राम रहीम के डेरे में हुई थी भारत-पाकिस्तान की टक्कर

डेरे के अंदर है स्टेडियम

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    • Author, आदेश कुमार गुप्त
    • पदनाम, खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

पिछले दिनों जब गुरमीत राम रहीम के साथ भारत के कप्तान विराट कोहली और पूर्व विकेट कीपर बल्लेबाज़ विजय दहिया की तस्वीर सोशल मीडिया में सार्वजनिक हुई तो शायद ही किसी को आश्चर्य हुआ हो.

भारत में जब कोई व्यक्ति शक्ति, आस्था, धर्म, राजनीति, खेल, फ़िल्म या दूसरे माध्यमों से शीर्ष पर पहुंचता हो तो उससे मिलने वालों की भीड़ में सभी शामिल हो जाते हैं. आज बाबा के क़िस्से चटखारे ले-लेकर बताए और सुनाए जा रहे हैं तो उन क़िस्सों से भला खेल भी कैसे बच सकता है.

मुझे याद है कि कैसे सिरसा स्थित डेरे में बने हुए एक शानदार स्टेडियम में साल 2004 के दिसंबर महीने में भारत और पाकिस्तान के पूर्व खिलाड़ियों के बीच एक दोस्ताना मैच का आयोजन किया गया था. इतना ही नहीं उस मैच का सीधा प्रसारण दूरदर्शन पर भी किया गया था.

गुरमीत राम रहीम

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पाकिस्तान के कप्तान थे सईद अनवर

मैं एक स्टैंडबाई कमेंटेटर के तौर पर दूरदर्शन की टीम के साथ था. उस मैच में भारत की कप्तानी पूर्व विकेटकीपर बल्लेबाज़ सैयद किरमानी ने की थी जबकि पाकिस्तान के कप्तान अपने ज़माने के धुरंधर सलामी बल्लेबाज़ सईद अनवर थे.

पाकिस्तान की टीम में सलामी बल्लेबाज़ शोएब मोहम्मद और एजाज अहमद शामिल थे. इस मैच का आयोजन 47 अनाथ बच्चों की सहायता के लिए किया गया था और मैच 40-40 ओवर का था.

वहीं भारत की उस टीम में पूर्व तेज़ गेंदबाज़ अतुल वासन, मदन लाल, संजीव शर्मा, प्रवीण आमरे, अशोक मल्होत्रा, समीर दिघे जैसे जाने-माने खिलाड़ी शामिल थे. दर्शकों को खींचने के लिए वैसे तो इतने नाम ही काफ़ी थे.

मुझे एक खेल पत्रकार होने के कारण दिल्ली और उससे बाहर जाने के अनेक अवसर मिले हैं, लेकिन उस भारत-पाक दोस्ती मैच को जिस भव्य रूप से आयोजित किया गया उसे देखकर तो बीसीसीआई भी शरमा जाती.

डेरा सच्चा सौदा

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बाबा के सेवादार लगातार हमारे साथ थे

हमारी लगभग आठ-दस लोगों की एक अलग टीम थी जिसमें कमेंटेटर के अलावा प्रोड्यूसर और कैमरामैन भी शामिल थे. हम लगभग रात को आठ बजे के करीब सिरसा में बाबा के डेरे में पहुंचे.

सर्दी के मौसम के कारण सबकी इच्छा सबसे पहले चाय पीने की थी, लेकिन उससे पहले हमें स्टेडियम के पास ही बने कमरों में अपना सामान रखने को कहा गया.

दरअसल हम सभी के पहुंचते ही बाबा के सेवादारों की एक टीम हमारे साथ लग चुकी थी. जहां हमें ठहराया गया वहां आमने-सामने और ऊपर-नीचे एक एक कमरा था. बिजली, पानी से लेकर बाथरूम और तख़्त पर बिस्तर का इंतज़ाम था.

बाबा के सेवादार हमें चाय पिलाने के लिए जहां ले गए वो जगह काफ़ी बड़ी थी. उसमें अस्थायी रूप में काफ़ी ऊंचाई पर एक टांड थी जिस पर बहुत बड़ी संख्या में स्टील के गिलास, खाने की प्लेट और नमकपारे रखे थे. टांड पर जाने के लिए लोहे की सीढ़ी थी.

गुरमीत राम रहीम

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साफ़-सफ़ाई का रखा गया था विशेष ख़्याल

ख़ैर चाय पीकर हमें थोड़ा गर्मी का अहसास हुआ तो हमारे साथी थोड़ी देर बाहर घूमने चल दिए. बाबा के डेरे तक जाने जाने वाली सड़क मुख्य मार्ग से काफ़ी दूर थी लेकिन उस पर चकाचौंध रोशनी का पूरा प्रबंध था.

सड़क के बीचों-बीच गमले रखे थे और कभी भी एक तिनका तक नहीं था, यानी साफ़-सफ़ाई का चौकस इंतज़ाम. सड़क के साथ ही दीवार पर शायद किसी स्कूल का नाम भी था जिससे पता चलता था कि यहां बच्चों की शिक्षा की भी व्यवस्था है.

थोड़ी देर घूमने के बाद सेवादार हमें डिनर के लिए ले गए. डिनर हॉल एक तालाब के बीचों-बीच स्थित था जहां जाने के लिए तीन तरफ से रास्ता था. भीतर सब कुछ रेस्तरां जैसा था. किनारे पर लगी टेबलों पर दाल मक्खनी, शाही पनीर, आलू-गोभी, मटर पनीर, रायता, पापड़, सलाद से लेकर नान, मिस्सी रोटी, चावल सभी कुछ था.

कोल्ड ड्रिंक, कॉफी, आइसक्रीम भी थी. ऐसे डिनर का तो किसी ने सोचा भी नहीं था. सेवादार सब कुछ संभाल रहे थे. डिनर हॉल के बाहर खिलौने और दूसरे सजावटी सामान की दुकानें भी थी जहां से मनपसंद चीज़ें ख़रीदी जा सकती थीं.

डिनर के बाद वापस जब हम सोने के लिए कमरों में पहुंचे तब तक करीब ग्यारह बज चुके थे. बाबा के सेवादारों ने कहा कि सुबह कितने बजे आप लोगों को जगाया जाए और सुबह उठते ही क्या चाहिए. सबने कहा कि छह बजे तो जगा ही देना और नहाने के लिए गर्म पानी का इंतज़ाम भी कर देना क्योंकि कमरों में गीज़र नहीं थे.

डेरे के भीतर कई प्रसिद्ध इमारतों के डुप्लिकेट मॉडल बनाए गए हैं

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फ़ाइव स्टार होटल से नहीं कम थे इंतजाम

सुबह ठीक छह बजे सेवादारों ने किवाड़ खटखटाया और बाहर निकलकर देखा तो सुबह की धुंध में कमरों के बाहर गैस के चूल्हों पर बड़े पतीले में पानी गरम हो रहा था.

नहा-धोकर चाय-पानी के लिए एक बार फिर डिनर हॉल में चाय-नाश्ते का इंतज़ाम था. करीब आठ बजते-बजते हमने पास ही में बने क्रिकेट स्टेडियम का रुख किया. रास्ते में बेहद अनुशासन के साथ पुरुष-महिला-बच्चों-बुज़र्गों की भीड़ भी स्टेडियम पहुंच रही थी. कहीं कोई टिकट नहीं, कहीं कोई रोक-टोक नहीं. शायद सबको मालूम था कि उन्हें कहां बैठना है.

हमारे पास काफी समय था. इसलिए हमने पूरे स्टेडियम का बाहर से ही एक चक्कर लगाने का निर्णय किया. स्टेडियम चूंकि नया था और शायद छह-सात महीने में ही तैयार भी किया गया था. इसलिए स्टेडियम के आस पास के कुछ रास्ते कच्चे थे.

स्टेडियम के चारो तरफ थोड़ी दूर पर ही अस्थायी शौचालय थे. सफ़ाई रखने की अपील के पोस्टर भी लगे थे. स्टेडियम के बाहर थोड़ी दूर पर ही मौसमी फलों की भरमार थी. यहां मुफ़्त में केले, संतरे, सेब खाने के इंतजाम थे.

स्टेडियम का चक्कर लगाने के बाद मैं कमेंटरी टीम के साथ चला गया. वहां भी बाबा के सेवादार मौजूद थे. जैसे ही किसी को चाय-पानी की ज़रूरत होती मिल जाती. वहां मीठे दूध की बोतल और जूस का प्रबंध भी था.

मैच अपने निर्धारित समय पर शुरू हुआ. बाबा के रहते स्टेडियम में कोई दूसरा वीआईपी नहीं हो सकता था. ऐसे में वो स्टेडियम की पहली मंजिल पर अपने विशेष आसन पर पगड़ी बांधे विराजमान हुए. उनका जय-जयकार हुआ. भारत-पाक दोस्ती के नारे भी लगे. लगभग 25,000 दर्शकों से स्टेडियम का कोना-कोना भरा हुआ था.

आज डेरे के अंदर अत्याधुनिक नावनुमा इलेक्ट्रिक कारें मौजूद हैं

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मैच भारत की झोली में गया

जब लंच हुआ तो पूरी कमेंटरी टीम और बाकी दूसरे खेल पत्रकारों को जो अख़बार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से भी थे उनके लिए नीचे ही एक पंडाल लगा था. वहां आलू-पूरी रायता था, जैसे वह प्रसाद हो.

थोड़ा समय निकलकर हमने जब आम लोगों से पूछा कि वह कैसे बाबा के लिए इतने समर्पण भाव से काम करते हैं, तो उनका जवाब था कि इससे उन्हें शांति मिलती है. किसी का कोई दबाव नहीं है. डेरे में कोई भी बीड़ी-सिगरेट नहीं पी सकता था. हमें कोई छुपकर पीने की कोशिश करने वाला भी नहीं दिखा.

ख़ैर मैच भारत ने दो विकेट से जीता. पाकिस्तान ने निर्धारित 40 ओवर में 6 विकेट खोकर 210 रन बनाए. शोएब मोहम्मद ने 110 रनों की नाबाद पारी खेली.

आज भारत और पाकिस्तान के खेल रिश्ते ऐसे है कि वह क्रिकेट तो छोड़िये आपस में हॉकी और कबड्डी भी नहीं खेल सकते.

अब सोचता हूं तो यह सब एक सपने जैसा लगता है कि कभी बाबा के डेरे में भी भारत-पाक दोस्ती क्रिकेट मैच हुआ था.

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