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ज्ञानवापी मामला: फ़व्वारे बिना बिजली कैसे चलते हैं और इनका इतिहास क्या है?
- Author, स्नेहा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बनारस में ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे को लेकर शुरू हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है.
हिंदू पक्ष ने दावा किया कि मस्जिद के अंदर शिवलिंग है. मुस्लिम पक्ष ने दावा किया कि वो वज़ू वाली जगह पर शिवलिंग नहीं, फव्वारा है. इस मसले को लेकर कोर्ट में सुनवाई जारी है.
पर इन सबके बीच दोनों पक्ष के लोग एक-दूसरे के दावे पर सवाल उठाकर ख़ारिज भी कर रहे हैं.
बीजेपी से जुड़ी निग़हत अब्बास ने ट्वीट किया, "400 साल पहले बिजली तो थी नहीं तो क्या औरंगज़ेब फूंक मारकर फव्वारा चलाते थे?"
अनीष गोखले समेत कई लोग ऐसे सवालों के जवाब देते हैं कि गुरुत्वाकर्षण के ज़रिए ये संभव है बिना बिजली के भी फव्वारे चल सकते हैं.
पर सोशल मीडिया पर चल रहे दावों से इतर सच क्या है? क्या वाक़ई में बिना बिजली के फव्वारे चल सकते हैं?
चलिए इसे समझने की कोशिश करते हैं. जानकार क्या कहते हैं ये जानते हैं और ऐतिहासिक जगहों पर बने फव्वारों के आधार पर जवाब तलाशते हैं.
कैसे चलता है फव्वारा?
जैसा कि आप जानते हैं कि पानी ऊंचाई से नीचे की ओर बढ़ता है. पहाड़ों के झरने, नदियां या आपके घर पाइप से आने वाला पानी, हर जगह यही दिखेगा. ज़ाहिर है कि इसकी वजह गुरुत्वाकर्षण है.
आपने बच्चों को कभी पानी के पाइप को सिरे से दबाकर फव्वारा बनाने की कोशिश करते देखा होगा. जब पाइप का एक सिरा दबाने की कोशिश होती है तो पानी का प्रवाह तेज़ हो जाता है और बाहर आता पानी फव्वारे का आभास देता है.
दरअसल, पानी के रबड़ की पाइप को दबाने पर पानी निकलने की गति तेज़ हो जाती है यानी बाहर निकलने का रास्ता संकरा होने पर पानी का प्रेशर बढ़ जाता है
इसी तकनीक को ताजमहल, कश्मीर के मुग़ल गार्डन या फिर लाल किले के फव्वारों के संदर्भ में समझते हैं. ये ऐतिहासिक स्थल बिजली के अविष्कार से सालों पहले बने थे. यहां बने फव्वारे आपने देखे होंगे.
होता ये था कि सबसे पहली कारीगरी फव्वारे को बनाने में की जाती थी. फव्वारे को कुछ ऐसा डिजाइन किया जाता कि एक जगह पानी जमा रहे, फिर वहां से वो पानी का बहाव ऐसे संकरे रास्तों या नाली में जाता, जहां जाने से पानी का प्रेशर बढ़ जाता. ये बढ़े प्रेशर का पानी फव्वारे के छेदों से जब निकलता तो उसकी स्पीड काफी ज्यादा होती.
ये पानी की स्पीड और फव्वारे के डिजाइन से गिरता पानी ही किसी फव्वारे को सुंदर बनाता है.
फव्वारे का विज्ञान
ऊपर आपने समझा कि फव्वारा कैसे काम करता है. अब इसके विज्ञान पर बात करते हैं.
अर्बन प्लानर शुभम मिश्रा कहते हैं, "मुग़ल काल में फव्वारा तैयार करने में टेराकोटा के पाइप का इस्तेमाल होता था. इसमें ढलान इतने सटीक तरीके से बनाए जाते थे कि पानी आए और वह ऊपर चढ़ते हुए फव्वारे से निकले. इसके लिए पानी की सही गति अहम होती थी. पूरी गणना और उसको फिर लागू करना कमाल की बात थी."
टेराकोटा यानी आग में जलाकर पकाई गई मिट्टी.
इतिहासकार राना सफ़वी कहती हैं, "मुगल इमारतों में बने फव्वारे में गुरुत्वाकर्षण और हाइड्रालॉजिकल सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता था."
यह एक ऐसा सिस्टम है, जिसमें जल संसाधनों के इस्तेमाल में सुविधा, घटना और पूरी प्रक्रिया को रखा जाता है. इसमें पानी के फ्लो प्रोसेस, भूमि उपयोग, भूमि कवर, मिट्टी, वर्षा और वाष्पीकरण जैसे घटक पर ध्यान दिया जाता है.
राना सफ़वी के मुताबिक़, "मुग़ल आर्किटेक्ट में मक़बरे बनें या मस्जिद, उसमें पानी का चैनल बेहद महत्वपूर्ण है. मक़बरे चार बाग़ के तर्ज पर बनते हैं और इसमें जगह-जगह फव्वारे लगे होते हैं. इसी तर्ज पर हुमायूं का मक़बरा बना है और इसी तर्ज पर कश्मीर के बगीचे बने हैं और उसमें फव्वारे का खूब इस्तेमाल हुआ है. लाल किले में नहर-ए-बहिश्त हुआ करती थी, जो पूरे लाल किले में बहती थी और इसमें जगह-जगह फव्वारे लगे थे. इसके लिए पानी यमुना से खींचा जाता था और नहर-ए-बहिश्त से वह फव्वारे तक पहुंचता था. जामा मस्जिद में हौज़ (तालाब) तक पानी लाने के लिए रहट का कुआं था और वह आज भी मौजूद है."
फव्वारों का इतिहास
धरती के 70 फ़ीसदी हिस्से में पानी है. लेकिन ये वही पानी है, जिसको लेकर आज भी लड़ाइयां होती रहती हैं.
इंसान अपने क्रमिक विकास में ज़रूरत के हिसाब से पानी का इंतज़ाम करता रहा है. फिर चाहे पीने का पानी हो या फिर सिंचाई के लिए.
ज़रूरतों को पूरा करने के अलावा पानी का इस्तेमाल सुंदरता बढ़ाने के लिए होता रहा है. फव्वारा इसी का अहम उदाहरण है.
'द गार्डियन' वेबसाइट के मुताबिक़, दुनिया के शुरुआती फव्वारों के उदाहरण मेसोपोटामिया में मिलते हैं, जो 3000 ईसा पूर्व के हैं. मेसोपोटामिया यानी आज के इराक़, ईरान, तुर्की और सीरिया.
यहां प्राकृतिक झरने को एक मुख्य स्रोत के इस्तेमाल करते हुए बनाया गया.
इसमें गॉर्डन ग्रिमले की किताब 'द ऑरिजिन ऑफ एवरीथिंग' के हवाले से बताया गया है कि इस तरह की पद्धति ग्रीक और रोमन अवशेषों में भी मिले हैं. यांत्रिक फव्वारे इटली में 15वीं शताब्दी के दौरान चलने लगे.
फव्वारे कहां के सबसे मशहूर?
फव्वारों से जुड़ी ऐसी ही एक दिलचस्प कहानी फ्रांस से जुड़ी है. फ्रांस के राजा लुई 14वें ने एक ऐसा फ़ैसला किया, जिससे न केवल राज परिवार बल्कि उनके दरबार के मंत्री और सहयोगी तक परेशान हो गए.
यह फ़ैसला था दरबार के कामकाज को यानी सत्ता के केंद्र को पेरिस से हटाकर दूर के इलाके वर्साय में ले जाने का, जहां पेरिस की चमक-दमक बिल्कुल नहीं थी.
पैलेस ऑफ वर्साय रिसर्च सेंटर के बेंजामिन रिंगट ने नेशनल जियोग्राफी से इस बारे में बात की थी.
उन्होंने बताया था, "जिस स्थान पर लुई अपना केंद्र बनाना चाहते थे, वह एक बंद इलाका (लैंड लॉक) था और लुई के सपनों के बगीचे और फव्वारों के लिए पर्याप्त पानी का इंतज़ाम नहीं था."
"इसका समाधान निकालने के लिए बेल्जियम से इंजीनियर बुलाए गए. पंपिग स्टेशन और जलाशयों के सहारे सीन नदी से पानी लाया गया और फव्वारों को पानी मिला. वर्साय के शीश महल के साथ यह बगीचा और फव्वारा फ्रांस के मुख्य पर्यटक स्थलों में से एक है. इस महल में सालाना पचास लाख से ज्यादा पर्यटक जाते हैं."
फव्वारों के लिए इटली दुनिया भर में मशहूर है. 'फाउंटेन ऑफ द फोर रिवर' हो या फिर ट्रिवी फाउंटेन, जिसमें टूरिस्ट सिक्का फेंककर दुआ मांगने में यक़ीन रखते हैं.
इतिहासकार फ़िरोज़ बख्त अहमद बताते हैं, "इटली ऐसी जगह है, जहां कुछ बेहद पुराने फाउंटेन हैं और पियात्सा नवोना के फाउंटेन इनमें से एक हैं. अन्य यूरोपीय देश फ्रांस और जर्मनी में भी पुराने फव्वारे हैं."
नए बने बड़े फव्वारों में दुबई का फव्वारा भी शामिल है.
आप बताइए आपका पसंदीदा फव्वारा कौन सा है और कहां है?
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