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मलेरिया की बनी वैक्सीन, जानिए RTS,S के बारे में सब कुछ
- Author, जेम्स गैलाघर
- पदनाम, स्वास्थ्य एवं विज्ञान संवाददाता, बीबीसी न्यूज़
अफ़्रीका के ज़्यादातर हिस्सों के बच्चों को घातक बीमारी मलेरिया का टीका लगाया जाना है.
यह एक ऐतिहासिक क्षण है. मलेरिया इंसानों के लिए सबसे बड़ी विपत्तियों में से एक है. इसके सबसे ज़्यादा शिकार बच्चे और नवजात होते हैं.
एक सदी से भी ज़्यादा वक़्त की कोशिश के बाद मलेरिया के लिए एक वैक्सीन का बनना, मेडिकल साइंस की बड़ी कामयाबी है. वैक्सीन का नाम RTS,S है. यह छह साल पहले प्रभावी पाई गई थी.
घाना, कीनिया और मलावी में शुरुआती जाँच में सफल पाए जाने के बाद अब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि सब-सहारन अफ़्रीका और मलेरिया ग्रस्त अन्य इलाक़ों में टीकाकरण शुरू किया जा सकता है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेड्रोस एडहोनम गेब्रियेसस ने कहा है कि यह ऐतिहासिक क्षण है. उन्होंने कहा, ''बच्चों के लिए बहुप्रतीक्षित मलेरिया वैक्सीन विज्ञान की अहम खोज है. यह बच्चों की सेहत और मलेरिया नियंत्रण के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण है. हर साल लाखों बच्चों की जान बचाई जा सकती है.''
मलेरिया एक परजीवी है जो ब्लड सेल्स पर हमला करता है, उसे नष्ट करता है और अपनी संख्या बढ़ाता है. इसके बाद मलेरिया पीड़ितों को काटने वाले मच्छर दूसरों में मलेरिया फैलाते हैं.
दवाइयों से परजीवियों को मारा जाता है. इसके अलावा मच्छरदानी के इस्तेमाल से मच्छरों के काटने से बचा जा सकता है. कीटनाशक से मच्छर मारे जाते हैं. इन सभी उपायों से मलेरिया के ख़तरों को कम किया जाता है.
अफ़्रीका के लिए अभिशाप
लेकिन अफ़्रीका के लिए मलेरिया सबसे बड़ी बीमारी है. मलेरिया से 2019 में अफ़्रीका में दो लाख 60 हज़ार बच्चों की मौत हुई. मलेरिया को लेकर इम्युनिटी विकसित करने में वर्षों लगे और इससे केवल गंभीर रूप से बीमार होने के ख़तरों को कम करने में मदद मिली.
डॉक्टर क्वामे अम्पोन्सा-अचिनाओ ने घाना में वैक्सीन का पायलट परीक्षण किया कि क्या बड़े पैमाने पर टीकाकरण संभव है और यह कितना प्रभावी होगा.
उन्होंने कहा, ''यह हमलोगों के लिए काफ़ी उत्साहजनक है. बड़े पैमाने पर टीकाकरण से मलेरिया पीड़ितों की संख्या कम होगी और इसके ख़तरे भी कम होंगे.''
डॉक्टर क्वामे अम्पोन्सा बचपन में मलेरिया से कई बार पीड़ित हुए थे और इसी से उन्हें डॉक्टर बनने की प्रेरणा मिली.
उन्होंने बीबीसी से कहा, ''यह बहुत परेशान करने वाला होता है कि हर हफ़्ते आप स्कूल से बाहर हो जाते हैं. मलेरिया लंबे समय से हम पर भारी पड़ रहा था.''
बच्चों की जान की सुरक्षा
मलेरिया के परजीवी के 100 से भी ज़्यादा प्रकार हैं. RTS,S वैक्सीन सबसे जानलेवा और अफ़्रीका में सबसे कॉमन प्लाज़्मोडियम फ़ैल्सीपैरम पर असरकारी है. 2015 के ट्रायल से पता चलता है कि ये वैक्सीन मलेरिया के 10 मामलों में से चार को बचाने में कामयाब रही.
10 में से तीन गंभीर मामले थे और जिन बच्चों का ख़ून बदलने की ज़रूरत पड़ती थी,उनमें एक तिहाई की गिरावट आई.
हालाँकि इस बात को लेकर शक़ था कि क्या वैक्सीन असल दुनिया में काम करेगी या नहीं क्योंकि असरदार होने के लिए चार डोज़ की ज़रूरत पड़ेगी. पहली तीन ख़ुराक़ बच्चे के पाँच, छह और सात महीने का होने पर लगेगी और आख़िरी बूस्टर डोज़ 18 महीने का होने पर लगेगी. ट्रायल के नतीजों पर बुधवार को विश्व स्वास्थ्य संगठन के दो विशेषज्ञ एडवाइज़री ग्रुप ने चर्चा की थी.
23 लाख से ज़्यादा ख़ुराक़ के नतीजे ये हैं-
- वैक्सीन सुरक्षित है और गंभीर मलेरिया के ख़तरे को 30 फ़ीसदी कम कर देती है
- सोते वक़्त मच्छरदानी नहीं लगा पाने वाले दो तिहाई से ज़्यादा बच्चों तक वैक्सीन पहुँची है
- वैक्सीन लगाने के बाद मरीज़ में किसी भी तरह का कोई नकारात्मक असर नहीं होता है
- वैक्सीन किफ़ायती है
विश्व स्वास्थ्य संगठन में वैश्विक मलेरिया कार्यक्रम के निदेशक डॉक्टर पेड्रो अलोंसो ने कहा, ''विज्ञान की कसौटी पर यह एक अहम खोज है और सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से यह ऐतिहासिक कमाल है. हमलोग सौ से ज़्यादा सालों से मलेरिया की वैक्सीन का इंतज़ार कर रहे थे. अब वैक्सीन अफ़्रीकी बच्चों की जान बचाएगी और गंभीर रूप से पीड़ित होने के ख़तरों को कम करेगी.''
मलेरिया को हराना मुश्किल क्यों?
कोविड-19 की वैक्सीन बहुत जल्दी बना ली गई, लेकिन मलेरिया की वैक्सीन बनाने में इतना वक़्त क्यों लगा? मलेरिया एक परजीवी के कारण होता है और यह वायरस से ज़्यादा घातक और जटिल होता है.
जैसेकि इनसान और पत्तागोभी बिल्कुल अलग हैं वैसे ही कोविड और मलेरिया हैं. मलेरिया परजीवी ने हमारे इम्यून सिस्टम पर हमला करके ख़ुद को लगातार बदला है. इसी वजह से मलेरिया को लेकर लगातार सतर्क रहने और निगरानी की ज़रूरत है.
इंसानों और मच्छरों में मलेरिया परजीवी का जीवन चक्र बहुत जटिल होता है. ये परजीवी हमारे शरीर के भीतर भी बदलते रहते हैं और लीवर सेल्स के साथ रेड ब्लड सेल्स को संक्रमित करते हैं.
मलेरिया की वैक्सीन बनाना अंधेरे में तीर चलाने की तरह है. RTS,S वैक्सीन केवल मलेरिया परजीवी के स्पोरोज़ोइट फ़ॉर्म को निशाना बनाने में ही सक्षम है. स्पोरोज़ोइट फ़ॉर्म मच्छर के काटने और परजीवी के लीवर तक पहुँचने के बीच का वक़्त होता है.
इसलीलिए यह वैक्सीन केवल 40 फ़ीसदी ही प्रभावी है. हालाँकि फिर भी यह ऐतिहासिक सफलता है और एक प्रभावी वैक्सीन बनाने की दिशा में अहम क़दम है.
वैक्सीन फ़ार्मा कंपनी जीएसके (ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन) ने बनाई है. हालाँकि वैक्सीन आने के बाद ऐसा नहीं है कि अब मलेरिया से बचने के लिए मच्छरदानी की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. मलेरिया से मौत को शून्य करने के लिए सभी उपायों को साथ में अपनाना होगा.
इस वैक्सीन का इस्तेमाल अफ़्रीका के बाहर नहीं हो पाएगा क्योंकि वहाँ मलेरिया के दूसरे रूप की मौजदूगी ज़्यादा है और इन पर वैक्सीन प्रभावी नहीं होगी.
पाथ मलेरिया वैक्सीन इनिशिएटिव के डॉक्टर एश्ली ब्रिकेट का कहना है कि टीकाकरण ऐतिहासिक पल है और इससे मलेरिया का डर दूर होगा.
उन्होंने बताया, ''कल्पना कीजिए कि आपका बच्चा पूरी तरह से स्वस्थ है लेकिन एक दिन दोस्तों के साथ खेलते वक़्त या सोते वक़्त एक संक्रमित मच्छर उसे काट लेता है तो कुछ हफ़्तों में उसकी जान जा सकती है. मलेरिया बहुत बड़ी समस्या है. यह डरावना है.''
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