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सोशल: 'मानव हत्या के लिए ज़मानती, गो हत्या के लिए गैर-ज़मानती वारंट'
गुजरात में गो हत्या करने वालों को उम्र कैद की सज़ा हो सकती है. गुजरात में गो हत्या अब गैर-ज़मानती अपराध होगा.
गुजरात विधानसभा में पशु सरंक्षण (संशोधन) अधिनियम 2011 को पास हुआ. नए कानून के मुताबिक, किसी भी आदमी को बीफ़ ले जाने पर उम्रक़ैद की सज़ा हो सकती है.
बीफ़ लाने- ले जाने और गाय काटने पर एक लाख रुपए से पांच लाख रुपए तक का ज़ुर्माना लग सकता है.
गुजरात विधानसभा में पास इस विधेयक पर बीबीसी हिंदी के फेसबुक पेज पर कहासुनी के ज़रिए हमने लोगों की राय जानी.
बीबीसी हिंदी के पाठकों ने कहासुनी में अपनी राय रखी, जिसमें से कुछ चुनिंदा कमेंट्स हम यहां पेश कर रहे हैं.
विजेंद्र कुमार लिखते हैं, ''अगर कोई ऐसा क़ानून बनाना है तो पूरे देश के लिए लोकसभा में क्यों नहीं बनाया जाता. सिर्फ गुजरात में ही किस लिए. गुजरात में चुनाव हैं इसलिए धर्म की राजनीति कर फिर से हिंदुओं का ध्रुवीकरण करना चाहते हैं. विकास की तरफ अगर ध्यान देंगे तो आसानी से जीत सकते हैं. ये हिंदू मुस्लिम की राजनीति बंद होनी चाहिए.''
ताबीश हसन ने लिखा, ''पूरे देश में गो हत्या पर पाबंदी लगाकर गो हत्या करने वालों को उम्रक़ैद की सजा का प्रावधान करना चाहिए. गाय को राष्ट्रीय पशु की घोषित कर देना चाहिए. एक ही बार में खत्म करो. कब तक खींचोगे.''
राहुल कुमार कहते हैं, ''यहां मानव हत्या के लिए ज़मानती वारंट जारी होता है और गो हत्या के लिये गैर ज़मानती वारंट. चुनाव होने को है तो यह धर्म की राजनीति है और कुछ नहीं.''
फ़ैज़ अहमद ने लिखा, ''अगर उद्देश्य सिर्फ गाय को बचाना है, क्योंकि वो हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है तो ये सिर्फ सरकार का नहीं बल्कि हर धर्म को मानने वाले का कर्तव्य है कि वो अपने धर्म की रक्षा करे.''
फैज़ आगे लिखते हैं, ''ये कानून ठीक है पर इससे गाय से ज्यादा सरकार के अपने हित की रक्षा महसूस होती है. क्योंकि अगर सरकार वाकई गंभीर होती तो भूख गाय सड़कों पर न घूमती. गाय दुर्घटनाओं में न मरती. इसे हिंदू मुस्लिम की राजनीतिक लाभ लेने वाला कानून कहा जा सकता है.''
राहुल जैन लिखते हैं, ''अच्छा फैसला है और ये हर जगह लागू होना चाहिए. गाय के दूध का व्यापार पूरी दुनिया में इससे सफल हो सकता है. बाघों को मारने वालों को जब सजा होती है तो गोहत्या करने वालों को भी सजा होनी चाहिए.''
नूर आलम ने कहा, ''इसमें कोई बुराई नहीं है. लेकिन फिर गोवा और नॉर्थईस्ट में विरोध क्यों. हद है राजनीति की. अब तो राजनीति के लिए जानवरों को भी कुछ लोगों ने नहीं छोड़ा.''
अज़मत अली इस फैसले पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं, ''आप करें तो रास लीला. हम करें तो कैरेक्टर ढीला. बीफ एक्सपोर्ट भी बंद कीजिए न. वहां भी आस्था की हत्या होती है लेकिन आपको राजनीति भी करनी है और बनियागिरी भी. आस्था का सिर्फ ढोंग है.''
तेजपाल ने लिखा, ''मैं गोमाता को मानता हूं. पर मेरा सवाल आस्था से थोड़ा ऊपर है. सड़क हादसे में अगर कोई गाय मारी जाती है तो ऐसे में केस में फैसला क्या कोर्ट सुनाएगा.''
साज़िद हकीमी लिखते हैं, ''इन कठोर कानूनों से मां के पेट में चारा जाने वाला नहीं है. इसको इस्तेमाल सिर्फ अल्पसंख्यक और दलित वर्ग पर अनैतिक दवाब के लिए किया जाएगा.''
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