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विराट कोहली : क्या क्रिकेट पिच पर ये उनका 'दूसरा जन्म' है?
- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, ऑस्ट्रेलिया से
अच्छे-बुरे दिन सबके आते हैं. समय से बड़ा कुछ नहीं. समय बदलते देर नहीं लगती. कहावत पुरानी है लेकिन असल ज़िन्दगी में आए-दिन हमसे-आपसे रूबरू होती रहती है.
भारतीय क्रिकेट में तो इसकी दर्जनों जीती-जागती मिसालें मिलेंगी और विराट कोहली इस फ़ेहरिस्त में फ़िलहाल टॉप पर हैं.
जनवरी 2022 की ही बात है जब दक्षिण अफ़्रीका से टेस्ट शृंखला हारने के बाद विराट कोहली ने टेस्ट कप्तानी भी छोड़ने का एलान कर दिया.
उन्होंने कहा था, "ये एक मुश्किल फ़ैसला था लेकिन मैंने कोई कसर नहीं छोड़ी इतने दिनों में, बतौर कप्तान, अपने रोल में".
इसके चार महीने पहले वे टी-20 की कप्तानी छोड़ चुके थे. बीच के दौर में उनकी जगह रोहित शर्मा को एक-दिवसीय कप्तानी भी सौंप दी गई थी.
ऑस्ट्रेलिया के पूर्व क्रिकेटर ब्रैड हॉग ने तब लिखा था कि "कोहली थोड़ा खोए हुए से लगने लगे हैं".
उन्होंने आगे लिखा, "वे चुप से हो गए हैं और बैटिंग के वक़्त उनकी आक्रामकता दिख नहीं रही. ये वो पुराने वाले विराट कोहली है ही नहीं जो खेल को अपने नियंत्रण में लेना चाहते थे. जबकि अभी उनमें पांच-छह साल का क्रिकेट बचा हुआ है."
पूर्व कप्तान कपिल देव ने भी कोहली को "ब्रेक लेने की सलाह" दी थी.
फिर एशिया कप में विराट कोहली ने अपने शतक के सूखे को तो दूर कर दिया लेकिन शॉट्स में वो पैनापन नहीं था जो उसके कुछ ही समय बाद मेलबर्न के एक लाख दर्शकों को मैदान में दिखा.
टी-20 विश्व कप के अपने पहले मैच में ही कोहली ने पाकिस्तान को हराने का बीड़ा अपने कंधों पर उठा लिया.
उस रात जिसने भी हैरिस राऊफ़ की गेंद पर कोहली के वो दो छक्के देखे उसे यक़ीन हो गया होगा कि विराट कोहली के नाम के बीच 'किंग' वापस लौटा देना चाहिए.
ज़हन में 1986 की उस शाम को शारजाह में लगाया गया जावेद मियाँदाद का छक्का लौट आया जिसे भारतीय फ़ैन्स की एक पीढ़ी ने टीवी स्क्रीन पर देखा था.
उसके बाद भारत ने पाकिस्तान को कई बार हराया लेकिन कुछ ही पारियों ने मियाँदाद के छक्के का जवाब दिया था.
अजय जडेजा का 1996 विश्व कप में वक़ार यूनुस के एक ओवर में 22 रन बनाना और फिर 2003 के विश्व कप में सेंचूरियन के मैदान में सचिन तेंदुलकर का शोएब अख़्तर की गेंद पर अपर-कट के ज़रिए छक्का मारना.
किसी भारतीय क्रिकेट फ़ैन के लिए कोहली के वे छक्के एक बड़े मलहम थे.
अब विराट ने मेलबर्न में न सिर्फ़ वो दर्जा हासिल किया बल्कि अपनी वापसी भी की है.
क्या आपने भी देखा कि कोहली अब चौका-छक्का लगाकर विपक्षी गेंदबाज़ या फ़ैन्स की तरफ़ नहीं बल्कि ख़ुद से बातें करते हैं, खुद का मनोबल बढ़ाने के लिए?
क्या आपने भी देखा है कि कोहली पिछले कुछ मैचों में जीत या अपनी अच्छी पारी के बाद अपनी उँगली आसमान की तरफ़ उठाकर ख़ुद से बातें करते हैं.
क्या आपने भी देखा है कि कोहली अब अर्धशतक या जीत पर दूसरों की तरफ़ बल्ला दिखाने के बजाय अपनी मुट्ठियाँ भींच कर ग्राउंड पर पंच करते हैं?
यक़ीनन, ये कोहली का एक नया रूप है, एक नया अवतार है.
साउथ अफ़्रीकन जर्नल ऑफ़ साइंस के एक लेख "द मीडीएटिंग रोल ऑफ़ मेंटल टफ़नेस" में मनोवैज्ञानिक आरजी काउडेन और एल क्रस्ट लिखते हैं, "खेल में मेंटल टफ़नेस किसी खिलाड़ी के उस जुझारू रवैए से ही आती है जो किसी चुनौती, सफलता और गलतियों से सीख कर उबर पाता है. उबरने के बाद उसकी बॉडी लैंग्वेज बदल जाती है".
इसी साल अगस्त महीने में बीसीसीआई टीवी को दिए एक इंटरव्यू में कोहली ने कहा था, "मेरा अल्टिमेट उद्देश्य टीम को जिताना होता है, टीम के लिए खेलना होता है और इसके लिए मैं लगातार मेहनत करके अपने को बेहतर बनाने की कोशिश में रहता हूँ. तो वो नहीं हो पा रहा था और मुझे अपने को धकेलना पड़ रहा था. बस मुझे पता नहीं था".
शायद यही वजह है कि विराट कोहली ने अपने धैर्य पर काम करना शुरू किया, परिवार के साथ छुट्टी मनाई और क़रीब एक महीने क्रिकेट से दूरी बना ली.
एशिया कप में 276 रन बनाने पर कोहली उस टूर्नामेंट के सर्वाधिक रन बटोरने वाले बल्लेबाज़ भी रहे और उनकी आइसीसी रैंकिंग्स में भी उछाल आया.
दक्षिण अफ़्रीका के पूर्व कप्तान शॉन पॉलक को लगता है "कोहली का फ़ोकस कभी ख़त्म नहीं हुआ था".
पॉलक कहते हैं, "कोहली वो प्लेयर है जो जल्दी मैच ख़त्म होने के बाद होटल के कमरे के बजाय जिम में दिखता है. ये निशानी इस बात की है कि उसे अगले मैच की तैयारी करनी होती है. एक-दो शृंखला नहीं चल पाना या दो सीज़न शतक न लगा पाने से किसी की ग्रेटनेस कम नहीं होती, फ़ॉर्म वापस लौटते देर नहीं लगती है".
भारतीय टीम के ऑस्ट्रेलिया पर कोहली से उम्मीदें बढ़ीं तो थीं लेकिन कई लोगों को इस बात पर शक़ था कि वे अब पहले की तरह मैच-विनर रहे हैं.
लेकिन हमेशा की तरह पाकिस्तान और भारत के बीच एक दीवार की तरह खड़े हो गए विराट कोहली.
मौक़ा भी था, दस्तूर भी.
160 रन का टार्गेट चेज़ करते हुए कोहली ने 53 गेंदों में 82 रन बना डाले, यानी आधे से ज़्यादा का स्कोर.
मैच के बाद उन्होंने कहा, "ये उस तरह का मैच था जिसके लिए आप क्रिकेट खेलते हैं. 14-15 साल बाद आपको इस तरह की चुनौतियाँ चाहिए होती हैं जिससे आप एक बार फिर जाग उठें और वो भी उस तरह से कि चलो फिर से शुरू करते हैं".
इस दौरे पर न सिर्फ़ कोहली के रन बनाने की भूख दिख रही है बल्कि अपने स्वभाव में एक ख़ास बदलाव लाने की ईमानदार कोशिश भी.
पाकिस्तान के ख़िलाफ़ हुए पहले मैच के लिए टीम को दो दिन नेट प्रैक्टिस करनी थी जो ऑप्शनल थी. यानी जो प्लेयर करना चाहे वे कर सकते हैं.
विराट दोनों दिन प्रैक्टिस में आए और सबसे ज़्यादा बैटिंग की. कोच राहुल द्रविड़ उन्हें लगातार बैटिंग करते देखते रहे और बाद में उनमें लंबी चर्चा भी हुई.
फ़ील्ड में भी इन दिनों कोहली का पहले वाला 'ग़ुस्सैल स्वरूप' देखने को नहीं मिलता और वे आम तौर पर हंसते रहते हैं. दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ पर्थ में हुए मैच में उनसे बाउंड्री पर एक कैच छूट गया. अपने पर ग़ुस्सा या बड़बड़ाने के बजाय वे निराशा में भी मुस्कुरा उठे.
न्यूज़ीलैंड के पूर्व क्रिकेटर साइमन ड्यूल के मुताबिक़, "विराट कोहली जैसे खिलाड़ी को बस अपने उस ज़ोन में पहुँचने की देर होती है जिसके बाद वो सिर्फ़ बेहतर होता चला जाता है. बड़े प्लेयर्स को इस ज़ोन में जाने में ज़्यादा समय नहीं लगता लेकिन थोड़ा ज़्यादा समय हो जाए तो आलोचना शुरू हो जाती है. कोहली का कमबैक बड़े प्लेयर की निशानी है".
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