वर्मा बताते हैं कि उन्होंने पाँच मैचों में एक दोहरे शतक समेत 574 रन बनाए थे. वो बताते हैं, “हमारे अंदर कोई कमी नहीं है और हम पूरी तरह से सक्षम हैं. मैं यह मानता हूँ कि दृष्टिहीन हैं,उनको किसी से कम नहीं समझना चाहिए. हम वो सब कुछ कर सकते हैं जो आप कर सकते हैं.” प्रशिक्षण पर इनका खेल इतना आसान नहीं होता. भारतीय टीम के कोच उदय गुप्ते बताते हैं कि इन खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देना कोई आसान काम नहीं है. उन्होंने बताया कि इनका सारा प्रदर्शन इनकी शारीरिक क्षमताओं पर आधारित होता है. गुप्ते बताते हैं, “ये ध्वनि के आधार पर खेलते हैं. ये लोग आवाज़ को पकड़ने में बहुत तेज़ होते हैं. हम इन्हें आवाज़ के आधार पर खेलना सिखाते हैं फिर चाहे वो बैटिंग हो या फिर फ़ील्डिंग.” पर दोनों तरह के खिलाड़ियों में वो किस तरह का फ़र्क कर पाते हैं, यह पूछने पर गुप्ते ने बताया, “आम खिलाड़ियों के लिए तकनीकी का इस्तेमाल होता है पर इनके लिए इनकी शारीरिक क्षमताएँ और इनकी आवाज़ को पकड़ने की क्षमता ही सबसे महत्वपूर्ण है.” दर्शकों की दरकार हालांकि इन मैचों में लोग इतनी बड़ी तादाद में नहीं जुटते. पर इसके लिए केवल इन टीमों या उनकी शारीरिक चुनौतियों को ही क्यों ज़िम्मेदार ठहराया जाए. अगर क्रिकेट को छोड़ दें तो ऐसा तो तमाम खेलों के साथ होता है. और आयोजक इसे लेकर सचेत भी हैं सो मैंच खेले जाने के लिए कोटला या नेहरू स्टेडियम जैसे बड़े मैदान नहीं चुने गए हैं और शायद वह आयोजकों की जेब से बाहर भी है. दिल्ली के तमाम बाकी खेल के मैदानों को इसके लिए इस्तेमाल किया जाएगा जहाँ आम आदमी आसानी से पहुँच सकें और इस तरह इन टीमों और उनके क्रिकेट को ‘पॉपुलर’ बनाया जा सके. इन दर्शकों में बड़ी संख्या में स्कूली बच्चे, स्थानीय लोग और वो तमाम दृष्टिहीन होंगे जिनके लिए ये महज एक खेल भर नहीं है, उनको कम आंकने वालों के लिए एक जवाब भी है. |
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