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दिमाग़ की घड़ी कैसे चलती है भला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्या आपने कभी इस तह में जाने की कोशिश की है कि जैटलैग क्यों होता है यानी अलग-अलग समय चक्र वाले देशों में जाने पर थकान ज़्यादा क्यों महसूस होती है. वैज्ञानिकों ने इस बारे में कुछ ठोस कारण जानने का दावा किया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि आदमी के दिमाग़ में दो समय केंद्र होते हैं जिनमें से एक तो घड़ी के मुताबिक़ चलता है और दूसरा दिन निकलने और रात होने के प्रभाव में रहता है. पत्रिका 'करेंट बॉयोलॉजी' में कुछ वैज्ञानिकों ने लिखा है कि जब दिमाग़ के ये दोनों केंद्र आपस में तालमेल नहीं बिठा पाते तो जैट लैग महसूस होता है. यह शोध करने वाले वाशिंगटन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि इन कारणों का पता लगाए जाने के बाद ऐसी दवाई बनाई जा सकती है जिससे जैटलैग पर क़ाबू पाया जा सके. शोधकर्ता डॉक्टर होराशियो दा ला इगलेशिया का कहना है, "अगर हम यह पता लगाने में कामयाब हो जाए कि दिमाग़ के दोनों केंद्र किस तरह से तालमेल बिठाते हैं तो जैटलैग के इलाज का रास्ता खोजा जा सकता है." अलग हिस्से दिमाग़ में सुपराशियास्मेटिक न्यूक्लियस नाम का एक छोटा सा हिस्सा होता है जो नींद, हारमोन और शरीर के तापमान के उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करता है. कहा जाता है कि दिमाग़ का यही हिस्सा दिन निकलने और ढलने जैसे बाहरी तत्वों के असर में रहता है. दिमाग़ का दूसरा छोटा हिस्सा 24 घंटे के चक्र से प्रभावित होता है और यह बाहरी तत्वों से अप्रभावित रहता है. शोध शोधकर्ताओं ने चूहों पर प्रयोग किया जिसमें उन्हें 12 घंटे के सामान्य दिन या रात के बजाय 11 घंटे के दिन-रात में रखा गया.
प्रयोग में पाया गया कि चूहों ने रात में भी दिन की ही तरह बर्ताव करना शुरू कर दिया. इस प्रक्रिया में चूहों में दो तरह के प्रोटीन पाए गए. एक था पर्ल नामक जो आमतौर पर दिन में सक्रिय होता है और दूसरा बीमाल नामक जो आमतौर पर रात में सक्रिय होता है. जब उन्हें रौशनी करके दिन का वातावरण दिया जाता था तो उनके दिमाग़ में पर्ल नाम का प्रोटीन सक्रिय होता था और अंधेरा करने पर बीमाल नामक प्रोटीन सक्रिय हो जाता था. लेकिन जब चूहे रात में भी दिन का माहौल मिलने पर उसी के अनुरूप बर्ताव करना शुरू कर देते थे तो उनके अंदर दोनों तरह के प्रोटीन मौजूद होते थे. पर्ल दिमाग़ के ऊपरी आधे हिस्से में और बीमाल निचले हिस्से में होता था. इससे यह नतीजा निकाला गया कि दिमाग़ का तलहटी वाला हिस्सा 24 घंटे वाले समयचक्र पर चलता है और रौशनी मिलने पर इसी हिस्से में सक्रियता होती है. इसका यह मतलब भी निकाला गया कि ऊपरी आधा हिस्सा दिन निकलने और रात होने जैसे बाहरी कारणों के ज़्यादा प्रभाव में रहता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि जब दिमाग़ के इन दोनों हिस्सों में तालमेल नहीं बैठ पाता तो आदमी जैटलैग यानी समयचक्र बदलने से थकान महसूस करता है. |
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