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इंजेक्शन की ज़रूरत नहीं रहेगी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका में वैज्ञानिक शरीर में दवा पहुँचाने या फिर ख़ून निकालने के लिए एक ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं जो कि इंजेक्शन या सूई देने की ज़रूरत ख़त्म कर सकती है. हार्वर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने पाया है कि त्वचा में सूई चुभाने के बजाय त्वचा की सतह पर गैस की तेज़ पतली धारा छोड़ी जा सकती है. इसके लिए प्रयुक्त गैस में धारदार कण होते हैं जो कि त्वचा के ऊपरी सतह को हटा कर वहाँ छोटे-छोटे छिद्र कर देते हैं. इन छिद्रों के ज़रिए शरीर में दवा पहुँचाई जा सकती है. मधुमेह जैसी बीमारी से ग्रस्त लोगों के लिए यह खोज बहुत लाभदायक सिद्ध होगी जिन्हें कि बार-बार सूइयाँ लेनी होती हैं. नई तकनीक को माइक्रोसीज़न कहा जाता है. इसमें त्वचा के किसी छोटे-से हिस्से पर अक्रिय अल्युमिनियम ऑक्साइड रवायुक्त गैस की तेज़ पतली धारा प्रवाहित की जाती है. इस प्रक्रिया में त्वचा की ऊपरी खुरदरी सतह हट जाती है और नीचे की तहों में अत्यंत महीन सुराख बन जाते हैं. पूरी प्रक्रिया में मुश्किल से 20 सेकेंड लगते हैं. प्रयोग सफल हार्वर्ड के वैज्ञानिकों ने कुछ लोगों पर इसका सफल प्रयोग किया है. प्रयोग में शामिल लोगों की त्वचा में चार सुराखें की गईं और उन पर एनास्थेटिक दवा में भिंगोया एक पैड बाँधा गया. डॉ. जेम्स वीवर के नेतृत्व वाले विशेषज्ञों के दल ने पाया कि कम गहराई वाली सुराखों के ज़रिए गई एनास्थेटिक दवा ने ज़्यादा जल्दी असर किया. विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा संभवत: इसलिए हुआ कि गहरी सुराखों में आए ख़ून ने दवा को प्रभाव को कम कर दिया होगा. हालाँकि माना जाता है कि मधुमेह के रोगी ग्लूकोज लेवल चेक करने के लिए ख़ून त्वचा में बनी गहरी सुराखों के ज़रिए ले सकेंगे. |
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