मंगल ग्रह पर रोवर का ऐतिहासिक प्रयोग

क्यूरियोसिटी रोवर
इमेज कैप्शन, क्यूरियोसिटी रोवर ने मंगल की एक चट्टान में छेद कर चट्टान का महीन चूरा निकाला है

मंगल ग्रह अभियान पर गए अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के क्यूरियोसिटी मार्स रोवर ने पहली बार एक चट्टान में ड्रिल का इस्तेमाल कर उसका बारीक नमूना लेने में कामयाबी हासिल की है.

चट्टान में किए गए करीब छह सेंटीमीटर के छेद से महीन मिट्टी निकली है. चट्टान की मिट्टी के इस चूरे को रोबोट की प्रयोगशाला में भेजने से पहले छांटने की प्रक्रिया होगी और फिर इसकी जांच की जाएगी.

ग्रहों की खोज के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है. इससे पहले किसी ग्रह के चट्टान की जांच इस तरह नहीं की गई है.

अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी का कहना है कि ड्रिलिंग ही उनके लिए एक बड़ी सफ़लता थी.

इस अभियान के मुख्य वैज्ञानिक प्रोफेसर जॉन गोर्टजिंगर का कहना है, "पिछले साल अगस्त में मंगल ग्रह पर उतरे क्यूरियोसिटी रोवर की टीम के लिए यह एक बड़ी सफ़लता है. यह अमरीका के लिए भी गर्व की बात है."

मंगल ग्रह के इस अभियान के जरिए इस बात की पड़ताल की जा रही है कि क्या कभी अतीत में ग्रह पर ऐसा वातावरण था, जिसमें जीवाणु पनपने की गुंजाइश थी.

हालांकि पिछले रोवर ने मंगल की चट्टानी धरती को खुरचा था लेकिन पहली बार इस क्यूरोसिटी ने ज़मीन के भीतर खुदाई कर चट्टान का चूरा निकाला है.

उत्साहजनक सफ़लता

वैज्ञानिक इस अभियान में मिली अब तक की सफलता से बेहद उत्साहित है.

क्यूरोसिटी पिछले साल छह अगस्त को मंगल पर उतरा था.

क्यूरियोसिटी रोवर
इमेज कैप्शन, क़रीब 24 हज़ार करोड़ मील की दूरी तय कर क्यूरियोसिटी रोवर मंगल पर उतरा.

26 नवंबर 2011 को इस यान को छोड़ा गया था और क़रीब 24 हज़ार करोड़ मील की दूरी तय कर यह यान मंगल पर उतरा.

न्यूलियर फ्यूल से चलने वाले इस 'क्यूरोसिटी रोवर' अभियान की लागत है क़रीब 2.5 अरब डॉलर.

इस अभियान के तहत नासा वैज्ञानिकों ने एक अति उन्नत घूमती फिरती प्रयोगशाला को मंगल ग्रह पर भेजा है.

इस प्रयोगशाला से मिली जानकारी मंगल ग्रह के इतिहास को समझने में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है.

रोवर की यात्रा के तीन चरण थे. पहला, मंगल ग्रह में घुसना, दूसरा नीचे सतह की ओर आना और तीसरा ज़मीन पर उतरना.

इस मार्स रोवर का वज़न 900 किलो है और यह अपनी क़िस्म के अनोखे कवच में ढका हुआ है.

इतिहास

1970 के दशक से लेकर 2008 के फ़ीनिक्स अभियान तक मंगल के हर रोवर अभियान में ग्रह पर उतरने के लिए पहले से बेहतर प्रणाली लगी है लेकिन पहली बार इस प्रणाली के ज़रिए कोशिश की गई थी कि कि रोवर मंगल ग्रह के सबसे गहरे गड्ढों में से एक में उतरे.

इससे पहले वैज्ञानिक हमेशा यह प्रयास करते रहे हैं कि वो समतल सतह पर उतरें ताकि उनकी मशीनें सुरक्षित रहें लेकिन इस बार वैज्ञानिक यह चाहते थे कि वो रोवर को ऐसी जगह उतारें जहाँ सतह सबसे ज़्यादा पथरीली हो ताकि वो पत्थरों का अध्ययन कर सकें.

वैज्ञानिकों के अनुसार मंगल पर जीवन के रहस्य इसके पत्थरों और चट्टानों में ही छिपे हुए मिल सकते हैं.