एक फ़ोनकॉल ले डूबा स्पिन के जादूगर को

- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत के मशहूर <link type="page"><caption> स्पिन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/sport/2012/12/121211_indian_spin_bowling_pn.shtml" platform="highweb"/></link> चौगड्डे से पहले और अनिल कुंबले के उदय से बहुत पहले भारतीय स्पिन का लोहा मनवाया था सुभाष गुप्ते की ज़बरदस्त कलाइयों ने.
सुभाष के पास उच्च कोटि के लेग स्पिनर के सभी गुर थे लेकिन उनकी दो तरह की गुगली गेंदें इतनी ख़तरनाक होती थीं जिन्हें गैरी सोबर्स जैसे दिग्गज के लिए भी समझ पाना बहुत मुश्किल हुआ करता था.
सोबर्स अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि गुप्ते से अच्छे लेग स्पिन गेंदबाज़ को उन्होंने नहीं खेला. वो कहते हैं कि बेशक शेन वॉर्न आज के युग के सबसे अच्छे लेग स्पिनर माने जाते हों लेकिन उन्होंने उनसे बेहतर गेंदबाज़ के खिलाफ क्रिकेट खेली है.
गुप्ते के पास वॉर्न से कहीं ज़्यादा विविधता थी और उनकी गुगली को समझ पाना किसी के बूते की बात नहीं थी. वॉर्न गेंद को बहुत अधिक टर्न करते थे लेकिन <link type="page"><caption> स्पिन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/sport/2013/03/130301_hyderabad_test_preview_pn.shtml" platform="highweb"/></link> गेंदबाजी में टर्न ही सब कुछ नहीं होता. लेंथ और दिशा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है.
वेस्ट इंडीज़ के तीन डब्लूज़ वॉरेल, वॉल्कॉट और वीक्स ने उनके खिलाफ रन जरूर बनाए थे लेकिन सुभाष ने उन्हें कई बार मुश्किलों में भी डाला था.
उस ज़माने में वेस्ट इंडीज़ के विकेट स्पिन गेंदबाज़ों को बिल्कुल भी मदद नहीं करते थे लेकिन इसके बावजूद 1952 की सिरीज़ में उन्होंने वहाँ 27 विकेट लिए थे.
उस टीम के मैनेजर दलीप सिंहजी ने उनकी तुलना महानतम ऑस्ट्रेलियन लेग स्पिनर क्लेरी ग्रिमेट से की थी. इसके बाद पाकिस्तान सिरीज़ में भी उनके हाथ 21 विकेट लगे.
न्यूज़ीलैंड के खिलाफ तो वह इतनी अच्छी फ़ॉर्म में थे कि उनको खेल पाना असंभव था. उन्होंने उस सिरीज़ में 34 विकेट लिए जो कई सालों तक भारत के रिकॉर्ड रहा जिसे बाद में चंद्रशेखर ने 1973 में इंग्लैंड के खिलाफ तोड़ा.
जादूगर
पॉली उमरीगर के अनुसार सुभाष गुप्ते दो तरह की गुगली गेंद करते थे. एक जब वह अपने दाहिने कान के पास अपना हाथ ले जाते थे और दूसरा जब वह हाथ को कान से दूर रखते थे.
कई बार बल्लेबाज़ उनकीं गेंद यह सोच कर छोड़ देते थे कि वह बाहर जा रही है और वही गेंद उनका मिडिल या लेग स्टंप ले उड़ती थी.
भारत के एक और महान <link type="page"><caption> स्पिनर</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/sport/2012/11/121126_cricket_india_england_day4_ms.shtml" platform="highweb"/></link> वीनू मानकड़ ने अपने बेटे अशोक मानकड़ को बताया था कि क्रिकेट में अगर कहीं जादू जैसी चीज़ है तो सुभाष गुप्ते जादूगर हैं.
मानकड़ का मानना था कि अगर 1954 के पाकिस्तान दौरे में भारतीय फ़ील्डरों ने गुप्ते की गेंदों पर उठे कैच लपके होते तो भारत वह सिरीज़ जीत कर लौटता.
शीशे पर भी स्पिन

अपने ज़माने के एक और बड़े सिपनर बापू नाडकर्णी कहते हैं कि उन्होंने किसी ऐसे गेंदबाज़ को नहीं देखा जिसका लाइन और लेंथ पर इतना ज़बरदस्त नियंत्रण हो.
ये भारत का दुर्भाग्य था कि उस समय की भारतीय फील्डिंग माशा अल्लाह हुआ करती थी.
नाडकर्णी के मुंह से इस तरह की तारीफ़ निकलना बड़ी बात है, क्योंकि उनके बारे में भी मशहूर था कि वह 10 में से 10 बार गेंद को एक रुमाल पर डाल सकते थे.
सुभाष गुप्ते के बारे में ये भी कहा जाता था कि वह शीशे पर भी गेंद को स्पिन करा सकते थे. उन्होंने भारत के लिए 36 टेस्ट खेले और 149 विकेट लिए.
लेकिन उन्हें बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थतियों में क्रिकेट को अलविदा कहना पड़ा.
कृपाल सिंह की नादानी
1964 के इंग्लैंड दौरे के दौरान भारतीय टीम दिल्ली के इंपीरियल होटल में ठहरी हुई थी. होटल की रिसेप्शिनिस्ट ने शिकायत की कि उसके साथ भारतीय टीम के एक खिलाड़ी ने फोन पर छेड़छाड़ की है.
जिस कमरे से फ़ोन गया था वह कमरा सुभाष गुप्ते का था और उनके रूम-मेट एजी कृपाल सिंह थे. कृपाल सिंह ने रिसेपशनिस्ट को फ़ोन कर कहा था कि क्या वह उनके साथ बाहर घूमने जा सकती हैं.

रिसेपशनिस्ट ने इसकी शिकायत भारतीय मैनेजर से कर दी. गुप्ते और कृपाल सिंह को इस शिकायत के आधार पर अगले दो टेस्ट मैचों के लिए भारतीय टीम से हटा दिया गया.
कृपाल सिंह ने बाद में सुभाष के सामने अपनी गलती मानी. जब सुभाष ने यह बात बोर्ड के एक सदस्य को बताई तो उन्होंने कहा कि उन्होंने कृपाल को अपने कमरे का फ़ोन क्यों इस्तेमाल करने दिया.
इस पर सुभाष ने कहा कि ‘वह वयस्क और समझदार पुरुष हैं. मैं उनको कैसे रोक सकता था?‘
उस टीम के कप्तान नारी कान्ट्रेक्टर ने कृपाल सिंह से इस बारे में पूछा तो न सिर्फ उन्होंने पूरी बात स्वीकार की बल्कि यह भी कहा कि वह बोर्ड प्रमुख चिदम्बरम से इस बारे में सब कुछ बता देंगे.
मैच के अंतिम दिन चिदम्बरम ने नारी को बुला कर कहा कि इन दोनों का अगले टेस्ट के लिए नहीं चुना जाएगा. उन्होंने उन्हें समझाने की कोशिश भी की लेकिन यह साफ था कि कृपाल सिंह ने चिदम्बरम को कोई सफा़ई नहीं दी थी.
इस तरह महज़ 34 साल की उम्र में एक महान खिलाड़ी के करियर का अंत हो गया. इसके बाद उन्होंने कोई क्रिकेट नहीं खेली और वो वेस्ट इंडीज़ चले गए. उन्होंने वहाँ शादी की और फिर वहीं बस गए.
इसके बाद वह भारत नहीं लौटे. बाद में मिहिर बोस ने अपनी किताब 'द हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन क्रिकेट' में लिखा ‘भारत के पहले महान स्पिनर सुभाष गुप्ते का करियर इसलिए समाप्त हो गय़ा क्योंकि वो एक ऐसे शख़्स के साथ रूम शेयर कर रहे थे जो एक लड़की के साथ एक ड्रिंक्स पीना चाहता था.’
गुप्ते की जलाई मशाल को उनके बाद के भारतीय <link type="page"><caption> स्पिनरों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/sport/2012/11/121126_cricket_india_england_ns.shtml" platform="highweb"/></link> ने भी जलाए रखा. 1958 में एक 12 साल के बच्चे ने इस महान स्पिनर के कारनामे की दास्तान वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ कानपुर टेस्ट की रेडियो कमेंट्री में सुनी.
सुभाष ने इस पारी में 102 रन दे कर 9 विकेट लिए थे. उस बच्चे ने तय किया कि अब से वह भी स्पिन गेंदबाज़ी करेगा. बड़ा होकर वह बच्चा बिशन सिंह बेदी के नाम से मशहूर हुआ.
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