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शुक्रवार, 16 जनवरी, 2004 को 17:01 GMT तक के समाचार
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ज़िंदगी की प्रयोगशाला के माहिर

बाइकट्रैक्टर
मोटरसाइकिल बना ट्रैक्टर

आपने भारत के गाँवों में एनफ़ील्ड मोटरसाइकिल तो ख़ूब देखी होगी लेकिन क्या कभी उसे ट्रैक्टर की तरह खेत में काम करते देखा है.

नहीं, तो गुजरात के मनसुखभाई से मुलाक़ात कीजिए. ट्रैक्टर ख़रीदना उनके लिए संभव नहीं था तो उन्होंने अपनी मोटरसाइकल का पिछला पहिया निकाला और उसकी जगह लगाई खेत जोतने के लिए एक छोटी सी मशीन.

और जब खेत का काम ख़त्म, सिलेंडर हटा कर पहिया वापस और मोटरसाइकल फिर सड़क पर.

यह केवल एक उदाहरण है. ऐसे हज़ारों आविष्कार हैं जो भारत के राष्ट्रीय आविष्कारक कोष यानी नेशनल इनोवेटर्स फ़ंड (एनआईएफ़) में शामिल हैं.

इस कोष का उद्देश्य है कि ज़मीन से जुड़े लोगों की अनोखी खोज और पहल को एक स्थान मिल सके और उन्हें बढ़ावा और मदद भी.

एनआईएफ़ के निदेशक अनिल गुप्ता ने बीबीसी को बताया "यह समय है कि दुनिया आम आदमी की उस प्रतिभा को पहचाने जो समाज की बहुत-सी समस्याओं को सुलझाने में मदद कर सकती है."

"एनआईएफ़ पारंपरिक ज्ञान का एक राष्ट्रीय कोष बना रहा है, उसमें ऐसे लोगों को शुरूआत करने के लिए प्रारंभिक रकम उपलब्ध करवाने की सुविधा है जिन्हें बैंक आदि से पैसा नहीं मिल सकता."

कल्पना की उड़ान

इस कोष की स्थापना तीन साल पहले की गई थी और उसके बोर्ड में भारतीय वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ आरए माशेलकर भी शामिल है.

दूध दूहने की छोटी-सी मशीन ने किसानों का काम आसान किया

उनका कहना है कि यह छोटे स्तर पर किए गए आविष्कार उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने किसी वैज्ञानिक प्रयोगशाला में.

उन्होंने कहा "यह वो अविष्कारक हैं जो जीवन की प्रयोगशाला में काम करते हैं लेकिन इनका कभी नाम नहीं होता."

"जहाँ तक भारत का प्रश्न है, जैसे ही हमें पता चलता है कि कोई अनपढ़ है, हम उसे महत्वहीन मान लेते हैं. हम उनकी प्रतिभा को नकार देते हैं."

भारत में, जहाँ 6 लाख गाँव हैं, और बिजली पानी भी बड़ी समस्याएँ हैं, वहाँ लोग अकसर लोग अपनी ज़रूरतों के लिए नए रास्ते तलाशते रहते हैं.

जैसे सुंडा राम वर्मा को लीजिए जो राजस्थान के सीकर ज़िले के दाता गाँव में रहते हैं.

 एनआईएफ़ पारंपरिक ज्ञान का एक राष्ट्रीय कोष बना रहा है, उसमें ऐसे लोगों को शुरूआत करने के लिए प्रारंभिक रकम उपलब्ध करवाने की सुविधा है जिन्हें बैंक आदि से पैसा नहीं मिल सकता

अनिल गुप्ता

उन्होंने एक ऐसा तरीका खोजा है जिससे रेगिस्तान में लगाया पौधा साल में केवल एक बार पानी दिए जाने के बावजूद ज़िंदा रहता है.

उन्होंने ऐसा उपाय किया है कि सतह पर आने से सूखने वाले पानी को बचा लिया जाए.

बुद्धि का कमाल

सुंडा राम की तकनीक यह है कि मॉनसून की पहली बरसात के बाद खेत को एक बार जोत दिया जाए ताकि खर पतवार साफ़ हो जाए.

फिर बारिश ख़त्म होने से ठीक पहले फिर जोतें ताकि मिट्टी की सतह से 8-10 इंच तक की जुताई हो जाए. इससे भीतर का पानी उपर नहीं आने पाएगा और ठीक इस समय लगाए गए पौधे को साल भर तक फिर सींचना नहीं पड़ेगा.

राजस्थान, जहाँ पीने का पानी भी दुर्लभ है, वहाँ सुंडा राम की यह तकनीकि बहुत लाभदायक हो सकती है और शायद दुनिया के अन्य हिस्सों में भी इसे अपनाया जा सकता है.

इसी तरह से केरल में एक आविष्कार की बनाई नारियल छीलने वाली मशीन भी कमाल की है. जो काम घंटो में होता था, अब मिनटों में हो रहा है.

विचार का पेंटेट

और जब यह आविष्कार इतने ख़ास हैं तो इनका पेटेंट क्यों न कराया जाए. दूसरे इन्हें चोरी न कर लें, इसके लिए भी यह ज़रूरी है.

यह मशीन प्रति मिनट केले के 1200 टुकड़े बनाती है

और इस मामले में सुझाव देने के लिए अनिल गुप्ता से बेहतर कौन हो सकता है क्योंकि वे अहमदाबाद के भारतीय प्रबंधन संस्थान में इंटेलेक्चुयल प्रोप्रर्टी अधिकारों के इसी विषय के प्रोफ़ेसर हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया "एनआईएफ़ ने भारत में इन आविष्कारों के लिए 60 पेटेंटों के लिए आवेदन किया है और 6 पेटेंट अमरीका में दाखिल किए गए हैं."

"आठ अप्रैल 2003 को मनसुखभाई को अमरीका में पेटेंट मिल भी चुका है. हम यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि सही मार्गदर्शन और सहयोग से ग्लोबलाइज़ेशन की ताकतों से छोटे स्तर के आविष्कारकों को सहारा दिया जा सकता है."

लेकिन एनआईएफ़ के आविष्कारकों को पेटेंटो का इंतज़ार नहीं है, वे अभी से अपने खोज को बाज़ार में उतार रहे हैं.

गायों को नहलाने वाली मशीन से लेकर, रूई अलग करने वाली मशीन, हल्दी खोदने की मशीन तक, ऐसे कितने ही आविष्कार हैं जो एनआईएफ़ में रोज़ शामिल हो रहे हैं.

16 हज़ार लोगों ने अभी तक अपने आविष्कार या तकनीक भेजी है और जैसे जैसे एनआईएफ़ के बारे में लोगों को पता चल रहा है यह गिनती बढ़ती ही जा रही है.

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