BBC EXCLUSIVE: गोल्ड जीतने की ख़ुशी के बीच छलकी स्वप्ना की पीड़ा

    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, नई दिल्ली

"हाई-जंप इंवेट के लिए पैरों में सही फिट होने वाले जूते भी एशियन गेम्स के पहले मुझे नहीं मिल पाए."

"लेकिन गेम तो खेलना ही था, सो काम चलाऊ जूतों में मैंने वो खेल खेला और देश के लिए गोल्ड जीत कर लाई"

इंडोनेशिया के जकार्ता में चल रहे एशियन गेम्स में हिस्सा ले रही स्वप्ना बर्मन ने बीबीसी से ख़ास बातचीत में अपना दर्द साझा किया.

इस बार के एशियन गेम्स के हेप्टाथलॉन में पहली बार स्वप्ना बर्मन ने भारत को गोल्ड दिलाया.

हेप्टाथलॉन में सात इवेंट रहते हैं - 100 मीटर हर्डल, हाई जंप, शॉट पुट, लॉन्ग जंप, 200 मीटर, जेवलिन थ्रो, 800 मीटर.

लेकिन ये सब कर पाना पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी की स्वप्ना के लिए आसान नहीं था.

ख़ुशी के साथ दर्द भी

21 साल की स्वप्ना की खेलों में रुचि शुरुआत से ही थी. लेकिन एथलेटिक्स में उन्हें नाम करना है ये निश्चय उनका नहीं था.

अपने स्पोर्ट्स करियर के शुरुआती दिनों के बारे में स्वप्ना ने कहा, "ये करियर मेरे माता-पिता ने मेरे लिए चुना. लेकिन आज इस इवेंट में गोल्ड जीत कर मुझे बहुत खुशी है."

स्वप्ना की आवाज़ में गोल्ड जीतने की ख़नक साफ़ सुनाई दे रही थी. लेकिन अगले ही पल जो आवाज़ आई उसमें एक अलग तरह का दर्द भी सुनाई पड़ा.

स्वप्ना ने फिर सुनाई अपने संघर्ष की कहानी.

"बात 13 साल पुरानी है. मैं खेल में तो अच्छी थी. मेरे पिता इस बात को जानते थे. पापा रिक्शा चलाते थे. उसी रिक्शे में वो मुझे घर के पास के प्ले ग्राउंड तक छोड़ कर आते थे. वहीं से मेरे खेलने का सफर शुरू हुआ."

भारत में उनके गोल्ड जीतने के बाद ये बात सुर्खियों में छाई रही कि स्वप्ना के पिता रिक्शा चलाते हैं.

ये सवाल सुनते ही उन्होंने कहा, "ये बहुत साल पुरानी बात है. फिलहाल पिछले पांच साल से मेरे पिता बिस्तर पर हैं. उन्हें लकवा मार गया है. पर रिक्शा चलाने वाली बात उससे भी पहले की है. 2012 में मैं कोलकाता आ गई थी. मेरी ट्रेनिंग कोलकाता में ही हुई. पहले मैंने एथलेटिक्स की प्रैक्टिस शुरू की थी. फिर 2013 में मेरे कोच सुभाष सरकार ने मुझे हेप्टाथलॉन की प्रैक्टिस करने को कहा. लेकिन दोनों पैरों में छह उंगलियां होने की वजह से खेलने से पहले जूते ढूंढने में काफी मेहनत करनी पड़ी."

इतना कहते ही स्वप्ना एक बार फिर रुकी.

इस सवाल पर कि क्या 2013 से लेकर अब तक उनके मन में इस इवेंट को छोड़ देने का ख्याल कभी नहीं आया.

स्वप्ना कहतीं हैं, "इसी एशियन गेम्स के ठीक पहले ये ख्याल आया था. दरअसल जकार्ता पहुंचते ही मेरे मुंह के अंदर इंफेक्शन हो गया था. दर्द बर्दाश्त के बाहर था. एक पल के लिए सोचा इवेंट में हिस्सा न लूं. लेकिन फिर अपनी चार साल की मेहनत याद आई. एशियन गेम्स के लिए सालों का इंतजार किया था. कैसे इसे छोड़ सकती थी. इसलिए दर्द के साथ मैंने हिस्सा लिया. नतीजा आप सबके सामने है."

अपनी शोहरत के लिए स्वप्ना अपने माता पिता के साथ-साथ अपने कोच को सबसे ज्यादा धन्यवाद करती है.

स्वप्ना को इंतजार है अब अगले ओलंपिक गेम्स का. एशियन गेम्स के तुरंत बाद ही स्वप्ना ओलंपिक की तैयारियों में जुट जाएंगी.

(बीबीसी संवाददाता सुमिरन प्रीत कौर से बातचीत पर आधारित)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)