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वो चार नाकाम आविष्कार जिन्होंने दुनिया बदल दी
क्या आपको पता है कि दुनियाभर में करोड़ों लोगों की जान बचाने वाला पेसमेकर एक नाकाम आविष्कार का नतीजा था?
कहते हैं कि एक सफल आइडिया जैसे लाइट बल्ब या प्रिंटिंग प्रेस दुनिया बदल सकते हैं. लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि नाकाम हुए आइडिया भी दुनिया बदल देते हैं.
ये सिर्फ़ एक बार नहीं हुआ है. कई बार ऐसे मौके आए हैं जब ऐसे विचारों ने दुनिया बदली है जो अपने समय में सफल नहीं हो सके थे.
और इन वैज्ञानिकों की असफलताओं ने दुनिया बदलकर रख दी.
माउस बनाने वाला कौन?
साल 1960 में स्टेनफॉर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले डगलस एंगलबार्ट को महसूस हुआ कि जिस तरह लोग नए कंप्यूटरों का इस्तेमाल कर रहे हैं, वो प्रभावशाली तरीका नहीं है.
उस दौर में 'माउस' मौजूदा दौर के वीडियो गेम की जॉय स्टिक सरीखी डिवाइस हुआ करती थी. इस डिवाइस को इस्तेमाल करना आसान और सहज नहीं हुआ करता था.
एंगलबार्ट ने इसका समाधान निकालने के लिए 'बग' नामक एक डिवाइस बनाई जिसमें दो गोलाकार पहिए हुआ करते थे जो कंप्यूटर पर दिख रहे कर्सर को नियंत्रित करते थे.
ये एक शानदार आइडिया था.
साल 1966 में नासा ने एंगलबार्ट के आविष्कार का इस्तेमाल किया और इसे काफ़ी प्रभावशाली माना.
इसके दो साल बाद एंगलबार्ट ने सेन फ्रांसिस्को में अपने साथी आविष्कारक बिल इंग्लिश के साथ मिलकर एक हज़ार लोगों के सामने एक डिवाइस का डेमो दिया. इसे माउस कहा गया. तकनीक की दुनिया में इस कार्यक्रम की काफ़ी चर्चा हुई.
एंगलबार्ट और बिल इंग्लिश को लगा कि उनके हाथ ख़जाना लग गया.
लेकिन कुछ ही समय में ये ख़ुशी छूमंतर हो गयी. पांच साल के अंदर एंगलबार्ट को निवेश मिलना बंद हो गया.
उनकी टीम के ज़्यादातर सदस्य स्टेनफॉर्ड छोड़कर चले गए. इनमें बिल इंग्लिश भी शामिल थे जिन्होंने ज़ीरॉक्स में काम करना शुरू किया.
साल 1979 में एक शख़्स ने ज़ीरॉक्स का रिसर्च सेंटर देखने भर के लिए अपने पास मौजूद ज़ीरॉक्स के शेयर दे दिए.
ये शख़्स कोई और नहीं स्टीव जॉब्स थे. और उनकी कंपनी का नाम एप्पल था. यही नहीं, ज़ीरॉक्स के रिसर्च सेंटर से ही माउस निकला.
कहा जाता है कि स्टीव जॉब्स को ये आइडिया इतना पसंद आया कि उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग टीम से कहा कि जो भी कर रहे हैं, उसे तुरंत बंद करके माउस को दोबारा बनाकर एप्पल प्रॉडक्ट के रूप में लॉन्च किया जाए.
माउस पर असली पेटेंट स्टेनफॉर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट के पास था जिसका मतलब ये हुआ कि एंगलबार्ट को माउस के आविष्कार से कुछ भी नहीं मिला.
हालांकि, एंगलबार्ट की सोच समय से आगे की थी लेकिन माउस को असल दुनिया में घर-घर में पहुंचाने के लिए संभवत: स्टीव जॉब्स जैसे शख़्स की ज़रूरत थी जो सपना देखने के साथ-साथ उसे ज़मीन पर उतारने का माद्दा भी रखते हों.
बुलेटप्रूफ़ मैटेरियल किसने बनाया
आपने अक्सर देखा होगा कि हिंसक मिशन में शामिल होने से पहले सशस्त्र बल के जवान बुलेटप्रूफ़ जैकेट पहनते हैं ताकि उन्हें गोलियां न लगें.
कभी सोचा है कि इस ख़ास जैकेट को बनाने में किस मैटेरियल का इस्तेमाल होता होगा और उसे किसने बनाया होगा.
इसका जवाब स्टेफ़नी कोवलेक हैं जो एक बेहद प्रतिभाशाली रसायनशास्त्री थीं जिनकी कपड़ों और धागों में विशेष रुचि थी.
स्टेफ़्नी अपनी रिसर्च भी सिंथेटिक फाइबर के क्षेत्र में कर रही थीं. उन्होंने एक ऐसे सॉल्युशन का आविष्कार किया जो स्टील से मज़बूत था और फाइबरग्लास से हल्का था.
हम उनके आविष्कार को केवलर के नाम से जानते हैं. आज की दुनिया में इसका इस्तेमाल टायरों, ग्लव्स, बुलेटप्रूफ़ जैकेट्स, स्पेस सूट, और स्पेसक्राफ़्ट में भी इस्तेमाल होता है.
लेकिन जब स्टेफ़्नी ने क्रिस्टलों के आकार वाले इस सॉल्यूशन को तैयार किया तो उनके साथियों ने इसे बनाने की प्रक्रिया में उनका साथ देने से इनकार कर दिया.
इस सॉल्यूशन को मशीन में स्पिन किया जाना था ताकि इसकी मज़बूती देखी जा सके लेकिन उनके दोस्तों को लगा कि ऐसा करने पर ये सॉल्यूशन उनकी मशीनों में फंस सकता है.
किसने बनाया 3डी वीडियो हेडसेट
तकनीक की दुनिया में इन दिनों ऑगमेंटेड रियलिटी और वर्चुअल रियलिटी की बात चल रही है. लेकिन क्या बिना हेडसेट के इन दोनों तकनीकी की कल्पना की जा सकती है?
और हेडसेट की शुरुआत एक ऐसे शख़्स से हुई जिसने सिनेमा की दुनिया को बदलने के लिए एक नहीं दो आविष्कार किए जिनमें वह सफल नहीं रहे.
ये शख़्स हैं मॉर्टन हेलिग जिन्होंने सिनेमा देखने वालों को जीवंत अनुभव देने के लिए 1957 में सेंसोरामा नामक डिवाइस बनाई. ये एक 3डी वीडियो मशीन थी जिसमें हिलती हुई सीटें और हवा देने वाली मशीनें थीं. इसका उद्देश्य सिनेमाप्रेमियों को स्क्रीन में दिखने वाले दृश्य का अनुभव उनकी सीट पर देना था.
उदाहरण के लिए, अगर फ़िल्म के सीन में एक व्यक्ति बाइक चलाता हुआ दिख रहा है तो उसे देखने वाला शख़्स हिलती सीट और चेहरे पर लगती हवा के ज़रिए उसे महसूस कर सकता था.
हेलिग को अपनी इस खोज से बहुत उम्मीदें थीं. उन्होंने कार निर्माता हेनरी फोर्ड को ये मशीन बेचने की पेशकश भी की. लेकिन तमाम दूसरे लोगों की तरह फोर्ड ने भी मशीन ख़रीदने से इनकार कर दिया. सेंसोरामा आख़िरकार हेलिग के बगीचे में पड़े-पड़े खराब हो गयी.
इसके तीन साल बाद हेलिग ने टेलिस्फ़ियर मास्क का पेटेंट करवाया जो कि एक 3डी वीडियो हेडसेट था. आज के दौर में वर्चुअल रियलिटी इंडस्ट्री 170 अरब डॉलर की हो गयी है. लेकिन दुख की बात है कि हेलिग इस इंडस्ट्री का हिस्सा नहीं बन सके. उनकी मौत साल 1997 में ही हुई.
पेसमेकर बनाने वाला शख़्स
आज की दुनिया में पेसमेकर एक ऐसी डिवाइस है जो लाखों-करोड़ों लोगों की ज़िंदगी बचा रही है. लेकिन इसके आविष्कार की कहानी काफ़ी दिलचस्प है.
इसका आविष्कार विल्सन ग्रेटबेच नामक शख़्स ने किया जो दिल की धड़कनें सुनना चाहते थे. लेकिन इस कोशिश में वह बुरी तरह फेल हुए.
जब उन्होंने दिल की इलेक्ट्रिकल तरंगों को सुनने की कोशिश की तो इस प्रक्रिया में उन्होंने गलत रेसिस्टर इस्तेमाल किया. और इस मशीन से विद्युत तरेंगे रिकॉर्ड करने की जगह उन्होंने इससे इलेक्ट्रिकल तरंगे जारी करना शुरू कर दिया.
इस तरह उन्होंने ग़लती से पेसमेकर का आविष्कार कर दिया. और इस डिवाइस ने पिछले साठ सालों में लाखों लोगों की ज़िंदगियां बचाई है. ग्रेटबैच की कंपनी आज भी दुनिया भर में इस्तेमाल किए जा रहे पेसमेकर डिवाइसों में से 90 फीसद डिवाइसों की बैटरियां बना रही है. अपनी एक ग़लती से दुनिया भर में लाखों लोगों को लंबी ज़िंदगी देने वाले ग्रेट बैच खुद भी 92 साल की उम्र तक जिए.
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