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जापान से हार के बाद चीन में तनाव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चीन की राजधानी बीजिंग में एशिया कप के फ़ाइनल में मेज़बान चीन की हार के बाद काफ़ी तनावपूर्ण माहौल पैदा हो गया, तोड़फोड़ की घटनाएँ भी हुई हैं. पिछले वर्ष के चैंपियन जापान ने इस बार भी एशिया कप पर कब्ज़ा बनाए रखा, उसने चीन को फ़ाइनल में 3-1 से हराया. पाँच हज़ार पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में इस हार के बाद चीनी दर्शकों ने जापान के झंडे जलाए, जापानी खिलाड़ियों की भद्दी गालियाँ दीं और देशभक्ति के गाने गाए. मैच में जीत हासिल करने के बाद जब जापान की राष्ट्रीय धुन बजनी शुरू हुई तो दर्शकों ने इतना शोर मचाया कि उसकी आवाज़ पूरी तरह दबकर रह गई. चीन 20 वर्ष के अंतराल के बाद एशिया कप के फ़ाइनल में पहुँचा था इसलिए बड़ी संख्या में दर्शक मैदान पर मौजूद थे, जब-जब जापानी खिलाड़ी गेंद लेकर आगे बढ़ते थे तब भी दर्शक उन्हें गालियाँ दे रहे थे और बुरी तरह से शोर मचा रहे थे. मैच के दौरान हिंसा की कोई घटना तो नहीं हुई लेकिन मैच के बाद जापान से आए फुटबॉल प्रेमियों को सुरक्षित स्टेडियम से निकालने में पुलिस को काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी. यह कोई नई बात नहीं है, पहले भी चीन और जापान के मैच काफ़ी तनावपूर्ण माहौल में खेले गए हैं. अपीलें बीजिंग में जापान के दूतावास ने अपने नागरिकों को आगाह किया था कि वे जापानी टीम की नीली शर्ट न पहनें और मैदान पर चुपचाप मैच देखें ताकि चीनी दर्शकों के क्रोध का सामना न करना पड़े. ज़ाहिर है, इस तरह के व्यवहार से जापान से आए फुटबॉल प्रेमी ख़ासे नाख़ुश हैं, यहाँ तक कि जापान के प्रधानमंत्री ने अपील की कि उनके देश के लोगों के साथ ज़रा दोस्ताना बर्ताव किया जाए.
चीनी फुटबॉल टीम के कप्तान ने भी खेल प्रेमियों से आग्रह किया था कि वे मैच के दौरान शांति बनाए रखें ताकि खेल बिना बाधा के पूरा हो सके. लेकिन कोई अपील काम नहीं आई और दूसरे विश्व युद्ध के समय से चली आ रही दोनों देशों की कटुता का असर इस मैच में भी साफ़ दिखाई दिया. जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हज़ारों चीनियों को मार डाला था, उससे पहले 1937 में चीन के नानजिंग प्रांत में भारी नरसंहार के लिए भी जापान को ज़िम्मेदार माना जाता है. बीजिंग से बीबीसी संवाददाता का कहना है कि चीनी फुटबॉल प्रेमियों के इस व्यवहार के बाद अब ये सवाल भी उठने लगे हैं कि उग्र राष्ट्रीयता की भावना का यही हाल रहा तो बीजिंग में 2008 के ओलंपिक खेल किस तरह शांतिपूर्वक हो सकेंगे. |
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