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अंग्रेज़ों ने कैसे पहली भारतीय क्रिकेट टीम बनाई
- Author, डॉ प्रशांत किदाम्बी
- पदनाम, इतिहासकार, बीबीसी हिंदी के लिए
कहा जाता है कि क्रिकेट एक भारतीय खेल है, जिसका आविष्कार अनजाने में अंग्रेज़ों ने किया.
ये एक ऐतिहासिक विडंबना है कि जिस खेल को औपनिवेशिक कुलीन वर्ग ने संरक्षित किया वो आज पूर्व उपनिवेश का नेशनल पैशन बन गया है.
इतनी ही ख़ास बात ये भी है कि भारत दुनिया के क्रिकेट में एकमात्र महाशक्ति बनकर उभरा है.
भारत के लोगों के लिए उनकी क्रिकेट टीम ही राष्ट्र है. वो 'टीम इंडिया' को राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के तौर पर देखते हैं. और उसके खिलाड़ियों में देश की विविधता की झलक पाते हैं.
क्रिकेट कंट्री
2011 में पूर्व क्रिकेटर राहुल द्रविड़ ने कहा था, "इस पिछले दशक में, भारतीय टीम ने विभिन्न संस्कृतियों, विभिन्न भाषाएं बोलने वालों, विभिन्न धर्मों को मानने वालों, विभिन्न वर्गों से आने वाले लोगों के हमारे देश का प्रतिनिधित्व किया है. ऐसा पहली बार हुआ है."
लेकिन क्रिकेट और देश के बीच का ये संबंध ना तो स्वाभाविक है और ना ही अनिवार्य.
12 साल की कोशिशों और तीन बार रद्द होने के बाद पहली भारतीय टीम 1911 की गर्मियों में क्रिकेट मैदान तक पहुंची थी.
और आम धारणा के उलट - जैसा कि हिंदी फ़िल्म लगान में दिखाया गया है - 'राष्ट्रीय टीम' अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ नहीं, बल्की उनके द्वारा बनाई गई थी.
क्रिकेट पिच पर भारत को लाने का आइडिया भारतीय व्यापारियों, राजसी और अमीर वर्ग, ब्रिटिश गवर्नरों के साथ काम करने वालों, सरकारी कर्मचारियों, पत्रकारों, सिपाहियों और प्रोफेशनल कोचों ने मिलकर साकार किया था.
औपनिवेशिक और स्थानीय कुलीन वर्ग के बीच के इस गठबंधन की वजह से ही भारत की क्रिकेट टीम, विराट कोहली की टीम के 2019 के आईसीसी वर्ल्ड कप में जाने से पहले सौ से ज़्यादा बार ब्रिटेन में जाकर खेल चुकी है.
जादुई रणजी
"भारतीय" क्रिकेट टीम बनाने की योजना का लंबा और पेचीदा इतिहास रहा है. इसे लेकर पहला विचार 1898 में तब आया था, जब भारतीय राजकुमार श्री रणजीत सिंहजी या रणजी ने अपनी शानदार बल्लेबाज़ी से ब्रिटेन और पूरी दुनिया को सम्मोहित कर दिया था.
इसके बाद भारतीय क्रिकेट टीम के प्रमोटरों ने सोचा की एक पूरी टीम बनाई जानी चाहिए. लेकिन क्रिकेट से मिली कीर्ति का इस्तेमाल नवानगर का शासक बनने के लिए करने वाले रणजी इस प्रोजेक्ट को लेकर चौकन्ने हो गए. क्योंकि उन्हें लग रहा था कि इससे उनकी राष्ट्रीयता, ख़ासकर क्रिकेट के मैदान पर इंग्लैंड की टीम का प्रतिनिधित्व करने के अधिकार पर सवाल उठ सकते हैं.
अंग्रेज़ी हुकूमत में भी कई लोग, जिनमें ख़ास तौर पर तबके बॉम्बे के पूर्व गवर्नर लॉर्ड हैरिस ने कभी भी रणजी की क्रिकेट सफलता को स्वीकार नहीं किया और वो हमेशा उन्हें "प्रवासी पक्षी" कहते रहे.
चार साल बाद, एक और कोशिश हुई. औपनिवेशिक भारत में यूरोपीयों ने ताक़तवर स्थानीय रईसों के साथ मिलकर भारतीय टीम बनाने की सोची.
लेकिन ये कोशिश फिरसे नाकाम हो गई. ऐसा प्रस्तावित टीम में प्रतिनिधत्व के सवाल पर हिंदुओं, पारसियों और मुसलमानों के बीच के विभाजन की वजह से हुआ.
1906 में हुई कोशिश भी पहले की तरह नाकाम रही थी.
साल 1907 और 1909 के बीच युवा भारतीयों में 'क्रांतिकारी' हिंसा की लहर देखी गई, जिन्होंने ब्रिटेन के अधिकारियों और उनके स्थानीय सहयोगियों को निशाने पर लिया.
इसके बाद ब्रिटेन में मांग उठने लगी कि भारतीयों को देश में खुला घुमने से रोका जाए.
दिलचस्प कास्ट
इस तरह की घटनाओं से हुए नकारात्मक प्रचार से निराश प्रमुख व्यापारियों और लोकप्रिय हस्तियों के साथ प्रमुख भारतीय राजकुमारों ने क्रिकेट टीम बनाकर लंदन भेजने के प्रोजेक्ट को पुनर्जीवित करने के बारे में सोचा.
ये वो ऐतिहासिक संदर्भ है, जिसके तहत पहली "ऑल-इंडिया" क्रिकेट टीम ने आकार लिया.
भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए जिन लोगों को चुना गया, वो बहुत ही अलग-अलग तरह के लोग थे.
टीम के कप्तान थे 19 साल के भूपिंदर सिंह. जो पटियाला से थे. वो भारत के सबसे शक्तिशाली सिख राज्य के नए-नए महाराजा थे.
बाक़ी की टीम को धर्म के आधार पर चुना गया था: इनमें छह पारसी, पांच हिंदू और तीन मुसलमान थे.
इस पहली भारतीय क्रिकेट टीम में सबसे ख़ास बात ये थी कि दो दलित इस टीम का हिस्सा थे. ये पालवंकर भाई, बालू और शिवराम तब के बॉम्बे से थे. वो जातिव्यवस्था को चुनौती देते हुए अपने वक़्त के शीर्ष क्रिकेटर बने.
ये टीम दिखाती है कि कैसे 20वीं शताब्दी की शुरुआत के दौरान औपनिवेशिक भारत में क्रिकेट ने सांस्कृतिक और राजनीतिक झलक पेश की.
पारसियों के लिए क्रिकेट का मैदान ख़ास महत्व लेकर आया था, वो भी ऐसे वक़्त में जब उनके समुदाय के ह्रास को लेकर चिंताएं बढ़ने लगी थीं.
हिंदू और मुसलमान में पिच और दूसरी जगहों पर स्पर्धा ज़्यादा बढ़ गई थी. और पारसी ख़ुद की ढलान को लेकर चिंतित हो गए थे.
उत्तर भारत के मुस्लिमों के लिए भी क्रिकेट एक मौक़े की तरह आया था, जिससे वो उपमहाद्वीप में ब्रिटिश शासन द्वारा स्थापित राजनीतिक व्यवस्था के साथ नए संबंध स्थापित कर सकते थे.
ख़ास तौर पर, ये खेल औपनिवेशिक भारत में सबसे महत्वपूर्ण शैक्षिक पहलों में से एक का अभिन्न अंग था. इससे नई मुस्लिम राजनीतिक पहचान बनने में मदद मिली.
पहली भारतीय टीम में चार मुस्लिम खिलाड़ी थे. इनमें से तीन अलीगढ़ से थे.
उसी अलीगढ़ में सामाजिक सुधारक सर सैय्यद अहमद ख़ान ने अपने समुदाय में पश्चिमी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए जाने माने संस्थान, मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापनी की थी.
और क्रिकेट वो प्रिज़्म भी बन गया, जिसकी वजह से हिंदू समाज को जाति व्यवस्था के घातक असरों का पुनर्मूल्यांकन करने पर मजबूर होना पड़ा.
पालवंकरों के लिए क्रिकेट भेदभाव के ख़िलाफ़ न्याय और आत्मसम्मान का संघर्ष बन गया.
क्रिकेट में पैसा लगाने वाले और इसका आयोजन करने वाले साम्राज्य के प्रति निष्ठावान लोगों के लिए क्रिकेट भारत की सकारात्मक छवि का प्रचार का ज़रिया बन गया.
और इससे उन्होंने ब्रिटेन को ये आश्वासन दिया कि देश ब्रिटेन साम्राज्य का निष्ठावान हिस्सा बनकर रहेगा.
पहली ऑल-इंडिया क्रिकेट टीम के ग्रेट ब्रिटेन और उत्तरी आयरलैंड दौरा का मुख्य मक़सद यही था.
ये कोई संयोग की बात नहीं है कि इसी साल जॉर्ज पंचम को औपचारिक तौर पर लंदन में सम्राट का ताज पहनाया गया और फिर वो दिल्ली दरबार के लिए भारत के दौरे पर आए.
ऐसे वक़्त में इस भूला दिए गए इतिहास को याद करना ज़रूरी है जब उपमहाद्वीप में क्रिकेट को अति राष्ट्रवाद से जोड़ दिया गया है.
(डॉ प्रशांत किदाम्बी यूनिवर्सिटी ऑफ़ लेस्टर में औपनिवेशिक शहरी इतिहास के एसोसिएट प्रोफेसर हैं. उन्होंने 'क्रिकेट कंट्री: द अनटोल्ड हिस्ट्री ऑफ़ फ़र्स्ट ऑल इंडिया टीम' नाम से किताब भी लिखी है. जिसे पेंग्विन वीइकिंग ने पब्लिश किया है.)
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