कितनी महफ़ूज़ है इंटरनेट की दुनिया

एडवर्ड स्नोडेन

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आठ महीने पहले ने यूएस नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी से जुड़ी कुछ गोपनीय जानकारी सार्वजनिक की थी, जिसके बाद से ही तकनीक और ख़ासतौर पर इंटरनेट की दुनिया में कई तरह की चिंताएं सामने आई हैं.

जगज़ाहिर हुई इस जानकारी से पता चला कि अमरीकी जासूस और उनके ब्रितानी सहयोगी, आम और ख़ास तमाम लोगों के बारे में हर तरह का ब्यौरा जुटाने के लिए इसी इंटरनेट का इस्तेमाल करते रहे हैं.

इतना ही नहीं, अमरीकी जासूसों ने सोशल मीडिया के ज़रिए भी लोगों के बारे में वह जानकारी जुटाई जो लोग आमतौर पर किसी से साझा नहीं करना चाहेंगे.

यानी इंटरनेट के ढाँचे में एक तरह से सेंध लग चुकी है.

जैसे बिग-बैंग सिद्धांत के अनुरूप ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है, उसी तरह तकनीक के मामले में इंटरनेट की दुनिया भी बहुत फैल चुकी है.

इस फैली हुई दुनिया को राउटर्स, केबल्स, डेटा सेंटर और तमाम दूसरे हार्डवेयर की ज़रूरत थी जो साल 1994 से वर्ष 2013 के दरम्यान कई गुना बढ़ चुके हैं.

इंटरनेट की दुनिया में उन कंपनियों और संगठनों की बड़ी अहम भूमिका है जो उच्च क्षमता वाले फ़ाइबर ऑप्टिक केबल्स के ज़रिए दुनिया भर में एक जगह से दूसरी जगह तक डेटा पहुंचाने का काम करते हैं.

इस मामले में गूगल और अमेज़न जैसी कंपनियां अव्वल स्थान पर हैं.

डेटा ट्रांसफ़र

इंटरनेट पर हम जो कुछ भी करते हैं, वह सारी जानकारी गूगल या अमेज़न जैसी किसी कंपनी के पास दर्ज होती है.

मसलन लंदन में रहने वाला कोई विद्यार्थी ब्राज़ील में रहने वाले अपने किसी मित्र को ई-मेल भेजता है, तो उस ई-मेल में छिपी जानकारी पूरे नेटवर्क से होकर गुजरती है और इसी प्रक्रिया में वह जानकारी संबंधित कंपनी के पास भी हमेशा के लिए महफ़ूज हो जाती है.

इसी प्रक्रिया में यह जानकारी सुरक्षा एजेंसियों तक पहुंच जाती है.

नवम्बर 2013 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने ख़बर दी थी कि यूएस नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी ने लेवल-3 केबल्स के ज़रिए गूगल और याहू तक में सेंध लगाई होगी.

एक बयान में कंपनी ने बीबीसी को बताया था, ''हम जिस भी मुल्क में काम करते हैं, वहां के क़ानून से बंधे होते हैं. कई मामलों में क़ानून हमें किसी भी तरह की जानकारी साझा करने से मना करता है और इस बारे में चर्चा करना हमारे लिए अपराध है.''

समुद्र के नीचे बिछी केबल्स की निगरानी

स्नोडेन ने जो दस्तावेज़ सार्वजनिक किए थे, उन्हें बीते साल जून में ब्रितानी अख़बार गार्डियन ने छापा था.

इससे संकेत मिलता है कि अमरीका और ब्रिटेन के पास उच्च तकनीक वाले जासूसी कार्यक्रम हैं जो इंटरनेट के माध्यम से आने-जाने वाली हर जानकारी को पकड़ सकते हैं.

इंटरनेट केबल्स

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इसमें समुद्र के नीचे बिछी वो केबल्स भी शामिल हैं जिनके ज़रिए आपके-हमारे मोबाइल फ़ोन में दर्ज हर ब्यौरा एक जगह से दूसरी जगह पहुंचता है.

सार्वजनिक हो चुके गोपनीय दस्तावेज़ बताते हैं कि अमरीकी साझेदार ब्रिटेन का जीसीएचक्यू हर दिन 60 करोड़ संदेशों की निगरानी करता था.

इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन से जुड़ी इस जानकारी को खंगालने के इरादे से तीस दिन तक कथित रूप से सहेजकर भी रखा जाता था.

हालांकि जीसीएचक्यू ने ऐसी किसी हरकत से इंकार किया है.

अंदाज़ा लगाना मुश्किल

यूएस नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी ने इस तरह कितनी जानकारी जुटाई, इसका सटीक अनुमान लगाना कठिन है.

वहीं इस हरकत की वैधानिकता पर भी राय बंटी हुई है.

कुछ लोगों का मानना है कि चरमपंथी तंत्र को तहस-नहस करने के लिए इस तरह की जानकारी काफ़ी अहम साबित हो सकती है.

वहीं कुछ यह भी कहते हैं कि इससे आम लोगों की आज़ादी ख़तरे में पड़ जाती है.

'डेटा पॉवर'

वैसे स्नोडेन ने जो कार्य किया है, उससे सरकारी स्तर पर और बड़े स्तर के संगठनों में इंटरनेट के इस्तेमाल के तौर-तरीकों में बदलाव आ सकता है.

पत्रकार ग्लेन ग्रीनवाल्ड के लिए स्नोडेन के दस्तावेज़ों का विश्लेषण करने वाले सुरक्षा विशेषज्ञ ब्रूस श्नायर कहते हैं, ''डेटा, पावर यानी प्रभाव है और डेटा ही मनी यानी पैसा है.''

ब्रूस श्नायर ने बीबीसी से कहा, ''निगरानी से कहीं बड़ा सवाल यह है कि इस डेटा पर किसका नियंत्रण है. सूचना युग में यह प्रमुख सवाल है.''

लेकिन तकनीक के जानकारों का कहना है कि इससे ऑनलाइन काम करना बहुत मुश्किल हो जाएगा और साथ ही दुनियाभर में लोगों से जुड़ना भी कठिन हो जाएगा.

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