दुनियाभर के वैज्ञानिक मेंढक के पीछे

‘जल-थलचर’ जानवर
इमेज कैप्शन, ‘जल-थलचर’ जानवरों की लगभग एक-तिहाई प्रजातियां लुप्त होने की कगार पर हैं.

दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने मेंढक की ख़ास प्रजातियों को लेकर एक अभियान छेड़ा है. अभियान के तहत 14 देशों के वैज्ञानिक और संरक्षणकर्ता मेंढक की उन प्रजातियों की खोज में जुटेंगे जिनके बारे में अंदेशा है कि वो लुप्त हो चुकी है.

अगले दो महीने तक चलने वाले इस मिशन के दौरान मेंढक की तीन दुर्लभ प्रजातियों की ख़ोज की जाएगी. ये प्रजातियां हैं गोल्डन टो़ड, हुला पेंटेड फ्रॉग और स्कारलैट फ्रॉग.

दुनियाभर में ज़मीन और पानी में रहने वाले जानवरों की प्रजातियां तेज़ी से खत्म हो रही हैं. अनुमान है की ‘जल-थलचर’ जानवरों की लगभग एक-तिहाई प्रजातियां लुप्त होने की कगार पर हैं. इसकी एक बड़ी वजह प्रदूषित पानी में फफूदीं से होने वाली बीमारियां हैं.

इस अभियान का नेतृत्व कर रहे वैज्ञानिक रॉबिन मूर का मानना है कि इस परियोजना के तहत लगभग सौ प्रजातियों की खोज की जा रही है. उन्हें उम्मीद है कि अधिकतर प्रजातियों को खोज लिया जाएगा.

लुप्त प्रजातियों की खोज

अभियान के तहत मेंढक की तीन दुर्लभ प्रजातियों की खोज की जाएगी
इमेज कैप्शन, अभियान के तहत मेंढक की तीन दुर्लभ प्रजातियों की खोज की जाएगी

बीबीसी से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, “कुछ साल पहले मैं अपनी टीम के साथ मैं ऐसी प्रजातियों की खोज में जुटा था जिन्हें 12 वर्ष से देखा नहीं गया था. हमें उम्मीद नहीं थी कि हम उन्हें खोज पाएंगे, लेकिन एक दिन की खोज के बाद ही हमें एक पत्थर के नीचे हरे रंग का एक मेंढक मिल गया.’’

उनका कहना था,“अलग-अलग देशों से हमें अक्सर ऐसी ख़बरें मिलती हैं जो साबित करती हैं कि मेंढक की जिन दुर्लभ प्रजातियों को हमने विलुप्त मान लिया है वो जिंदा हैं.’’

ज़मीन और पानी में समान रूप से रहने वाले जानवरों के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है उनके प्राकृतिक आवास का ख़त्म होना. दुनियाभर में जंगल कटते जा रहे हैं और वेटलैंड ख़त्म हो रहे हैं.

अक्तूबर महीने में जापान में संयुक्त राष्ट्र का जैविक विविधता सम्मेलन होने वाला है और इस अभियान के नतीजे उससे पहले सामने आ जाएंगे.

वर्ष 2002 में दुनियाभर की सरकारों ने ये वादा किया था कि वो प्राकृतिक नुक़सान को कम करने की दिशा में प्रयास करेंगे. सम्मेलन में इस बात पर विचार किया जाएगा कि सरकारें अपने इस वादे पर अमल करने में नाकाम क्यों रहीं.

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस अभियान के ज़रिए ये जानने में भी मदद मिलेगी कि इंसानी गतिविधियां धरती को किस हद तक नुकसान पहुंचा रही हैं.