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राष्ट्रमंडल डायरी: मीराबाई चानू को देखकर नहीं लगता कि इतनी ताकत है इस लड़की में
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, राष्ट्रमंडल खेलगांव गोल्डकोस्ट से
मुश्किल से चार फ़ीट आठ इंच का कद. वज़न 48 किलो. देखने से चालीस किलो का भी नहीं लगता.
करारा स्टेडियम में पीठ पर बैग लटकाए चानू कॉफ़ी पी रही थीं तभी मेरी उन पर नज़र पड़ी. उन्होंने भी तुरंत पहचान लिया. अभी एक दिन पहले ही मिक्स्ड ज़ोन में उनसे बात हुई थी, जब उन्होंने भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता था.
मैंने उनसे बातचीत के लिए स्टेडियम के बाहर चलने के लिए कहा, क्योंकि हमें स्टेडियम के अंदर उनसे बात करने की इजाज़त नहीं थी. तुरंत मान गईं.
मैंने पूछा क्या जश्न मनाया आपने जीत के बाद? बोलीं, "सिर्फ़ घर फ़ोन किया और वहां हर एक से बात की. असली जश्न भारतीय टीम के इवेंट ख़त्म होने के बाद होगा. तब हम 'सेलिब्रेट' करेंगे. अभी तो काफ़ी टेंशन है. बाकी लोगों के प्रदर्शन के बारे में."
मैंने उनसे कहा कि कल शायद हम करारा स्टेडियम न आएं, क्योंकि भारत और पाकिस्तान का हॉकी मैच होना है. बोली आप मिस करेंगे. कल एक शर्तिया स्वर्ण पदक आ रहा है. 77 वर्ग किलोग्राम में सतीश शिवलिंगम सोने का पदक जीत रहे हैं.
चानू ने एक दिलचस्प बात ये बताई कि वो अपने पसंदीदा चावल भारत से लेकर चलती हैं और विदेश में जहां कहीं भी होती हैं उबाल कर खाती हैं. रियो ओलंपिक खेलों में वो ऐन मौके पर नर्वस हो गई थीं और अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई थीं. यहां गोल्ड कोस्ट में उन्हें देखकर यकीन ही नहीं हुआ कि ये वहीं चानू हैं.
ग़ज़ब का आत्मविश्वास. चेहरे पर हर वक्त खिली हुई मुस्कान और भारत के लिए अपना सब कुछ झोंक देने की चाह. तभी तो उन्होंने दूसरे नंबर पर आने वाली भारोत्तोलक से पूरे 26 किलो वज़न अधिक उठाया.
कितने आस्तिक होते हैं खिलाड़ी
करारा इनडोर स्टेडियम में जब पाकिस्तान के अबू सूफ़ियान वज़न उठाने आए तो उन्होंने ज़ोर से गुहार लगाई 'दाता इज्ज़त रखना आज.'
फिर वज़न उठाने से पहले वो एक बार फिर चीख़े, 'या अली.' पीछे से उनके कोच भी इतनी ज़ोर से दुआ मांग रहे थे कि हम तक आवाज़ आ रही थी. लेकिन ईश्वर ने शायद उनकी नहीं सुनी और वो वज़न नहीं उठा पाए.
भारत की संजीता चानू ने मंच पर घुसते ही पहले धरती को छुआ, जैसे मंदिर में घुसते हुए करते हैं. फिर दर्शकों की तरफ़ मुड़ीं और उनका झुककर अभिवादन किया. फिर वज़न उठाने से तुरंत पहले बार को भी चूमा.
क्लीन और जर्क में 112 किलो वज़न उठाने में उन्हें बिल्कुल तकलीफ़ नहीं हुई और भारत की झोली में एक और सोने का पदक आ गया. पिछले साल जब उन्हें अर्जन पुरस्कार नहीं दिया गया था तो उन्होंने बहुत विरोध प्रकट किया था.
स्वर्ण पदक जीतने के बाद जब मैं उनसे मिला तो मैंने उनसे मज़ाक किया अब आपको अर्जुन पुरस्कार जीतने से कौन रोकेगा ? संजीता ने ज़ोर का ठहाका लगाया और बोली आप सही कह रहे हैं.
डेढ़ किलो वज़न के अख़बार
गोल्ड कोस्ट में मैं दो चीज़ों से बहुत परेशान हूं. एक तो यहां के अख़बार इतने भारी होते हैं कि उनको उठाने में आपके हाथों में मोच आ जाए.
एक एक अख़बार में 100 से अधिक पन्ने और वज़न कम से कम डेढ़ किलो. मुझे बहुत संदेह है कि कोई भी पूरा अख़बार पढ़ पाता होगा. और ये खासे मंहगे भी हैं. हर अख़बार चार ऑस्ट्रेलियन डॉलर का यानी भारतीय मुद्रा में 200 रुपए का मिलता है.
दूसरी एक और चीज़ मुझे परेशान कर रही है, वो है बस में भी सीट बेल्ट बांधना. इसलिए नहीं कि वो मुझे पसंद नहीं, बल्कि इसलिए कि मैं इसका आदी नहीं हूं. भारत में कार में ड्राइवर और आगे बैठने वाले के लिए सीट बेल्ट बाँधना अभी तक लोग पूरी तरह नहीं सीख पाए हैं और यहाँ बस तक में सीट बेल्ट बाँधना ज़रूरी है.
ड्राइवर अपनी सीट पर बैठे-बैठे ही देख सकता है कि किस किस ने सीट बेल्ट नहीं बांधी है. बस तब तक आगे नहीं बढ़ती, जब तक सभी यात्रियों ने सीट बेल्ट न बाँध ली हो. मंहगाई का आलम ये है कि एक पानी की 250 एमएल की बोतल भी 5 डॉलर में मिलती है यानी 'सिर्फ़' 250 रुपए में.