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अंग प्रतिरोपण के लिए अच्छी ख़बर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यदि कनाडा के शोधकर्ताओं की बात मान लें तो आने वाले दिनों में किसी में भी किसी भी व्यक्ति के अंग प्रतिरोपित किए जा सकेंगे. इस समय अंग प्रतिरोपण के लिए अंग देने वाले और लेने वाले दोनों के ब्लड ग्रुप और कोशिकाओं की संरचना की बहुत सावधानी के साथ जाँच करनी होती है. शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने यह खोज कर ली है कि शरीर के प्रतिरोधक क्षमता में इस तरह के परिवर्तन किए जा सकते हैं जिससे कि वह किसी भी ब्लड ग्रुप के अंग स्वीकार कर ले. फ़िलहाल यह प्रयोग छोटे बच्चों में हृदय के प्रतिरोपण के लिए किया गया है लेकिन शोधकर्ता कह रहे हैं कि यह प्रयोग अधिक उम्र के लोगों पर भी किया जा सकता है. अब तक जो प्रक्रिया अंग प्रत्यारोपण के लिए अपनाई जाती है उसके अनुसार यदि किसी का ब्लड ग्रुप ओ-पॉज़िटिव है तो उसे एक ऐसे दानदाता का इंतज़ार करना पड़ेगा जिसका ब्लड ग्रुप भी ओ-पॉज़िटिव हो. लेकिन कनाडा के शोधकर्ताओं ने 2001 में यह कर दिखाया कि यदि बहुत छोटे बच्चों में हृदय प्रतिरोपण किया जाए तो यह नियम लागू नहीं होता. उन्हीं शोधकर्ताओं का कहना है कि वास्तव में जिस शरीर में दूसरे ब्लड ग्रुप का हृदय लगाया गया उस शरीर ने अपनी प्रतिरोधक क्षमता में परिवर्तन कर लिया. उनका कहना है कि बहुत छोटे बच्चों के शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली को यह लगने लगा कि दोनों ही ब्लड ग्रुप उसी शरीर के हैं और वह दोनों के साथ काम करने लगा. यदि प्रतिरोधक क्षमता में परिवर्तन को अधिक उम्र के या बूढ़े लोगों पर भी लागू किया जा सकेगा तो अंग प्रतिरोपण के क्षेत्र में एक नई शुरुआत होगी और इससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का अंग प्रतिरोपण हो सकेगा. |
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