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सोशल मीडिया: आज़ादी जैसे शब्द मेरी जिंदगी का हिस्सा हैं पर..
एक नौजवान लड़की अपनी दुनिया को कैसे देखती समझती है. अपने परिवार और संबंधियों से पड़ने वाले दबाव का सामना कैसे करती है.
बुशरा शेख जामिया मिल्लिया इस्लामिया में एमए मास कम्युनिकेशन की छात्रा हैं. अपने परिवार से लगातार पड़ रहे दबावों पर उन्होंने ये फेसबुक पोस्ट लिखी है.
मेरी उम्र 24 साल है, पोस्ट ग्रेजुएशन की छात्रा हूँ और दिल्ली जैसे महानगर में पली बढ़ी हूँ..परिवार में तालीम लेने वाले लोगों की कमी नहीं है..(मानसिक स्तर पर भले ही तालीम से दूर दूर तक कोई लेना देना न हो).
मेरे पिता की चार संतानें हैं और हम चारों ही लड़कियाँ हैं. हालाँकि लड़की होने का कोई मलाल अब तक उनमें दिखा नहीं.
पढ़ाई लिखाई को लेकर हमें बचपन से ही प्रोत्साहित किया जाता रहा है(ये पढ़ाई लिखाई अच्छा कैरियर बनाने तक ही सीमित रहे तो ही ठीक है. जैसे ही आपने उस शिक्षा का इस्तेमाल समाज के बनाये नियम कायदों को तोड़ने और उनके विरुद्ध जाने के लिए सोचा तो सचेत हो जाइए).
लेकिन कुछ चीज़ों को लेकर उनका रवैया हमेशा से बेहद सख़्त रहा है..मुझे क्या पहनना है क्या नहीं,घर से कितने बजे निकलना है, कब वापस आना है,किनसे बात करनी है किसे मित्र(उनके अनुसार लड़कियाँ) बनाना है इन सबका फ़ैसला करने का एकमात्र अधिकार मेरे पिता को प्राप्त है.
शाम 6 बजते ही मेरे फ़ोन की घण्टी बजने लगती है, ये याद दिलाने के लिए कि मेरे वापस आने का समय अब हो चला है और अगर फोन उठाने में ज़रा भी कोताही बरती तो बदले में जो सब सुनना पड़ता है वो आपको भीतर तक तोड़ने के लिए काफी होता है.
ख़्वाहिश, आज़ादी, चुनाव, फ़ैसले लेने के अधिकार,ये सब भले ही मेरी ज़िन्दगी से जुड़े शब्द हो लेकिन यह मेरा अधिकार प्राप्त क्षेत्र नहीं.
आज के दौर में जब मैं मेरी उम्र की लड़कियों को उनके ज़िन्दगी के तमाम फैसले स्वयं लेते देखती हूँ, देश-विदेश के राजनीतिक, सामाजिक, महिला सम्बन्धी मुद्दों, लिव इन, सेक्स की आज़ादी, पीरियड्स से जुड़ी समस्याओं पर अपने मत को मुखर होकर रखते हुए देखती हूँ तो अपने पिछड़ेपन का एहसास तेज़ होने लगता है.
हमारे बीच की पिछड़ेपन की खाई वक़्त के साथ बढ़ती जायेगी. मैं अपने मूलभूत अधिकारों के लिए लड़ती रहूँगी और वो इन सब से काफ़ी आगे की लड़ाई लड़ रही होंगी.
ये वो पिछड़ापन है जिसकी डोर रिश्तों के साथ गूँथ कर बँधी हुई है. परिवार नामक संस्था की इज़्ज़त का बोझ आपकी इच्छा के बिना आप पर लाद दिया जाता है और रिश्तों की बेड़ियां आपके क़दमों को समय समय पर कंट्रोल करती रहती है.
आप कई बार इन सब बन्धनों और सीमाओं को तोड़ कर निकलने की कोशिश तो करती हैं लेकिन वो सीमाएं अपना दायरा मुसलसल बढ़ाती जाती है और आप थक कर बैठ जाते है.
मेरे शरीर की बनावट, मेरे लिंग का आधार, भला कैसे मेरे फैसलों और मेरी इच्छाओं को मुझसे छीन सकता है.
भला ये कैसी मानसिकता है जो मेरी योनि में अपने वर्चस्व, इज़्ज़त को महफ़ूज़ रखने का ढकोसला करती फिरती है. हर दिन हर जगह..आख़िर ये कैसा भय है,कैसी असुरक्षा की भावना है जो मेरे शरीर के अंगों के बढ़ते उभारों के साथ बढ़ता जाता है.
यह लड़ाई मैं पिछले 10 साल से भी ज्यादा समय से लड़ती आ रही हूं और न जाने कब तक लड़ती रहूँ. आख़िर वो कब मेरी हर इच्छा के पीछे की ज़रूरत तलाशने से बाज़ आएंगे, कब समझेंगे कि दुप्पटे से छाती ढक लेने भर से लोगों की मानसिकता नहीं ढंक जाती वो गन्दी नज़र दुपट्टे को चीरते हुए भी निकल जायेगी.
मेरी आत्मा को योनि के भीतर क़ैद न समझें.. आख़िर वो कब मुझे खुलकर ये कहेंगे की लड़की होने का अर्थ पति के आगे सर झुकाना नहीं होता, उसकी हर नाजायज़ हरक़त को ज़ायज़ समझ के स्वीकार करना नहीं होता,बेज़ुबान होकर जीना,और सहना नहीं होता बल्कि लड़की होना इन सब रूढ़िवादिताओं को कुचलने से भी अधिक पावरफुल होना होता है और शारीरिक बनावट की भिन्नता से अधिकारों में भिन्नता हरगिज़ नहीं लायी जा सकती है.
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