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सोशल: 'निजी स्कूल आग का दरिया हैं और डूबकर जाना है'
बच्चों को अच्छी शिक्षा देने का सपना देखने वाले कई माता-पिता निजी स्कूलों में बढ़ती फ़ीस को ले कर परेशान रहत हैं. इस तरह की कई बातें आपने भी सुनी होंगी.
बीबीसी के फ़ेसबुक पन्ने पर हमने सवाल किया - निजी स्कूलों में फ़ीस और अन्य ख़र्चों को लेकर आपका अनुभव कैसा है?
इस सवाल पर हमें 300 से अधिक जवाब मिले हैं. पढ़िए इनमें से कुछ जवाब.
आफ़ताब आलम ने लिखा, "सरकारी स्कूल की हालत ठीक नहीं. प्राइवेट स्कूल तो एक बिज़नेस है. जितना वो हमसे कमा सकते हैं हर बहाने से कमाते रहते हैं."
बबलू यादव लिखते हैं, "भाई ये स्कूल नहीं लूट की दुकान चला रहे हैं और सरकार को सरकारी स्कूल से कोई मतलब नहीं है. क्योंकि सरकारी स्कूल में ग़रीब अपने बच्चों को पढ़ाते हैं और ये पढ़ लिख लेंगे तो नेता लोग इन्हें बेवकूफ़ कैसे बनाएंगे."
ललित रोहिला ने लिखा, "स्कूल वाले चाहते हैं कि आप खुद भी भूखे रहें और अपने बच्चों को भी रखें. जो कमाया वो सिर्फ हमें दे कर जाएं."
शादाब सैयादियां ने लिखा, " फीस और अन्य चीज़ों के दाम कम किए जाने चाहिए. हर साल किताबें भी नहीं बदली जानी चाहिए. बच्चों को कपड़े और किताबें बाहर अन्य दुकानों से खरीदने देना चाहिए."
मोहम्मद मनाज़िम ने लिखा, "इन निजी संस्थानों के बारे में हमारा दर्द - जिगर साहब के अंदाज़ में यूँ समझिये, एक आग का दरिया है, और डूब कर जाना है."
असीम ख़ान, "स्कूल अपनी मर्ज़ी से फीस तय करते हैं. अभिभावको की कोई सुनवाई नहीं होती."
चंदर कुकरेजा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से अपील की है, "एक आम नागरिक की विनती है कि हमें स्कूलों की लूट से बचा लो, बहुत लूट रहे हैं स्कूल."
प्रदीप पटवा ने लिखा है, "सब निजी स्कूलों की बुराई कर रहे हैं, पर बच्चे सबके इन स्कूलों में ही पढ़ते हैं."
राहुल धीर सवाल करते हैं, "आप अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में क्यों नहीं भेजते? वहां फीस कम है, किताबें और कपड़े मुफ्त हैं और मिड डे मील भी मिलती है."