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विकासशील देशों में इंजेक्शन के ख़तरे
एक अध्ययन के अनुसार विकासशील देशों में जो इंजेक्शन लगाए जाते हैं उनमें से एक तिहाई एचआईवी और हेपाटाइटस बी जैसे संक्रमणों को जन्म देते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन और अमरीका के रोग नियंत्रण केंद्र के एक संयुक्त शोध में कहा गया है कि अनुपयुक्त चिकित्सा सेवाएँ और बार-बार इस्तेमाल में आ रही सिरिंजें लोगों की ज़िंदगी ख़तरे में डाल रही हैं. ब्रिटिश मेडिकल जरनल में छपे इस अध्ययन में यह भी कहा गया है कि कई बार तो सूई लगाने की ज़रूरत भी नहीं होती. जैसे कई मरीज़ों को विटामिन या मुँह से देने वाली दवाइयाँ दी जा सकती हैं. इस बात पर चिंता ज़ाहिर की गई है कि कई बार एक ही सूई बिना उबाले कई लोगों को लगा दी जाती है. इस अध्ययन में दुनिया भर के चौदह क्षेत्रों से आँकड़े एकत्र किए गए.
हालाँकि लातिन अमरीकी देशों से कोई जानकारी हासिल नहीं की जा सकी. वैज्ञानिकों ने पाया कि जो सुइयाँ लगाई गई थीं उनमें से 75 फ़ीसदी बार-बार इस्तेमाल की गईं. इस अध्ययन का नेतृतव किया था विश्व स्वास्थ्य संगठन के रक्त सुरक्षा विभाग के डॉक्टर इवान हुतिन ने. उनका कहना है, यह एक हैरानी की बात थी कि मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया की बनिस्बत सब सहारा क्षेत्र में इंजेक्शन का कम इस्तेमाल था. उस क्षेत्र के लोग इस ख़तरे के प्रति जागरूक हैं जबकि अन्य जगह ऐसा नहीं है. वैसे रिपोर्ट में कहा गया है कि इंजेक्शन सुरक्षित बनाए जा सकते हैं. ग़ैर-ज़रूरी इंजेक्शन लगाना बंद होना चाहिए और स्वास्थ्य कर्मचारियों को बेहतर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए. बीबीसी की स्वास्थ्य संवाददाता के अनुसार रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दानकर्ता एजेंसिया जब बड़े पैमाने पर टीका लगाने का अभियान चलाती हैं तो वे सुइयाँ सुरक्षित होती हैं. |
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