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फ्रैंक कामेनी: गूगल डूडल जिन पर बना, अमेरिका में समलैंगिक अधिकारों के लिए लड़े थे
2 जून को जब भारत में लोगों ने गूगल खोला तो रंग बिरंगे झंडे स्क्रीन पर उड़ने लगे. एक शख्स हाथ में फूल लिए दिखा.
गूगल डूडल में दिखने वाले ये शख़्स डॉक्टर फ्रैंक कामेनी हैं.
फ्रैंक कामेनी अमेरिका में समलैंगिकों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने को लेकर जाने जाते हैं. 'गे इज़ गुड' यानी 'गे होना अच्छा है' जैसी लाइन सबसे पहले फ्रैंक ने ही 1968 में कही थी.
जून महीने को प्राइड मंथ के तौर पर मनाया जाता है. प्राइड मंथ यानी समलैंगिक लोगों के अधिकारों और उनके अस्तित्व को पहचान देने का, जश्न मनाने का महीना.
इसी महीने की शुरुआत को पहचान देने के लिए गूगल ने ये डूडल फ्रैंक पर बनाया है.
फ्रैंक के बारे में कुछ और बातें
फ्रैंक 21 मई 1925 को अमेरिका के न्यूयॉर्क में पैदा हुए. मशहूर क्वींस कॉलेज में फिजिक्स की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया.
फ्रैंक दूसरे विश्वयुद्ध के वक़्त सेना में थे और जंग के मैदान पर भी दुश्मन से मोर्चा लिया था.
इसके कुछ सालों बाद 1957 में फ्रैंक ने अमेरिका की आर्मी मैप सर्विस में नौकरी की. यहां फ्रैंक बतौर खगोलशास्त्री नौकरी कर रहे थे.
फ्रैंक ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से खगोलशास्त्र की पढ़ाई भी की थी. लेकिन कुछ महीनों बाद सरकार ने समलैंगिकों के सरकारी नौकरी करने पर रोक लगा दी.
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नतीजतन फ्रैंक को भी नौकरी से हाथ धोना पड़ा. ये सब उस अमेरिका में हो रहा था, जहां समलैंगिकों के अधिकारों की बात करने को तब मानसिक बीमारी माना जाता था.
1973 तक अमेरिकी साइकायट्रिस्ट एसोसिएशन में गे होने को मानसिक बीमारी माना जाता था.
फ्रैंक ने लिया मोर्चा
फ्रैंक ने ख़ुद के साथ हुए भेदभाव के ख़िलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.
1961 में फ्रैंक ने सरकार के खिलाफ जब केस किया तो वो अमेरिका में पहली ऐसी अपील थी, जिसका नाता समलैंगिकों के अधिकारों से था.
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फ्रैंक ने समलैंगिक अधिकारों की बात करने के लिए लोगों को समूह में जोड़ने का काम किया.
इसके अलावा जिस अमेरिकी साइकायट्रिस्ट एसोसिएशन में गे होने को मानसिक बीमारी समझा जाता था, उसे भी चुनौती देने का काम किया.
ये फ्रैंक की लड़ी जंग ही थी, जिसके चलते क़रीब 50 साल बाद आर्मी मैप सर्विस ने नौकरी से निकाले जाने को लेकर माफी मांगी.
फ्रैंक ने 11 अक्टूबर 2011 को वॉशिंगटन में अंतिम सांस ली.
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