राहुल द्रविड़ ने जब एक अख़बार की ख़बर पर जताई नाराज़गी

    • Author, नवीन नेगी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

राहुल द्रविड़ जब तक भारतीय क्रिकेट टीम में खेलते रहे, एक संकटमोचक की भूमिका में रहे. ज़बरदस्त डिफेंस की वजह से ही उन्हें 'द वॉल' भी कहा जाता है.

जेंटलमैन गेम कहे जाने वाले क्रिकेट में राहुल एक परफैक्ट उदाहरण साबित हुए. उन्हें मैदान के भीतर कभी किसी विवाद में फंसते हुए नहीं देखा गया.

सिर्फ मैदान के भीतर ही नहीं उसके बाहर भी द्रविड़ ने अपनी सादगी से कई बार लोगों का दिल जीता है.

बचपन के क्लब के लिए बैटिंग

द्रविड़ ने साल 2012 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया था.

अक्तूबर 2013 में कर्नाटक स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन (केएससीए) के ग्रुप I में डिविजन II का मुकाबला खेला जाना था. यह मैच बेंगलुरू यूनाइटेड क्रिकेट क्लब (बीयूसीसी) और फ्रेंड्स यूनियन क्रिकेट क्लब (एफयूसीसी) के बीच था.

द्रविड़ बचपन में बीयूसीसी क्लब की तरफ से खेलते थे. जो भी टीम इस मैच को जीतती वह ग्रुप में टॉप-2 में काबिज़ हो जाती. इसलिए द्रविड़ के क्लब के लिए यह मैच बेहद ज़रूरी था.

दो दिन के इस मुकाबले में द्रविड़ ने पहले दिन फील्डिंग की. वे अपनी पसंदीदा जगह स्लिप पर खड़े रहे और सबसे सीनियर खिलाड़ी होने के नाते पूरे 82 ओवर तक फील्ड में मौजूद रहे.

बल्लेबाजी में द्रविड़ ने शानदार शतक लगाते हुए सबसे ज़्यादा 113 रनों की पारी खेली. उनकी इस पारी की मदद से उनके क्लब को फ़ाइनल में जगह बनाने में मदद मिली.

पैरालंपिक स्वीमर के बने मेंटर

राहुल द्रविड़ ने भारत के पैरालंपिक स्वीमर शरथ गायकवाड़ की उस समय मदद की जब वे स्वीमिंग छोड़ने के बारे में सोच रहे थे.

साल 2014 में करियर के उतार-चढ़ाव के चलते शरथ ने स्वीमिंग छोड़ने का मन बना लिया था. तब द्रविड़ ने उनके मेंटर की भूमिका निभाई.

द्रविड़ ने शरथ को अपने करियर के कई उदाहरण देकर समझाया कि किस तरह मुश्किल हालात का सामना किया जाता है.

एक इंटरव्यू में शरथ बताते हैं कि द्रविड़ ने कभी भी कोई चीज़ उनपर थोपने की कोशिश नहीं की, वे उन्हें दुनिया के बेहतरीन एथलीटों की कहानियां बताते थे.

द्रविड़ ने शरथ के साथ अपना वह अनुभव साझा किया जब वो भी क्रिकेट से रिटायर होने के बारे में सोचने लगे थे. तब द्रविड़ को लगने लगा था कि शायद उनकी फिटनेस बेहतर नहीं रही. लेकिन फिर किस तरह उन्होंने खुद को इस हालात से उबारा.

यह द्रविड़ की सीख का ही नतीजा था कि शरथ ने साल 2014 के एशियन पैरा गेम्स में हिस्सा लिया और 6 पदक जीतने में कामयाब रहे. उन्होंने बहुस्पर्धी टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा पदक जीतने के पीटी ऊषा (5 पदक) के भारतीय रिकॉर्ड को भी ध्वस्त कर दिया.

फ़ोन पर पीटरसन को दी सलाह

इंग्लैंड के बल्लेबाज केविन पीटरसन अपनी आक्रामक बल्लेबाजी के लिए दुनिया भर में मशहूर रहे, लेकिन जब उनका क्रिकेट फॉर्म डावांडोल होने लगा तो उन्हें सलाह मिली अपनी रक्षात्मक बल्लेबाज़ी के लिए मशहूर रहे राहुल द्रविड़ से.

2010 में इंग्लैंड की टीम बांग्लादेश के दौरे पर थी. पीटरसन पर रन बनाने का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा था क्योंकि 2008 से उन्होंने कोई बड़ी पारी नहीं खेली थी.

बांग्लादेश के ख़िलाफ़ मैदान में उतरने से पहले पीटरसन ने द्रविड़ के साथ फोन पर बात की. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में पीटरसन ने उस फोन कॉल के बारे में बताया था.

उन्होंने कहा, ''मैंने द्रविड़ से फोन पर बात की और स्पिन को बेहतर तरीके से खेलने के गुर सीखे. द्रविड़ के साथ मैं आईपीएल में खेल चुका था साथ ही भारत के ख़िलाफ़ खेलते हुए भी मैंने उन्हें करीब से देखा था कि वे किस तरह स्पिन गेंदबाजी का सामना करते हैं.''

पीटरसन ने आगे बताया,''द्रविड़ ने मुझे बेहद ज़रूरी सलाह दीं, उन्होंने मुझे बताया कि मेरा हाथ किस जगह रहना चाहिए, किस वक्त पर मुझे फ्रंट फुट आगे निकालना चाहिए. मैंने उनकी सलाह मानी और कामयाब रहा.''

पीटरसन ने बाद में अपनी ऑटोबायोग्राफी में भी द्रविड़ का ज़िक्र किया और बताया कि द्रविड़ ने ईमेल के ज़रिए भी उन्हें कई टिप्स दिए थे.

द्रविड़ ने बताया असली 'हीरो' का मतलब

ईएसपीएन क्रिकइंफो से प्रकाशित 'राहुल द्रविड़ टाइमलेस स्टील' किताब में राहुल द्रविड़ की पत्नी विजयेता ने उनके कई किस्सों को साझा किया.

ऐसे ही एक वाकये का ज़िक्र करते हुए विजयेता ने लिखा, 2004 में द्रविड़ को सौरव गांगुली के साथ पद्मश्री मिला था, सम्मान मिलने के अगले दिन अख़बार में पहले पन्ने पर दोनों की तस्वीरें छपी हुई थी, उसे देखकर उन्होंने कहा था कि पहले पन्ने पर ऐसी फ़ोटो का छपना दुर्भाग्यपूर्ण है.

द्रविड़ का मानना है कि हीरो शब्द का इस्तेमाल बहुत संभल कर करना चाहिए और वास्तविक हीरो तो हमारे सैनिक, वैज्ञानिक और डॉक्टर हैं.

विजयेता ने अपनी शादी से पहले के किस्से भी साझा किए हैं. उन्होंने लिखा है, शादी से पहले राहुल द्रविड़ एकाध बार नागपुर में मेरे घर खाना खाने आए थे.

उस दौरान कभी नहीं लगा कि वे भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार हैं. क्योंकि वे अपने बारे में कुछ बोल ही नहीं रहे थे, वे क्रिकेट से ज़्यादा मेरी मेडिकल की पढ़ाई और मेरी इंटर्नशिप के बारे में जानना चाहते थे. वे दूसरे लोग और उनके काम को ज़्यादा गंभीरता से लेने वाले हैं, ख़ुद को नहीं.

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