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रविवार, 26 सितंबर, 2004 को 11:27 GMT तक के समाचार
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किसे पता है देवेंद्र की उपलब्धि का

देवेंद्र
देवेंद्र ने विश्व कीर्तिमान भी स्थापित किया है
बिलासपुर के देवेंद्र ने 21 सितंबर को एथेंस में आयोजित पैरा ओलंपिक खेलों में भारतीय दल का प्रतिनिधित्व करते हुए देश के लिए अब तक का पहला स्वर्ण पदक हासिल भले कर लिया हो लेकिन शहर को इस बात का पता भी नहीं है.

यहाँ बधाइयों का तांता नहीं है, कोई शोर-शराबा भी नहीं, उत्सव का तो सवाल ही नहीं है. न तो अख़बारों में इसको लेकर ख़बरें हैं और ना ही टीवी चैनलों पर.

सब कुछ इतना ठंढ़ा है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो. हर ख़बर पर नज़र रखने वाले देश के बड़े-बड़े अख़बारों-चैनलों ने भी इस ख़बर को नज़रअंदाज़ कर दिया है.

दक्षिण-पूर्व-मध्य रेलवे बिलासपुर के स्टोर विभाग में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी एथलीट देवेंद्र ने एथेंस पैराओलंपिक की भाला फेंक प्रतियोगिता में नया विश्व कीर्तिमान स्थापित किया.

रिकार्डतोड़ सफलता

उन्होंने 62.15 मीटर भाला फेंक कर भारत के लिए यह पहली स्वर्णिम सफलता हासिल की. देवेंद्र ने अपना ही पुराना विश्व रिकार्ड 59.77 मीटर को तोड़ कर यह सफलता पायी.

 यह मेरे लिए सपने के सच होने की तरह है. मैंने तो सोच लिया था कि स्वर्ण पदक ले कर ही लौटना है
देवेंद्र

भाला फेंक प्रतियोगिता के एफ 44-46 वर्ग में देवेंद्र को स्वर्ण चीन के गाओ एम जे को रजत और चीन के ही वांग डी सी को कांस्य पदक मिला. गाओ ने 55.57 और वांग ने 55.54 मीटर तक भाला फेंका.

बचपन में एक दुर्घटना में देवेंद्र का बायां हाथ ख़राब हो चुका है लेकिन 23 साल के देवेंद्र ने हार नहीं मानी और अपने पिता को आदर्श मानने वाले इस युवक ने गांव के ही खेल मैदान में भाला फेंकने का अभ्यास शुरु किया.

धीरे-धीरे मेहनत रंग लायी और देवेंद्र विभिन्न प्रतियोगिताओं में सफल होते गए. इससे पहले बुसान एशियन पैसेफिक गेम्स में भी स्वर्ण पदक पाया था.

देवेंद्र को उम्मीद थी कि एथेंस पाराओलंपिक में उसे सफलता मिलेगी ही. देवेंद्र ने एथेंस से फ़ोन पर बताया- “यह मेरे लिए सपने के सच होने की तरह है. मैंने तो सोच लिया था कि स्वर्ण पदक ले कर ही लौटना है.”

उम्मीद

देवेंद्र के अनुसार उसे भारत के खेल मंत्री सुनील दत्त ने बधाई दी. 133 देशों के इस खेल में देवेंद्र की नज़र अब ट्रिपल जंप पर है.

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देवेंद्र को अपने शानदार प्रदर्शन की उम्मीद थी

लेकिन देवेंद्र जहां काम करते हैं, उस बिलासपुर शहर को इस बात का अंदाजा ही नहीं है कि उसके शहर के इस विकलांग युवक ने कितनी बड़ी सफलता हासिल की है.

लगभग ऐसा ही माहौल देवेंद्र के पैतृक गांव जयपुरिया खालसा की ढ़ाणी में भी है. राजस्थान के चुरु जिले का एक छोटा-सा कस्बा है राजगढ़.

आम तौर पर रेल्वे स्टेशन के कारण इस कस्बे को सादुलपुर के नाम से जाना जाता है.

ख़बर नहीं

इसी कस्बे में एक सार्वजनिक एसटीडी बुथ चलाने वाले देवेंद्र के बड़े भाई जोगेन्द्र कहते हैं- “हमें तो पता था कि वह कुछ न कुछ अच्छा कर के ही लौटेगा. अब ख़बर मिली है तो अच्छा लग रहा है. यहां तो किसी को कुछ पता ही नहीं है. क्योंकि अब तक यहां किसी अख़बार में ये ख़बर भी नहीं छपी है.”

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बिलासपुर रेलवे स्टेशन में काम करते हैं देवेंद्र

गांव जयपुरिया खालसा की ढ़ाणी और सादुलपुर के अधिकांश लोगों को इस बात की ख़बर नहीं है लेकिन देवेंद्र के दोनो बड़े भाई महेंद्र और जोगेंद्र को इस बात का शिकवा भी नहीं है.

हाँ, उन्हें इस बात की थोड़ी चिंता ज़रुर है कि देवेंद्र को एथेंस भेजने के लिए 82 हज़ार रुपयों का जो कर्ज़ उन्होंने लिया है, उसे वापस करने को लिए क्या किया जाए. वैसे भी घर का खर्च खेती पर चलता है.

सादुलपुर से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर बसे जयपुरिया खालसा की ढ़ाणी के लोगों को देवेंद्र के भाई और भाभियों से इस बात का तो पता चल गया है कि देवेंद्र ने परदेस में कुछ कर दिखाया है.

 हमें तो पता था कि वह कुछ न कुछ अच्छा कर के ही लौटेगा. अब ख़बर मिली है तो अच्छा लग रहा है. यहां तो किसी को कुछ पता ही नहीं है. क्योंकि अब तक यहां किसी अख़बार में ये ख़बर भी नहीं छपी है
देवेंद्र के भाई

लेकिन देवेंद्र के घर वालों को उन्हें इस बात का विश्वास दिला पाना कठिन है क्योंकि एक भी अख़बार में देवेंद्र की ख़बर भी नहीं छपी है.

जोगेंद्र कहते है- “हमें तो समझ में नहीं आ रहा है कि भारत में अब तक का यह पहला स्वर्ण पदक देवेंद्र ने हासिल किया है लेकिन पूरा देश इस पर चुप क्यों है ?”

जयपुर में रह रहे देवेंद्र के पिता रामसिंह को उम्मीद है कि देवेंद्र के देश लौटने पर उसका भी स्वागत होगा और सरकार उस पर भी ध्यान देगी.

लेकिन देवेंद्र की मां जीवनी देवी इस बात को लेकर ही ख़ुश हैं कि जिसको लेकर उन्हें दिन-रात चिंता रहती थी, वही लाडला बेटा सात समंदर पार देश का नाम रोशन कर आया है.

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