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रविवार, 12 सितंबर, 2004 को 04:38 GMT तक के समाचार
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सपने के स्टूडियो का पता चला
समयचक्र बदलने से नींद गड़बड़ाती है
स्विट्ज़रलैंड के वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने दिमाग़ के उस हिस्से का पता लगा लिया है जिसे सपनों का स्टूडियो कहा जा सकता है, यानी वो हिस्सा जहाँ हमारे सपने जन्म लेते हैं.

स्विट्ज़रलैंड के ज़्यूरिख यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के डॉक्टरों की टीम एक ऐसी महिला का इलाज कर रही थी जिसे पक्षाघात के बाद सपने आने बंद हो गए थे.

स्विस शोध दल का कहना है कि यह हिस्सा दिमाग़ के पिछले हिस्से में काफ़ी अंदर की तरफ़ होता है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि उनकी इस खोज से मानव मस्तिष्क की कई गुत्थियों को सुलझाने और बीमारियों का इलाज ढूँढने में मदद मिल सकती है.

विज्ञान अभी तक इस बात का पुख़्ता जवाब नहीं दे पाया है कि सपने कैसे बनते हैं और सपने देखने या न देखने से क्या फ़ायदे या नुक़सान हैं.

पक्षाघात की जिस 73 वर्षीया रोगी का इलाज करने के दौरान वैज्ञानिकों ने यह खोज किया उनकी दृष्टि पक्षाघात के साथ चली गई थी, कुछ दिनों के बाद आँखों की रोशनी तो वापस आ गई लेकिन सपने हमेशा के लिए गुम हो गए.

शोध

सी समस्या कम ही देखने को मिलती है और वैज्ञानिकों ने तय किया कि वे इस महिला के दिमाग़ में होने वाली हर हरकत पर नज़र रखेंगे.

लगातार छह सप्ताह तक नींद के दौरान महिला की दिमाग़ की हलचल पर ग़ौर किया गया.

नींद
सपने कैसे आते हैं इसके बारे जानकारी बहुत कम है

महिला की नींद ठीक थी और उनकी आँखों की पुतलियाँ भी आम लोगों की ही तरह हिल रही थीं जिसे वैज्ञानिक रैपिड आइ मूवमेंट या आरईएम कहते हैं.

आँखों की हरकत और सपने वैसे तो एक साथ चलते हैं लेकिन ये दोनों काम दिमाग़ के अलग-अलग हिस्सों से नियंत्रित होते हैं.

मरीज़ के दिमाग़ के स्कैन से पता चला कि पक्षाघात ने उनके दिमाग़ के पिछले भाग में एक ख़ास हिस्से को नुक़सान पहुँचाया था, वैज्ञानिक पहले से यह बात जानते हैं कि यही हिस्सा चीज़ें देखकर उन्हें पहचानने और याद रखने में सक्रिय होता है.

एक वर्ष के बाद महिला ने डॉक्टरों को बताया कि अब उन्हें कभी-कभी सपने आने लगे हैं लेकिन वे उतने स्पष्ट नहीं होते जैसे पहले होते थे.

वैज्ञानिकों ने जब उस महिला का दोबारा स्कैन किया तो पता चला कि दिमाग़ के पिछले हिस्से में पहुँची क्षति पहले से काफ़ी बेहतर हो गई है, इसी के आधार पर वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि सपने कहाँ जन्म लेते हैं.

इस खोज का दावा करने वाले वैज्ञानिक ख़ुद भी कहते हैं कि इस दिशा में अभी और अध्ययन किए जाने की ज़रूरत है.

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