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शुक्रवार, 27 मई, 2005 को 04:36 GMT तक के समाचार
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मछली से इलाज को क़ानूनी चुनौती

मछली से इलाज
हर वर्ष हज़ारों लोग इलाज के लिए हैदराबाद पहुँचते हैं
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने कहा है कि वह मछली के ज़रिए दवाई देकर दमा का इलाज करने वालों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करेगा.

आंध्र प्रदेश में हर वर्ष हज़ारों लोग 'मछली इलाज' कहे जाने वाले इस उपचार के लिए आते हैं और इसकी लोकप्रियता पिछले कुछ वर्षों में घटने के बदले बढ़ी है.

दमा के रोगी को एक जीवित मछली निगलनी होती है जिसके भीतर दमा की दवाई होती है और हर वर्ष लगभग पाँच लाख लोग जून के महीने में इस उपचार के लिए हैदराबाद आते हैं.

आईएमए के एक अधिकारी सीएल वेंकटराव ने पत्रकारों को बताया है कि उनका संगठन राज्य और केंद्र सरकारों को क़ानूनी नोटिस जारी करने जा रहा है कि वे अब तक इस उपचार की वैज्ञानिक जाँच कराने में क्यों नाकाम रहे हैं.

वेंकटराव का कहना है कि आँध्र प्रदेश हाइकोर्ट ने पिछले वर्ष आदेश दिया था कि दवाई की वैज्ञानिक जाँच की जाए कि उसमें कौन से तत्व हैं लेकिन अभी तक उस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

आईएमए का कहना है कि उन्हें क़ानूनी कार्रवाई के लिए बाध्य होना पड़ा है क्योंकि अदालत के आदेश के बावजूद सरकार ने कुछ नहीं किया है और इस वर्ष भी हज़ारों हज़ार लोगों को यह रहस्यमय दवा दी जाएगी.

प्राकृतिक औषधि

मछली के ज़रिए दी जाने वाली इस दवा पर हैदराबाद के गौड़ परिवार का एकाधिकार है, उनका कहना है कि यह प्राकृतिक औषधि है जो उनके परदादा को हिमालय के एक तपस्वी ने 1854 में दी थी.

गौड़ परिवार के एक सदस्य बठिनी हरिनाथ कहते हैं कि उनका परिवार पिछले 150 वर्षों से यह दवा लोगों को मुफ़्त में देता रहा है.

गौड़ परिवार का कहना है कि वे इस दवा का फ़ार्मूला नहीं बता सकते क्योंकि ऐसा करने से उसकी 'शक्ति चली जाएगी' और दूसरे लोग इसे अपना धंधा बना लेंगे.

लेकिन आईएमए का कहना है कि पिछले वर्ष एक निजी प्रयोगशाला में जाँच के बाद पाया गया था कि इस दवाई में स्टीरॉइड, कई धातु, पारा और ऐसे अनेक तत्व हैं जो दमा के रोगियों के लिए हानिकारक हैं, साथ ही नई बीमारियाँ पैदा कर सकते हैं.

गौड़ परिवार इन आरोपों को निराधार बताता है और उनका कहना है कि डॉक्टर हमेशा से ऐसी बात करते रहे हैं लेकिन लाखों लोग इसीलिए उनके पास आते हैं क्योंकि इस उपचार से बीमारी दूर हो जाती है.

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