ओमिक्रॉनः कैसे पता चलेगा कि हम कोरोना संक्रमित हो गए?

भारत समेत सारी दुनिया में इन दिनों कोरोना की नई लहर की चर्चा है. हर दिन नए मामलों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही है. मौजूदा लहर के लिए कोरोना वायरस के जिस वेरिएंट को ज़िम्मेदार बताया जा रहा है उसका नाम है ओमिक्रॉन.

विशेषज्ञों का कहना है कि संतोष ये है कि ओमिक्रॉन से लोग उस गंभीरता से बीमार नहीं हो रहे जैसा कि पिछले वेरिएंट ख़ासकर डेल्टा से होने वाले संक्रमण के दौरान दिखा था. लेकिन ओमिक्रॉन से होने वाला संक्रमण बहुत तेज़ी से फैलता है. इस वजह से ही बड़ी संख्या में लोगों को सोशल डिस्टैंसिंग का पालन करने की सलाह दी जा रही है. आइए समझते हैं कि क्या हैं इसके लक्षण.

ओमिक्रॉन के लक्षण क्या हैं?

ओमिक्रॉन से संक्रमित होने वाले ज़्यादातर लोगों को लगता है कि जैसे उन्हें ठंड लग गई है. गले में ख़राश, नाक बहने की दिक्कत और सिरदर्द होता है.

इससे पहले के कोरोना के वेरिएंट्स से संक्रमित होने पर अक्सर ऐसा होता था कि लोगों की सूँघने की शक्ति या स्वाद चला जाता था, या खांसी होती थी और तेज़ बुख़ार होता था.

हालाँकि, आधिकारिक तौर पर अभी भी इन्हीं तीन लक्षणों को कोरोना के निश्चित लक्षण माना जाता है.

ओमिक्रॉन कोरोना के पिछले ख़तरनाक वेरिएंट डेल्टा की तुलना में बहुत तेज़ी से फैलता है. लेकिन, इसके बावजूद स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है ओमिक्रॉन वैसा गंभीर नहीं, और इस बात की संभावना बहुत कम है कि संक्रमित व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ जाए.

इसकी मुख्य वजह ये है कि या तो लोगों को वैक्सीन लग चुकी है, या फिर उन्हें पहले ही संक्रमण हो चुका है, जिससे कि उनके शरीर में प्रतिरोधी क्षमता विकसित हो जाती है.

ओमिक्रॉन का पता सबसे पहले दक्षिण अफ़्रीका में चला था, मगर समझा जाता है कि वहाँ अब इसका पीक गुज़र चुका है.

ब्रिटेन में भी ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि शायद पीक की स्थिति आ चुकी है. मगर वहाँ जानकारों का कहना है कि मुश्किल तब हो सकती है जब ओमिक्रॉन बड़ी संख्या में बूढ़े लोगों को या ऐसे लोगों को संक्रमित करना शुरू करेगा जिनकी सेहत को किसी तरह का ख़तरा होता है.

ओमिक्रॉन का टेस्ट कैसे होता है

इसकी पुष्टि आरटी-पीसीआर टेस्ट से ही हो सकती है जिसमें लार के नमूने को पैथोलॉजी लैब्स में भेजा जाता है. वहाँ पता चल सकता है कि ये संक्रमण ओमिक्रॉन का है, या डेल्टा का या किसी और चीज़ का.

वैसे अगर केवल ये पता करना हो कि कोरोना संक्रमण है या नहीं, तो इसके लिए रैपिड टेस्ट भी किया जा सकता है. मगर यदि टेस्ट का नतीजा पॉज़िटिव रहता है तो भी इससे ये पता नहीं चल सकता कि ये ओमिक्रॉन है, या डेल्टा, या कुछ और.

अब अगर ओमिक्रॉन की पुष्टि के लिए टेस्ट किया गया, तो उसका नतीजा कितनी जल्दी मिल सकता है, ये इस बात पर निर्भर करता है कि उस इलाक़े में जाँच करने वाले लैब्स में से कितने के पास ओमिक्रॉन की जाँच की तकनीक उपलब्ध है.

मिसाल के तौर पर, ब्रिटेन जैसे देश में आधे से भी कम लैब्स के पास ये तकनीक है. भारत में भी हर इलाक़े के हर लैब में ये सुविधा नहीं है.

ओमिक्रॉन की पुष्टि के लिए जीनोम सिक्वेंसिंग यानी जेनेटिक एनालिसिस ज़रूरी होती है, जिसमें चार से पाँच दिन लगते हैं.

भारत में इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च के महानिदेशक डॉक्टर बलराम भार्गव ने 5 जनवरी को कहा है कि आईसीएमआर ने टाटा एमडी के साथ मिलकर एक टेस्टिंग किट बना है जो चार घंटे में नतीजे दे देगा. इस टेस्टिंग किट को डीसीजीआई ने मंज़ूरी दे दी है.

ओमिक्रॉन का वेरिएंट दूसरों से कैसे अलग है?

वायरस लगातार म्यूटेट करते हैं, यानी वो लगातार रूप बदलते रहते हैं, यानी उनका नया वर्ज़न आता रहता है. इसी को वेरिएंट कहते हैं.

इनमें कुछ वेरिएंट ज़्यादा ख़तरनाक हो सकते हैं, या ऐसे हो सकते हैं जो बहुत तेज़ी से फैलते हैं.

वैज्ञानिकों की शब्दावली में इन्हें वेरिएंट्स ऑफ़ कन्सर्न (VoC) यानी 'चिंता का विषय' माना जाता है.

ओमिक्रॉन भी एक (VoC) है, क्योंकि इसमें ऐसे बदलाव हुए हैं जिन्हें पहले कभी नहीं देखा गया.

इनमें से ज़्यादार बदलाव वायरस के उन हिस्सों में हुए हैं जहाँ मौजूदा वैक्सीन हमला करते हैं. वायरस के इस हिस्से को स्पाइक प्रोटीन कहा जाता है.

वैक्सीन का असर होगा?

ओमिक्रॉन वेरिएंट के स्पाइक प्रोटीन वाले हिस्से में हुए बदलाव की वजह से शुरू में ऐसी चिंता हुई कि शायद अभी जो वैक्सीन हैं वो ओमिक्रॉन पर बेअसर हो जाएँगे.

मगर ब्रिटेन की स्वास्थ्य सुरक्षा एजेंसी ने इस बारे में अपनी रिसर्च में पाया कि अगर बूस्टर वैक्सीन यानी वैक्सीन की अतिरिक्त डोज़ ली जाए, तो 88% सुरक्षा बढ़ जाती है यानी अस्पताल पहुँचने की नौबत नहीं रहती. ये पिछले वेरिएंट्स से लड़ने की वैक्सीनों की क्षमता से बहुत मामूली ही कम है.

ब्रिटेन में एक और अध्ययन में पता चला है कि डेल्टा वेरिएंट की तुलना में ओमिक्रॉन से संक्रमित होने वाले लोगों के अस्पताल पहुँचने का ख़तरा लगभग आधा है.

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