पूजा रानीः भिवानी में चुपके से बॉक्सिंग करने से लेकर ओलंपिक तक

    • Author, वंदना
    • पदनाम, टीवी संपादक, भारतीय भाषाएं

बॉक्सिंग में एक और ओलंपिक पदक पक्का करवाने वाली पूजा रानी भारत की दूसरी बॉक्सर बन सकती हैं.

पूजा को पदक पक्का करने के लिए चीन की जिस खिलाड़ी के साथ खेलना है उनसे वो तीन बार पहले हार चुकी हैं.

टोक्यो में अपना पहला ओलंपिक खेलने का दबाव और ढेर सारी उम्मीदें, लेकिन 75 किलोग्राम भार वर्ग में खेलने वाली पूजा इन सब पर खरी उतर रही हैं.

घर वालों से छिप कर बॉक्सिंग

एक वक़्त था जब स्कूल में पूजा को घरवालों से डर-डर कर, छिप छिप कर बॉक्सिंग करनी पड़ती थी. भिवानी के पास हवा सिंह बॉक्सिंग एकेडमी में पूजा चोरी चोरी जाकर खेलती थी. तब विजेंदर सिंह ने बॉक्सिंग में ओलंपिक पदक जीता था और भिवानी की हवा में बॉक्सिंग घुल चुकी थी.

बॉक्सिंग रिंग में मिलने वाला वो जोश ऐसा था कि हरियाणा में भिवानी के पास से आने वाली पूजा भी बॉक्सिंग करने लगी. लेकिन पुलिस में काम करने वाले पिता इसके सख़्त ख़िलाफ़ थे.

कई मीडिया इंटरव्यू में पूजा बताती आई हैं कि कैसे उनके पिता ने साफ़ मना कर दिया था कि कोई दूसरा खेल चलेगा लेकिन बॉक्सिंग नहीं. वजह चोट का डर.

पूजा कुछ दिन तो छिप छिपाकर बॉक्सिंग करती रहीं लेकिन फिर पिता को पता चल ही गयी. पूजा ने आख़िरी दिन जाने की अनुमति माँगी और कोच संजय शर्मा से सारी बात बताई और कोच ने उनके पिता को आख़िरकार मनवाया.

पूजा दिलचस्प किस्सा बताती हैं कि जब कभी बॉक्सिंग करते हुए ज़्यादा चोट लग जाती तो उन्हें पिता से छिपाना पड़ता. कोच के घर ही रुक जातीं और कोच की पत्नी यही कहतीं कि कोच साहब नहीं है तो वो पूजा को अपने पास रख रही हैं. डर यही था कि कहीं पिता चोट देख बॉक्सिंग रुकवा न दें.

जब रियो ओलंपिक नहीं खेल सकीं पूजा

हालांकि जैसे ही 2009-2010 में पूजा ने नैशनल में यूथ मेडल जीता तो जैसे सब कुछ बदल गया. मुख़ालफ़त करने वाले पिता उनके सबसे बड़े समर्थक बन गए और शुरू हुआ बॉक्सिंग का लंबा सफ़र जो अब टोक्यो ओलंपिक तक आ पहुँचा.

इस सफ़र में बहुत से मैच जीते और कुछ हारे भी, बहुत बार चोट भी लगी. लेकिन पूजा मानती हैं कि बॉक्सर के लिए चोट ही उनका गहना होता है.

इस बीच 2017 में दीवाली के दौरान उनका हाथ ऐसा जला कि उन्हें खेल से बाहर रहना पड़ा. और उसके बाद उन्हें कंधे की चोट लगी जो करियर में कुछ समय के लिए रुकावट बनी. ज़ाहिर है इस दौर ने पूजा को मानसिक तौर पर भी प्रभावित किया. वो अनिश्चितिता का दौरा था.

इन सब कारणों से पूजा ने 81 किलोवर्ग में भी कुछ समय के लिए खेला है, क्योंकि इस वर्ग में कम खिलाड़ी होते हैं लेकिन कोच की सलाह पर वे 75 किलो वर्ग में लौटीं.

इससे पहले सपना तो रियो ओलंपिक में खेलने का था पर रियो में पूजा क्वालीफ़ाई नहीं कर पाईं. लेकिन पूजा की कोशिश ख़त्म नहीं हुई.

30 की उम्र में ओलंपिक खेलने का सपना पूरा हुआ

30 साल की उम्र में पूजा ने टोक्यो में अपना पहला ओलंपिक खेला और सपना पूरा किया.

टोक्यो में अपने पहले ओलंपिक मैच में अल्जीरिया की जिस खिलाड़ी को पूजा ने हराया था वो उनसे 10 साल छोटी थीं और जीत का मार्जन था 5-0.

उनकी प्रतिद्वंदी भले ही उम्र में उनसे छोटी हों लेकिन पूजा का खेल बहुत सटीक और स्मार्ट रहता है और अपने स्किल से वो मात देती आई हैं.

दरअसल टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालीफ़ाई करने वाली वो पहली भारतीय महिला बॉक्सर थीं और इत्तेफ़ाक से उस दिन महिला दिवस था.

पदकों की फ़ेहरिस्त लंबी है- 2012 में एशियन चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल, 2014 की एशियन गेम्स में कांस्य पदक और अभी 2021 में एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में गोल्ड अपने नाम किया था.

जीत हासिल करने किए पूजा कई तरह की स्ट्रेजी पर काम करने में यक़ीन रखती हैं.

अपने प्रतिद्वंदियों के बारे में अच्छे से जानने समझने का काम और वीडियो देख उनके खेल की बारिकियाँ जानने का काम तो चलता ही है, साथ ही पूजा नए-नए प्रयोग भी करती हैं. इस बार पूजा ने तैयारी के दौरान पुरुष बॉक्सरों के साथ ख़ूब प्रैक्टिस की.

अपनी मेहनत, हार न मानने की आदत, सेटबैक के बावजूद कमबैक का हौसला और तमाम चढ़ाव के बाद हरियाणा की इस खिलाड़ी ने वाकई अपना हर सपना पूरा किया है.

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