क्या हो जब बीबी बच्चे पहचान में ना आएं

- Author, गैब्रिएला टोरेस
- पदनाम, बीबीसी मुंडो स्वास्थ्य संवाददाता
कल्पना कीजिए कि आप अपनी मां, अपनी पत्नी/पति और अपने बच्चे को नहीं पहचान पा रहे हैं. आप उन्हें देख रहे हैं लेकिन आपका दिमाग़ उनके बारे में जानकारी नहीं दे रहा है- आप यह नहीं समझ पा रहे हैं कि वह मुस्कुरा रहे हैं या नहीं, आप यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उनकी भावनाएं क्या हैं?
दिमाग पर चोट लगने के बाद डेविड ब्रोम्ली के साथ यही हुआ. चोट लगने के बाद वह प्रोसोपैग्नोसिया के शिकार हो गए.
इस बीमारी के शिकार लोग आंखें, नाक, मुंह को अलग-अलग देख सकते हैं लेकिन किसी के चेहरे को मुकम्मल रूप से नहीं देख पाते, न ही चेहरे के भाव या मुद्राएं पहचान पाते हैं.
डेविड कहते हैं, "मैं घर आने पर अपनी बीवी को पहचान सकता हूँ लेकिन अगर वो सड़क पर वो मेरे बगल से गुजरे और मुझे पता न हो कि वो वहाँ आने वाली है तो मैं उसे पहचान नहीं पाऊँगा."
सामाजिक शर्मिंदगी
इंग्लैंड के एसेक्स के निवासी डेविड की <link type="page"><caption> आंख</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/02/130209_colour_blindness_pn.shtml" platform="highweb"/></link> में जन्म से ही दिक्कत थी लेकिन उन्हें इसका पता नहीं था.
उनकी रक्तवाहिनियां (आर्टरीज़) और शिराएं जुड़ी हुई थीं. इससे अंततः <link type="page"><caption> आंख में रोशनी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/07/130723_blindness_stemcells_nn.shtml" platform="highweb"/></link> कम हो गई और दिमाग में क्षति हुई जिससे प्रोसोपेग्नोसिया हो गया.
इसका सबसे मुश्किल पहलू यह है कि लोगों को तुरंत पता नहीं चलता कि उनके साथ कोई गड़बड़ हो गई है.
प्रोसोपेग्नोसिया के दो प्रकार हैं. पहला है विकासशील- जिसमें लोग चेहरा पहचानने की योग्यताओं को विकसित करने में असफल रहते हैं.
दूसरा प्रकार है उपार्जित- यह दिमाग़ में किसी तरह की चोट लगने के बाद होता है और यह बहुत दुर्लभ है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ ईस्ट लंदन में कग्निटिव न्यूरोसाइकोलॉजी विशेषज्ञ डॉक्टर अशोक जनसारी कहते हैं, "उपार्जित प्रोसोपेग्नोसिया बहुत दुर्लभ होता है क्योंकि इसके लिए बहुत खास जगह पर चोट लगने की ज़रूरत होती है."
डेविड कहते हैं, "मुझे समझ नहीं आता कि क्या ज़्यादा ख़राब बात है, आजीवन किसी को न पहचान न पाना या फिर मेरी तरह अचानक 56 साल की उम्र में किसी को भी न पहचान पाना."
डेविड कहते हैं कि इस बीमारी की सबसे बड़ी मुश्किल तो समाज में इसकी वजह से होने वाली शर्मिंदगी है.
वह बताते हैं, "हम क्यूबा में छुट्टियां मना रहे थे. मैं डेनमार्क के एक आदमी से बात कर रहा था कि तभी एक औरत आई और बोली 'ब्यूनोस डाएस' यानी कि हेलो. इस पर मैंने कहा हेलो, आपसे मिलकर ख़ुशी हुई. मैं समझ रहा था कि वह उसकी बीवी है लेकिन वह दरअसल मेरी बीवी थी और मैं उसे पहचान ही नहीं पाया था."
कामकाज में दिक्कत

लंदन की सैंड्रा को 14 साल पहले इंसेफ़ेलाइटिस- मस्तिष्क कोप- हो गया था जिसकी वजह से वो <link type="page"><caption> प्रोसोपैग्नोसिया</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/01/130126_science_aspirin_diseases_sp.shtml" platform="highweb"/></link> की शिकार हो गईं.
हालांकि उनका प्रोसोपेग्नोसिया हल्का है- वह उन्हीं लोगों को पहचान पाती हैं जिन्हें उन्होंने बीमार होने से पहले देखा था.
वह कहती हैं, "प्रोसोपेग्नोसिया के साथ जीना बहुत शर्मिंदगी भरा होता है."
वह अपनी इस बीमारी को छुपाती हैं क्योंकि वह नहीं चाहतीं कि कोई उन्हें विकलांग समझे.
सैंड्री के शिक्षिका हैं और जहां वह काम करती हैं कोई नहीं जानता कि वह प्रोसोपेग्नोसिया की शिकार हैं.
वह बताती हैं, "अगर मैं किसी को रोज़ देखती हूं तो मैं उसे पहचान जाती हूं. लेकिन अगर कोई बच्चा रास्ते में मुझे हेलो कहता है तो मैं ये तो समझ जाऊंगी कि ये स्कूल का कोई छात्र है लेकिन वो कौन है- ये पता नहीं चलेगा."
वह कहती हैं, "मैं बच्चों को कुछ नहीं कहती. शायद इसकी वजह ये है कि मैं नहीं चाहती कि वो सोचें कि मैं अपना काम नहीं कर सकती, क्योंकि यह सच नहीं है. मैं शर्मिंदा नहीं होना चाहती और न ही ये चाहती हूं कि लोग समझें कि मेरे साथ कोई गड़बड़ है."
डॉक्टर जनसारी डेविड और सैंड्रा की भावनाओं और डर को समझते हैं.
वह ऐसे मामलों से वाकिफ़ हैं जिनमें इस दिक्कत की वजह से लोगों की नौकरियां चली गई हैं- जिनमें एक शिक्षिका भी शामिल थी, जिन्हें अपने विद्यार्थियों को पहचानने में दिक्कत होती थी.
प्रोसोपेग्नोसिया को विकलांगता की श्रेणी में नहीं रखा गया है. हालाँकि डॉक्टर जनसारी का मानना है कि कुछ मामलों में ऐसा किया जाना चाहिए.
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