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शनिवार, 05 जनवरी, 2008 को 20:52 GMT तक के समाचार
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'सीएफ़एल से त्वचा रोगों का ख़तरा'
पारंपरिक बल्ब
कई देशों में पारंपरिक बल्बों को धीरे-धीरे हटाने की योजना है
एक ओर सरकारें बिजली की बचत करने वाले बल्बों का प्रयोग बढ़ाने में लगी हुई हैं और दूसरी ओर विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इससे त्वचा की पीड़ादायक बीमारियाँ हो सकती है.

विशेषज्ञों का कहना है कि कॉम्पैक्ट फ़्लोरोसेंट लाइट (सीएफ़एल) से लोगों को त्वचा में चकत्ते हो सकते हैं और त्वचा के फ़ोटोसेंसेटिव (रोशनी के प्रति संवेदनशील) होने का ख़तरा हो सकता है.

ब्रिटेन की ही सरकार को लें तो वह वर्ष 2011 से परंपरागत बल्बों के प्रयोग को प्रतिबंधित करने जा रही है जिससे कि कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सके.

ब्रिटिश एसोसिएशन ऑफ़ डेर्मेटोलॉजिस्ट सहित कई संस्थाओं का कहना है कि जो लोग पारंपरिक बल्बों का प्रयोग करना चाहते हैं उन्हें इसकी छूट दी जानी चाहिए.

हालांकि बिजली उद्योग का कहना है कि फ़्लोरोसेंट बल्बों का विकल्प भी लोगों को उपलब्ध होगा.

बिजली उद्योग की ओर से कहा गया है कि जल्दी ही लोगों को हैलोजन और एलईडी बल्ब भी उपलब्ध होंगे.

बीमारियाँ

विशेषज्ञों ने इन बल्बों से कई तरह की बीमारियों की आशंका जताई है जिसमें त्वचा का रोशनी के प्रति संवेदनशील हो जाना, कई तरह की खुलजी होना और त्वचा में चकत्ते होना आदि प्रमुख है.

सीएफ़एल
बिजली बचाने वाले इन बल्बों के प्रयोग को बढ़ाया जा रहा है

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे सिर में दर्द की बीमारी माइग्रेन की भी शिकायत हो सकती है.

एक अनुमान है कि ब्रिटेन में ही कोई एक लाख लोगों को इस तरह की बीमारियाँ हो जाएँगीं.

रोशनी के प्रति संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को सहायता उपलब्ध करवाने वाली संस्था स्पक्ट्रम का कहना है कि उन्होंने ऐसे लोगों से संपर्क किया है जिन्हें फ़्लोरोसेंट बल्बों से परेशानी हो रही है.

उल्लेखनीय है कि बिजली की बचत करने वाले ये बल्ब पारंपरिक बल्बों की तुलना में एक चौथाई बिजली का ही प्रयोग करते हैं.

बिजली की बचत करने वाले बल्बों का विरोध करने वाले लोगों और संस्थाओं का कहना है कि लोगों को अपनी पसंद के बल्ब ख़रीदने का अधिकार देना चाहिए.

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