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टोक्यो ओलंपिक में भारत को क्या रोइंग दिला पाएगा मेडल की ख़ुशी?
- Author, राखी शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
क्रिकेट, फ़ुटबॉल और हॉकी से बिलकुल अलग एक खेल है, जिसका नाम भी भारत में बहुत कम लोग जानते हैं- रोइंग. ये एक पानी पर खेला जाने वाला खेल है जिसमें एक नाव और उसे पतवार के सहारे चलाने वाले रोवर की ज़रूरत होती है.
इस मुश्किल खेल को भारत में इसलिए कम लोग जानते हैं क्योंकि अभी तक इसमें ओलंपिक स्तर पर कोई भी मेडल नहीं जीत पाया है.
इसे बदलने की ज़िम्मेदारी इस बार दो लोगों के कंधों पर है- अर्जुन लाल जट और अरविंद सिंह.
भारतीय सेना में भर्ती अर्जुन और अरविंद ने पिछले दिनों टोक्यो में हुए क्वॉलिफ़िकेशन इवेंट में सिलवर मेडल जीतकर 23 जुलाई से होने वाले खेलों का टिकट हासिल किया. ये दोनों पुरुषों के लाइटवेट डबल्स स्कल्स में हिस्सा लेंगे.
ये पहला मौक़ा है जब रोइंग के डबल्स इवेंट में भारत ने सिलवर मेडल के साथ ओलंपिक क्वॉलिफ़िकेशन हासिल किया है और वो भी टोक्यो में ही जहां पर ओलंपिक खेल होने हैं.
कोरोना वायरस के ख़तरे को देखते हुए जापान में ये क्वॉलिफ़ायर बहुत सख़्त क़ायदों के साथ कराया गया, जिसका दबाव दोनों भारतीय रोवर अर्जुन और अरविंद ने भी महसूस किया.
अर्जुन कहते हैं, "हम यहां से डरते हुए गए थे. किसी एक टीम मेंबर के भी कोरोना पॉज़िटिव होने पर पूरी टीम को ड्रॉप किया जा रहा था. श्रीलंका के साथ ऐसा हो गया था तो हमारे कोच इस्माइल बेग ने भी यही कहा कि अपनी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखना है."
2017 से एक साथ है जोड़ी
वहीं अरविंद का भी अनुभव कुछ ऐसा रहा, "हमें मालूम था कि टोक्यो के इवेंट में हालात कैसे होंगे, मुक़ाबले में कैसी लहरों के बीच हमें रोइंग करनी है. रेस के लिए हम पूरी तरह से तैयार थे, पर कोरोना का डर तो था, इसलिए हम पूरा वक़्त मास्क लगाकर ही रखते थे. बस रेस में ही अपना मास्क उतारते थे."
अर्जुन और अरविंद की साथ में ये पहली रेस नहीं है. ये दोनों एक दूसरे को 2017 से जानते हैं और 2018 से कई प्रतियोगिताओं में साथ हिस्सा लेते रहे हैं.
2019 के साउथ कोरिया में हुए एशियन चैम्पियनशिप में इन दोनों ने सिलवर मेडल हासिल किया था. इसके अलावा नेशनल लेवल पर भी ये दोनों एक साथ गोल्ड और सिल्वर मेडल जीत चुके हैं.
अर्जुन, अरविंद के साथ अपनी दोस्ती के बारे में कहते हैं, "हम दोनों 2018 से एक साथ भाग लेते आ रहे हैं. मैंने आजतक अपनी सभी रेस अरविंद के साथ ही खेली हैं. किसी भी रेस से पहले हम एक दूसरे को यही कहकर मोटीवेट करते हैं कि अपना बेस्ट करेंगे. हम दोनों की अच्छी बनती है. हम साथ में ख़ूब बातचीत करते हैं. इसी भरोसे का असर रेस में दिखाई देता है."
24 साल के अर्जुन राजस्थान के जयपुर में शाहपुरा के गांव नया बास के रहने वाले हैं. उनके पिता किसान हैं जबकि दो और भाई उन्हीं की तरह आर्मी में हैं. अपने घर से ये पहले सदस्य हैं जो किसी खेल में हिस्सा ले रहे हैं. आर्मी में आने से पहले अर्जुन ने रोइंग का नाम तक नहीं सुना था.
उन्होंने बताया, "मैं नहीं जानता था रोइंग क्या होता है. हमारे ओलंपियन बजरंग लाल ताखर कोच हमें लेकर गए थे. उन्होंने जब बताया कि हमें रोइंग के लिए चुना गया है तो पहले मुझे कुछ समझ नहीं आया. फिर धीरे-धारे इसे करते हुए हमें ये खेल समझ आने लगा."
सेना से जुड़ने का फ़ायदा मिला
वहीं अरविंद उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर ज़िले के खबरा गांव से आते हैं. उन्हें खेलों में पहले से ही रुचि थी. आर्मी में भर्ती होने के साथ ही उन्होंने रोइंग की भी ट्रेनिंग शुरू कर दी.
उन्होंने बताया, "मैं पहली बार जब आर्मी के स्पोर्ट्स क्लब गया तो मुझसे पूछा गया कि क्या मैं रोइंग करना पसंद करूंगा. मैंने इस खेल को देखा, मुझे पसंद आया और मैंने हामी भर दी. अब मैं इसमें काफ़ी अच्छा हो गया हूं और इसे छोड़ने का कोई इरादा नहीं है."
भारत ने रोइंग में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई मेडल जीते हैं. इसमें एशियन गेम्स, एशियन चैम्पयनशिप जैसे इवेंट शामिल हैं.
ओलंपिक में रोइंग में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले कुछ नाम दत्तु बब्बन, क़ासिम ख़ान, देवेंद्र कुमार खंडवाल, संदीप कुमार, मनजीत सिंह, सवर्ण सिंह और बजरंग लाल ताखर के रूप में याद आते हैं. लेकिन इनमें से कोई भी खेलों के सबसे बड़े महाकुंभ में पोडियम फ़िनिश नहीं कर पाया है.
अरविंद सिंह का मानना है कि ओलंपिक्स में मेडल जीतने से ही इस खेल का नाम होगा.
उन्होंने बताया, "रोइंग जैसे खेल में ओलंपिक मेडल जीतना हमारे लिए बेहद ज़रूरी है. ओलंपिक क्वॉलिफ़िकेशन हासिल करने से लोग इस खेल के बारे में बातें करने लगे हैं. अगर हम मेडल जीतेंगे तो इस खेल का और नाम होगा."
टोक्यो ओलंपिक के क्वॉलिफ़िकेशन की 2000 मीटर की रेस में भारतीय रोवर 6:36.92 सेकेंड के टाइम के साथ जापान के बाद दूसरे नंबर पर रहे थे.
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