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स्वास्थ्य संबंधी तथ्य और कल्पना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्या दिन में आठ गिलास पानी पीने से स्वास्थ्य वास्तव में बेहतर होता है? क्या कम रोशनी में पढ़ने से आखों को नुकसान होता है? क्या हम असल में अपने दिमाग़ का केवल 10 फ़ीसदी इस्तेमाल करते हैं? क्या ये वैज्ञानिक शोध पर आधारित तथ्य हैं या फिर केवल सुनी-सुनाई बातें हैं? अमरीका में हुए शोध से ये संकेत मिले हैं कि ये स्वास्थ्य के बारे में की जा रही कल्पनिक बातें है. ब्रिटिश मेडिकल जरनल मे छपी रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें कुछ बातें तो पूरी तरह से झूठी हैं और कुछ अन्य के कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं इंडियानापोलिस के इंडियाना विश्वविद्यालय के 'स्कूल आफ़ मेडिसिन' के शोधकर्ताओं ने हर दावे के प्रामण खोजने की कोशिश की है. कल्पना पर आधारित असल में अध्ययन सुझाते हैं कि समुचित तरल पदार्थ की ज़रूरत जूस, दूध, या फिर चाय, कॉफ़ी से भी पूरी की जा सकती है. आश्चर्यजनक तो ये है कि आंकड़े ये भी बताते हैं कि ज़्यादा पानी हानिकारक भी हो सकता है. यह मान्यता कि हम अपने मस्तिष्क का केवल 10 फ़ीसदी ही इस्तेमाल में ला पाते है, पूरी तरह ग़लत है. दिमाग़ की बीमारियों से पीड़ित लोगो के शोध बताते हैं कि मस्तिष्क का प्रत्येक हिस्सा मानसिकता और व्यवहार पर असर डालता है. इससे ये साफ़ हो जाता है कि कोई भी हिस्सा निष्क्रिय नहीं है. वहीं बाल और उंगलियों के नाखून मरने के बाद भी बढ़ते रहने की मान्यता की वजह केवल भ्रम है. शोध तो ये बताता है कि नाखूनों और बालों को बढ़ने के लिए ख़ास तरह के हार्मोन की ज़रूरत होती है जो मृत्यु के बाद शरीर में मौजूद नहीं रहते हैं. रिपोर्ट के लेखक रेशल व्रीमन ने ब्रितानी पत्रिका में बताया है कि काटने से बाल जल्दी बढ़ते या फिर घने, मजबूत या काले होते हैं, सिर्फ़ कल्पना है. जानकार कम रोशनी में पढ़ने से आंखों को नुकसान होने को ग़लत बताते हैं. ये भी पता चला है कि टर्की खाने से इसमें होने वाले ट्रिप्टोफ़ेन अमीनो अम्ल लोगों को आलसी नहीं बनाता है. वास्तव में टर्की, मुर्गी और अन्य तरह का माँस में बहुत कम मात्रा में ट्रिप्टोफ़ेन होता है. शोधकर्ताओं ने बताया, "ज़्यादा मात्र में खाया गया किसी भी तरह का खाना नींद का कारण बन सकता है क्योंकि खाने के बाद दिमाग़ में ऑक्सीज़न और रक्त का प्रवाह कम हो जाता है." क्लिनिकल इवीडेंस जरनल के सम्पादक डॉक्टर डेविड टोवी ने कहा, "यदि दूसरा पक्ष लें तो प्रमाण न होने का मतलब ये नहीं कि इन बातों को कोई प्रभाव नहीं पड़ता है." | इससे जुड़ी ख़बरें और बहुत कुछ कहती है जम्हाई..11 सितंबर, 2007 | विज्ञान 'शीतल पेयों में कीटनाशक और अधिक'02 अगस्त, 2006 | विज्ञान आलिंगन स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी10 अगस्त, 2005 | विज्ञान नीरस काम से दिल को ख़तरा07 जून, 2005 | विज्ञान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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