डालमिया: बेहतरीन प्रशासक पर विवादों से अछूते नहीं

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    • Author, आदेश कुमार गुप्त
    • पदनाम, खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के प्रमुख जगमोहन डालमिया का निधन हो गया है.

डालमिया भारतीय क्रिकेट का एक बड़ा और कद्दावर नाम थे. हालांकि वे कई बार विवादों में भी रहे.

क्रिकेट में बदलाव की लहर लाने का श्रेय काफ़ी हद तक जगमोहन डालमिया को ही दिया जाता है.

आज भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड दुनिया का सबसे ताक़तवर और अमीर बोर्ड है. उसके पदाधिकारियों को पांच सितारा सुविधाएं मिलती है तो भारत के खिलाड़ी भी करोड़ों में खेलते हैं.

यहां तक कि क्रिकेट पर आरोप लगता है कि वह भारत में दूसरे खेलों के विकास में बाधक है. लेकिन क्रिकेट के साथ हमेशा ऐसा नहीं था.

डालमिया की शख़्सियत और उनके योगदान पर बीबीसी ने बात की दो जाने माने क्रिकेट समीक्षकों से.

अयाज़ मेमन, क्रिकेट समीक्षक

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भारतीय क्रिकेट में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण है. यहां तक कि अंतराष्ट्रीय क्रिकेट को भी दिशा देने में उनका बहुत हाथ रहा.

विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट को इंग्लैंड से बाहर भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे पहले लाने वालों में जगमोहन डालमिया ही थे, ख़ासकर 1983 के बाद.

हालांकि उस समय एनकेपी साल्वे बोर्ड के अध्यक्ष थे और डालमिया सचिव थे. लेकिन डालमिया ने बहुत मेहनत की.

इसके बाद डालमिया ख़ुद आईसीसी के अध्यक्ष बने. यह उनकी सबसे बड़ी कामयाबी थी.

अयाज़ मेमन के मुताबिक़, उनसे पहले भारत के बहुत कम ऐसे पदाधिकारी थे जिनका दुनिया में इतना सम्मान होता था.

इसके अलावा क्रिकेट जैसे खेल का व्यवसायिकरण करने में उनका सबसे बड़ा योगदान रहा.

इसकी सबसे बड़ी वजह उनकी रगों में मारवाडी ख़ून का होना था. धंधा कैसे करना है यह उन्हे आता था.

टेलीविज़न राइट्स जिसमें पैसा बहुत कम मिलता था उन्होंने उसे नई ऊचांइयों पर पहुंचा दिया जिसके परिणाम क्या निकले आज सभी को पता है.

आज बीसीसीआई दुनिया का सबसे अमीर बोर्ड है.

क्रिकेट समीक्षक अयाज़ मेमन कहते है कि वह जितनी भी बार जगमोहन डालमिया से मिले उतनी बार उन्हें क्रिकेट से लगाव रखने वाले इंसान के तौर पर पाया.

अयाज़ मेनन के मुताबिक़ डालमिया राजनीतिज्ञ नहीं थे, लेकिन बोर्ड की राजनीति को समझते थे.

अयाज़ मेमन के मुताबिक़ डालमिया बिज़नेसमैन थे शायद इसलिए जानते थे कि क्रिकेट के नेटवर्क को कैसे फैलाना चाहिए.

दुनिया भर के क्रिकेट प्रशंसकों से संबध बनाए और उनका इस्तेमाल कैसे करें यह भी वह जानते थे.

अली बाकर से लेकर पाकिस्तानी बोर्ड से उनकी दोस्ती थी. कौन सोच सकता था कि साल 1987 में भारत और पाकिस्तान ख़राब संबधों के कारण विश्व कप करा सकते हैं लेकिन डालमिया ने यह कर दिखाया था.

सत्ता में रहे ना रहे लेकिन उनके संबध सभी से मधुर बने रहे.

लेकिन अयाज़ मेमन कहते हैं कि इसके बावजूद वह भारतीय क्रिकेट को इस रूप में आगे नहीं ले जा सके कि भारत लम्बे समय तक दुनिया में नम्बर एक रह सके.

प्रदीप मैगज़ीन, क्रिकेट समीक्षक

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दूसरी तरफ एक और क्रिकेट समीक्षक प्रदीप मैगज़ीन मानते है कि उनका योगदान बड़ा विवादित भी रहा.

वह बीसीसीआई के पहले ऐसे अध्यक्ष रहे जो क्रिकेट में पैसा लाए. डालमिया ने बिंद्रा के साथ मिलकर भारतीय बोर्ड की छवि बदली.

उनके समय में विदेशी टेलीविज़न चैनल भारत में आए. उनके अधिकार महंगे बिकने लगे. इसे उनका सकारात्मक योगदान मान सकते हैं.

उन्होंने क्रिकेट में आईसीसी पर इंग्लैड और ऑस्ट्रेलिया के एकाधिकार को तोड़ा. जगमोहन डालमिया का मानना था कि क्रिकेट प्रशासनिक स्तर पर लोकतांत्रिक होनी चाहिए.

उनसे पहले एशिया के किसी व्यक्ति का आईसीसी का अध्यक्ष बनना एक सपने जैसा ही था.

जगमोहन डालमिया का विवादों से भी चोली-दामन का साथ रहा.

क्रिकेट पर जिस तरह का एकाधिकार और नियंत्रण पिछले दिनों एन श्रीनिवासन के समय में देखने को मिला उसकी शुरुआत जगमोहन डालमिया ने ही की थी.

जगमोहन डालमिया की पकड़ बीसीसीआई पर बहुत मज़बूत थी. उनके सामने कोई नही बोल सकता था, विरोध तो दूर की बात है.

अधिक पैसा आने के बाद बोर्ड के पदाधिकारियों और खिलाड़ियों को अधिक से अधिक लाभ इस तरह दिया जाता था कि उनके वोट कही भी बंट ना सके.

इससे क्रिकेट में ऐसी बातें घर कर गई जो नहीं होनी चाहिए थी."

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इसके अलावा क्रिकेट में मैच फिक्सिंग की बात भी उनके कार्यकाल के दौरान ही सामने आई.

जगमोहन डालमिया ने अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश की कि इसके ख़िलाफ कोई सुनवाई ना हो.

उन्होंने कहा कि ऐसा नही होता. वह तो कुछ ऐसे सबूत मिले, कुछ ऐसे लेख अख़बारों और पत्रिकाओं में छपे जिससे लोगों को लगा कि क्रिकेट में मैच फिक्सिंग होती है.

इससे बाद सरकार ने सीबीआई को मामला सौंपा जिसके बाद जांच में दक्षिण अफ्रीका के पूर्व कप्तान हैसी क्रोनए और भारत के कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन दोषी पाए गए.

इसके आधार पर कहा जा सकता है कि उनका पिछला कार्यकाल अच्छा भी रहा और बुरा भी रहा.

आज तो क्रिकेट में पहले से भी अधिक पैसा है जबकि डालमिया पर उनके पिछले कार्यकाल में वित्तीय अमिमियतता के भी आरोप लगे.

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तमाम आरोपों के बावजूद उनकी वापसी का कारण बोर्ड की राजनीति है. जब एन श्रीनिवासन और शरद पवार आए तो उन पर आरोप लगाए गए, एफआईआर कर उन्हें जेल भेजने की कोशिश की गई.

जब नई समिति आई तो उस पर इसी तरह के आरोप लगे. लेकिन डालमिया बोर्ड के पुराने खिलाडी रह चुके हैं और पूर्व क्षेत्र की बारी भी इस बार थी, इसलिए अध्यक्ष पद के लिए इन्हीं सभी बातों ने बोर्ड में उनकी वापसी में मदद की.

डालमिया के लिए साल 2004 से लेकर 2006 का समय ठीक नही रहा. उनके ख़िलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगे, उन्हे बीसीसीआई से बाहर कर दिया गया. इसके बाद उन्होंने वापसी भी की.

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