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कोर्ट-कचहरी के चक्कर में क्रिकेट | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में क्रिकेट की चकाचौंध! सबसे लोकप्रिय खेल का ख़ज़ाना भी सबसे भारी है. और इस ख़ज़ाने पर कब्ज़ा है बोर्ड ऑफ क्रिकेट कंट्रोल इन इंडिया या बीसीसीआई का. दिनोंदिन बढ़ते इसके ख़ज़ाने के आकार ने, इस संगठन को दक्षिण एशिया का सबसे धनी खेल संगठन बना दिया है लेकिन ताज्जुब की बात ये है कि इस संगठन का न तो कोई बड़ा सा दफ्तर है, ना ही कोई वेबसाइट. इसकी बैठकें पाँच सितारा होटलों में होतीं हैं और इसके आय-व्यय का लेखा-जोखा जनता की पहुँच के बाहर है. पारदर्शिता, जवाबदेही, दायित्व, भूमिका- ये सब ऐसे शब्द हैं जिनके मतलब बीसीसीआई के साथ जुड़ते ही गड्डमड्ड हो जाते हैं. और इनका मतलब स्पष्ट करने की ज़िम्मेदारी अब भारत के सुप्रीम कोर्ट पर आ गई है. भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी संघ के सचिव अरूण लाल कहते हैं, "बीसीसीआई की क्या जिम्मेदारियाँ हैं, इसकी क्या भूमिका है और ये कहाँ तक उत्तरदायी है, अभी तक इन सवालों का कोई सीधा जवाब नहीं आया है. मैं सोच रहा हूँ कि इस बार सर्वोच्च न्यायालय अंततः ये तय कर देगा कि क्या हैसियत है बोर्ड की, वो कितना स्वतंत्र है, कितना निर्भर है." मुख्य संरक्षक वैसे बीसीसीआई मुखिया तो अध्यक्ष होता है, जिसे 26 राज्य क्रिकेट संघों के प्रतिनिधियों के अलावा, विश्वविद्यालय, रेलवे, सेना और क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया के प्रतिनिधि चुनते हैं.
लेकिन निवर्तमान बीसीसीआई अध्यक्ष जगमोहन डालमिया एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें 75 वर्षों के बीसीसीआई के इतिहास में पहली बार मुख्य संरक्षक चुन लिया गया, वो भी सर्वसम्मति से और अध्यक्ष के रूप में कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही. अध्यक्ष से कहीं ज्यादा भारी-भरकम मुख्य संरक्षक की कुर्सी और वो भी जीवन भर के लिए? ऐसे में डालमिया शायद बीसीसीआई के कर्ताधर्ता बने रहना चाहते थे. वैसे जगमोहन डालमिया को ही जाता है श्रेय बीसीसीआई के धन का भंडार अरबों रूपए से भरने का. लेकिन जब जगमोहन डालमिया ने पिछले महीने अध्यक्ष के चुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया अपने समर्थक और पूर्व उपाध्यक्ष, हरियाणा के कांग्रेस नेता, रणबीर सिंह महिंद्रा को तब विरोध के स्वर गूँजने लगे. पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष राज सिंह डुंगरपुर कहते हैं, "डालमिया साहब सब कुछ रह चुके हैं बोर्ड में. मैं मानता हूँ कि वो बहुत काबिल हैं. उन्होंने काफ़ी अच्छा काम किया है इसमें कोई शक नहीं है. लेकिन एक दिन ऐसा आता है जब आपको बोर्ड छोड़ना पड़ता है लेकिन उनकी इसको त्यागने की कोई इच्छा नहीं है." राज सिंह ने आरोप लगया, "वे इस चीज़ को बड़ी अच्छी तरह प्लान कर रहे थे कि मैं मुख्य संरक्षक बन जाऊँ और एक रबर स्टैम्प अध्यक्ष बना दूँ जिससे कि मैं मुख्य संरक्षक भी और बोर्ड का अध्यक्ष भी बना रहूँ." शरद पवार डालमिया पक्ष से अध्यक्ष पद के उम्मीदवार के चयन के बाद राज सिंह डुंगरपुर जैसे लोगों के आरोपों में सच्चाई देखने वालों की संख्या बढ़ने लगी. नाम चल रहा था, बीजेपी नेता और पूर्व क़ानून मंत्री अरूण जेटली का- लेकिन अंतिम समय में अरूण जेटली नेपथ्य में चले गए. बहरहाल, डालमिया विरोधियों ने एक भारी भरकम शख्सियत केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को अपना उम्मीदवार बनाया.
दो खेमों में बँट गए अध्यक्ष चुनने वाले लोग. मद्रास हाई कोर्ट ने पर्यवेक्षक नियुक्त किया सुप्रीम कोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश एस मोहन को. मोहन कोलकाता गए-अपनी देखरेख में चुनाव कराने. बैठक शुरू हुई, मतदान हुआ 15 मत शरद पवार को मिले,15 रणबीर सिंह महिंद्रा को और अब बारी थी डालमिया के निर्णायक मत की. जो ज़ाहिर है महिंद्रा के पक्ष में गया. लेकिन विवाद ख़त्म नहीं हुआ. न्यायमूर्ति एस मोहन ने कहा, "मेरा मानना है कि शुरू में चुनाव निष्पक्ष ढंग से नहीं कराए गए. जो लोग मतदान कर सकते थे उन्हें अयोग्य करार दिया गया. इसलिए तत्कालीन अध्यक्ष डालमिया ने अपना निर्णायक मत डाला और अपने उम्मीदवार को जितवा दिया." नए रूप में जन्मा यह विवाद अदालत में पहुँचा. कुछ ही दिनों पहले जब डालमिया को मुख्य संरक्षक चुना गया था तब महाराष्ट्र के प्रतिनिधि ध्यानेश्वर अगाशे उस बैठक में मौजूद थे और तब तो किसी ने उनके मत पर आपत्ति नहीं की थी. फिर अध्यक्ष के चुनाव में उन्हें निकाल बाहर क्यों किया गया? सवाल बड़ा माकूल था- नवनिर्वाचित अध्यक्ष रणबीर सिंह महिंद्रा ने जवाब में कहा, "उस समय तो सर्वसम्मति से फैसला हुआ था. मत तो किसी ने उस दिन डाले ही नहीं. सारे के सारे एक मत थे और बैठक में उन्हें इसलिए बैठने दिया क्योंकि किसी ने उसे चैलेंज ही नहीं किया कि ये अधिकृत प्रतिनिधि नहीं हैं." इस जवाब से संतुष्ट नहीं थे. अगाशे और कई अन्य लोग भी. अदालती चक्कर मामला एक बार फिर मद्रास हाई कोर्ट में पहुँचा- हाइकोर्ट ने नवनिर्वाचित अधिकारियों के कामकाज पर रोक लगा दी और सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस मोहन को ही बीसीसीआई का अंतरिम प्रशासक बना दिया.
बीसीसीआई ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, सुप्रीम कोर्ट ने बोर्ड के नवनिर्वाचित अधिकारियों से काम शुरू करने को कहा लेकिन डालमिया को मुख्य संरक्षक चुनने के फ़ैसले पर रोक जारी रखी. इस तरह डालमिया ख़ेमे को एक सफलता मिली और एक नाकामी. उनके प्रमुख समर्थक, उद्योगपति और बीसीसीआई उपाध्यक्ष कमल मोरारका ने कहा "मैं समझता हूँ कि मद्रास हाई कोर्ट ने गुस्से में आकर जो आर्डर पास कर दिया था, अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने उस पर रोक लगा दी." लेकिन विवाद ख़त्म नहीं हुआ. दोनों पक्षों के बीच वाक् युद्ध जारी है. राज सिंह डुंगरपुर, "सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ऐसा लगता है कि कोर्ट को यह पता चल गया है कि डालमिया साहब की दाल में कुछ काला है. और अब हम यह कह सकते हैं कि उनकी जबर्दस्त हार हुई है." इस विवाद से दुःखी दिखे क्रिकेट प्रेमी, खिलाड़ी और समीक्षक अरूण लाल, "मैं भी बहुत दुःखी हूँ. यह बहुत ही अनावश्यक बात है जो क्रिकेट में चल रही है. और इतने लंबे समय से चल रही है. जितने विवाद होते हैं उनसे नकारात्मक प्रचार होता है. इसका असर खिलाड़ियों पर पड़ता है और खेल प्रेमियों पर भी पड़ता है. आपसी विवाद आपस में ही निपटा लेना चाहिए, नहीं तो खेल का बहुत नुक़सान होगा." फ़िलहाल मामला सर्वोच्च न्यायालय में है. 26 अक्टूबर से सुनवाई शुरू होगी. जगमोहन डालमिया का एकाधिपत्य खतरे में है लेकिन बीसीसीआई के अधिकार क्षेत्र और प्रबंधन से जुड़े अनेक सवाल अब भी जवाबों की तलाश में हैं जिनसे बच पाना मुश्किल होगा बीसीसीआई अधिकारियों के लिए. |
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