|
नासा में मेरा दूसरा दिन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आज सुबह जब हम नासा पहुँचे तो हमने रोवर से आ रही तस्वीरों का रंग एडजस्ट करना सीखा. इसका मक़सद ये था कि हमें पता चल सके कि मंगल ग्रह पर असली रंग कैसे हैं, इससे काफ़ी जानकारी मिलती है. इसके एक घंटे के बाद हम साइंस कॉनटेस्ट मीटिंग में गए जहाँ बहुत ज़्यादा लोग नहीं थे. इस मीटिंग में एक वैज्ञानिक ने अपना प्रेजेंटेशन दिया जिसमें हमें बताया गया कि रोवर किस तरह ऊर्जा का इस्तेमाल कर रहा है. मिसाल के तौर पर रोवर को चलाने के लिए कितनी ऊर्जा ख़र्च हो रही है और उसकी दूसरी गतिविधियों के लिए कितनी. इसमें रोवर के चलने के तरीक़ों के बारे में भी बताया गया, रोवर दो तरीक़े से चलता है, एक तो ज़मीन से नासा के वैज्ञानिक उसे चलाते हैं, दूसरे उसका ख़ुद का भी ऑटोमैटिक सिस्टम भी है. रोवर जब ख़ुद चलता है तो उसकी गति काफ़ी कम होती है लेकिन ज़मीन से उसकी गति काफ़ी बढ़ाई जा सकती है. वैज्ञानिक ने यह भी बताया कि मिशन के साठ दिन पूरे होने तक रोवर की एनर्जी काफ़ी कम हो जाएगी इसलिए वे काफ़ी काम इस समय से पहले पूरा कर लेना चाहते हैं. इसके बाद हम डाउनलिंक एसेसमेंट के लिए गए यानी यह देखने के लिए दिन भर में रोवर ने क्या काम किया है. रोवर की अपनी पोजीशन से पीछे जाना था, तस्वीरें लेनी थीं और कई चीज़ों का आकलन करना था लेकिन वह चल नहीं पाया. उसने आँकड़े तो दिए लेकिन पीछे जाकर नहीं बल्कि अपनी जगह पर खड़े-खड़े. वैज्ञानिकों ने रोवर के पत्थर काटने वाले ड्रिल के बारे में भी जानकारी दी. वैज्ञानिकों ने कई मुद्दों पर विस्तार से बातचीत की काफ़ी मज़ा आया." |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||