भारत: दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड को अब कौन चलाएगा?

बीसीसीआई

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    • Author, आदेश कुमार गुप्त
    • पदनाम, खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

इन दिनों बीसीसीआई के सितारे पूरी तरह गर्दिश में हैं. आईपीएल सिर पर है और दुनिया के सबसे अमीर बोर्ड की हालत यह है कि उसे चलाने वाले पदाधिकारी असमंजस में हैं. जो कार्यकारी पदाधिकारी थे उनके अधिकारों में सुप्रीम कोर्ट के नियुक्त प्रशासकों ने कटौती कर दी है.

अब ये तनातनी कहां जाकर रूकेगी और बीसीसीआई का क्या होगा, ये सवाल यक्ष प्रश्न बन गया है और मामला सुलझने की सारी उम्मीदें सुप्रीम कोर्ट पर टिक गई हैं.

इस उलझी पहेली को लेकर क्रिकेट समीक्षक विजय लोकपल्ली कहते हैं, "इसमें दो राय नहीं कि यह मामला बेहद आगे बढ़ गया है. अगर देखा जाए तो प्रशासकों की समिति का पहला काम संविधान को लागू करना था जो अभी तक नहीं हो पाया है."

वो कहते हैं, "यह समिति अपनी रिपोर्ट दे चुकी है और इसका कहना है कि बीसीसीआई को देख रहे पदाधिकारियों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है. अब इन्हें हटना ही पड़ेगा. दूसरी तरफ प्रशासकों की समिति का काम बीसीसीआई को चलाना तो है नहीं. इसके लिए तो बीसीसीआई के अधिकारी ही चाहिए. यह बेहद मुश्किल है कि केवल दो अधिकारी बीसीसीआई को चलाएं."

विनोद राय

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क्या है पूरा मामला?

दरअसल पिछले दिनों विनोद राय की प्रमुखता वाली प्रशासकों की समिति ने बीसीसीआई के पदाधिकारी कार्यवाहक अध्यक्ष सी के खन्ना, सचिव अमिताभ चौधरी और कोषाध्यक्ष अनिरूद्ध चौधरी के अधिकार छीन लिए.

इसके तहत अब इन सभी पदाधिकारियों को अपनी यात्रा खर्चे के लिए अनुमति लेनी होगी. इसके अलावा उपसमिति की बैठक के लिए नोटिस देना होगा.

ये कोई बड़ा फ़ैसला नहीं ले सकते. बाहरी क़ानूनी सलाह के लिए खर्च नहीं कर सकते. जीएम मार्केटिंग प्रिया गुप्ता की नियुक्ति को भी मंजूरी देने से इंकार कर दिया गया है, जिनका सालाना वेतन 1.65 करोड़ रुपये है.

ऐसा माना जा रहा है कि क्रिकेटरों के कॉन्ट्रेक्ट पर सचिव अमिताभ चौधरी के दस्तखत से इंकार के बाद हालात बिगड़े.

इतना ही नही मीडिया अधिकार भी अब टेंडर की जगह ई-नीलामी से होंगे.

क्रिकेट समीक्षक विजय लोकपल्ली कहते हैं कि अगर देखा जाए तो जब से यह विवाद शुरू हुआ है तब से कोर्ट में सारा खर्च बीसीसीआई का ही हुआ है.

बिगड़ रही है बीसीसीआई की छवि

लोकपल्ली कहते हैं, "इससे पूरी दुनिया में ये ग़लत संदेश जा रहा है कि आज बीसीसीआई का प्रशासन इस स्तर पर पहुंच गया है कि अधिकारी आपस में सिर्फ और सिर्फ लड़ रहे हैं. लेकिन अगर यह तीनों अधिकारी हट जाएंगे तो कितनी तेज़ी से प्रशासकों की समिति संविधान को लागू करती है, ये देखना दिलचस्प होगा. इसके अलावा इस पर भी नज़र रहेगी कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश कितनी जल्दी आता है ताकि बीसीसीआई ठीक से चले."

भारत के खिलाड़ी शानदार खेलते हैं जिसके बदले बोर्ड के पास पैसा आता है.

क्या इसे क़ानूनी मामलों में बर्बाद किया जा सकता है ? वो भी सिर्फ अपनी स्थिति को बनाए रखने के लिए. अब ये निर्णय तो उन्हें लेना ही पड़ेगा साथ ही ये भी तय करना होगा कि अब कौन से अधिकारी निर्णय लेंगे. ये क़ानूनी लड़ाई बेहद लंबी खिंच गई है. इसमें खर्च हुए करोड़ों रुपये खिलाड़ियों के काम आ सकते हैं.

बीसीसीआई की छवि भी लगातार बिगड़ रही है. क्रिकेट का भी नुकसान हो रहा है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट भी चाहेगा कि मामला जल्द से जल्द सुलझ जाए.

सुप्रीम कोर्ट, उच्चतम न्यायालय

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प्रिया गुप्ता के पैकेज पर सवाल

विजल लोकपल्ली मानते हैं कि प्रशासकों की समिति क़ानूनी सीमाओं में रहकर ही काम करेगी.

जीएम मार्केटिंग प्रिया गुप्ता को लेकर वो सवाल करते हैं, "क्या इतने वेतन पर किसी को रखने की अनुमति है. ख़ुद विनोद राय बीसीसीआई से एक भी पैसा नहीं लेते. क्या 1.65 करोड़ रुपये सालाना वेतन वाले पद के लिए विज्ञापन निकाले गए थे."

विनोद राय की प्रमुखता वाली समिति कोई काम ऐसा नहीं कर सकती जिसकी बाद में आलोचना हो.

विजय लोकपल्ली मानते हैं कि आईपीएल पर इस विवाद का कोई असर नहीं पड़ेगा.

आईपीएल, इंडियन प्रीमियर लीग

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वो कहते हैं, "फिलहाल बीसीसीआई के कार्यकारी पदाधिकारी कोई नीतिगत फैसला नहीं ले सकते. ऐसे में बीसीसीआई और भारतीय क्रिकेट के भविष्य के लिए इस मामले को सुलझाया जाना चाहिए. अब सिर्फ और सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही कोई रास्ता दिखा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ही यह निर्णय ले सकता है कि बीसीसीआई कैसे चलेगा और कौन के अधिकारी इसे चलाएंगे. हमें सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा रखना चाहिए."

दूसरी तरफ एक और क्रिकेट समीक्षक अयाज़ मेमन इस पूरे मामले के लेकर कहते हैं कि बीसीसीआई के कार्यकारी पदाधिकारी और प्रशासकों की समिति के सदस्यों के रिश्ते पिछले साल से सुधरे ही नहीं.

बीसीसीआई के अधिकारी अपनी ताक़त छोड़ना नहीं चाहते लेकिन यह भी सच है कि प्रशासकों की समिति भी अपना काम पूरा नहीं कर सकी हैं.

वह बीसीसीआई के पुराने तौरतरीक़े को बदल नहीं सके.

लेकिन अब शायद बीसीसीआई को लोढ़ा समिति के सुझाव को पूरी तरह मानना ही पड़ेगा.

अगर बीसीसीआई इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अदालत में जाती है तो उसे ठोस कारण भी बताने होंगे.

जहां तक विनोद राय की बात है तो जून-जुलाई तक शायद उनका टर्म भी समाप्त हो जाए तो वह भी उससे पहले ही जितने भी आदेश हैं उन्हें लागू कराने की पूरी कोशिश करेंगे.

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