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'कोरोना वैक्सीन नहीं लेना मेरी सबसे बड़ी ग़लती'
कई दूसरे अस्पतालों की तरह, ब्रिटेन के ब्रैडफोर्ड रॉयल इन्फर्मरी में कोविड -19 के इलाज के लिए मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. आने वाले मरीज़ों में से लगभग आधे ने टीका नहीं लेने का विकल्प चुना था, जिसका अब इनमें से कई लोगों को अफ़सोस है.
54 साल के फैसल बशीर, जो काफ़ी फ़िट हैं, कहते हैं, ''मुझे वैक्सीन की पेशकश की गई थी, लेकिन मैं नहीं लेना चाहता था."
"मैं जिम जा रहा था, साइकिल चला रहा था, पैदल चल रहा था और दौड़ रहा था. मुझे लगा मैं मजबूत और स्वस्थ था, मुझे वैक्सीन की ज़रूरत नहीं थी. मैं ये भी सोच रहा था कि अगर यह सुरक्षित नहीं हुआ, तो मैं कोई जोखिम नहीं लेना चाहता."
"लेकिन सच्चाई यह थी कि मैं वायरस से बच नहीं सका. मैं इसका शिकार हो गया, पता नहीं कैसे और कहाँ."
बशीर को ऑक्सीजन देनी पड़ी. एक सप्ताह अस्पताल में रहने के बाद बुधवार को उन्हें छुट्टी दे दी गई थी. वो सोशल मीडिया पर चल रही बातों से और अखबार में रक्त के थक्कों के जोखिम (जो कि बहुत कम है) के बारे में रिपोर्टों से प्रभावित हो गए थे.
लेकिन अब वह दूसरों को यही गलती नहीं करने की चेतावनी दे रहे हैं.
वो कहते हैं, "मैंने अस्पताल में जो अनुभव किया है - देखभाल और एक्सपर्टीज़, इससे मेरे अंदर विनम्रता आई."
"लोग जोखिम उठाकर रहे हैं जिसके कारण अस्पताल भर रहे हैं और यह गलत है. मुझे बहुत बुरा लग रहा है. मुझे इसके बारे में बहुत बुरा लग रहा, बहुत बुरा, मुझे उम्मीद है कि इसके बारे में बात कर मैं दूसरों को इससे बचाने में मदद कर सकता हूं"
वैक्सीन नहीं लेने वाले हो रहै हैं प्रभावित
डॉक्टर आबिद अजीज छह घंटे वार्ड चक्कर के बाद कहते हैं, "वार्ड के लगभग आधे रोगियों का टीकाकरण नहीं हुआ है - मैंने उनसे पूछना बंद कर दिया है, क्योंकि वे स्पष्ट रूप से शर्मिंदा हैं."
" पिछली गर्मियों के बाद, पिछले महीने पहली बार, अस्पतालों में कोविड मरीज़ों की संख्या 10 से कम हुई थी. इस सप्ताह ये 50 के क़रीब है, क्योंकि डेल्टा वैरिएंट फैल रहा है. जैसे कि लंबे समय से देखा जा रहा है, वायरस के शिकार युवाओं की संख्या बढ़ रही है, टीनएजर मरीज़ भी बढ़ रहे हैं, और 20 से 30 साल के बीच के लोग भी. हालांकि इनमें से बहुतों को अस्पताल आने की ज़रूरत नहीं पड़ती लेकिन पहले 30 से 50 साल के लोगों की संख्या अधिक होती थी, अब औसत आयु कम है."
"कुछ को दोनों टीके लगे हैं और इसलिए उनपर बीमारी का असर कम है, वे सीपैप पर जीवित हैं, अगर वैक्सीन नहीं ली होती तो शायद वो नहीं बच पाते. "
"दूसरों ने अभी अपनी पहली खुराक ली है और इसलिए पूरी तरह से सुरक्षित नहीं हैं. लेकिन चिंता इस बात की है कि आज वार्ड में मौजूद लगभग आधे रोगियों को टीका नहीं लगाया गया है. मैंने उनसे पूछना बंद कर दिया है, क्योंकि वे स्पष्ट रूप से शर्मिंदा हैं."
'जिंदा रहना कितना प्यारा है'
दो छोटे बच्चों के पिता 60 वर्षीय विज्ञान शिक्षक अब्दुर्रहमान फादिल को भी काफ़ी पछतावा है.
उन्हें टीकों से डर लग रहा था क्योंकि इन्हें बहुत तेज़ी उन्हें रोल आउट किया गया था. ब्रैडफोर्ड में लगभग तीन-चौथाई वयस्क आबादी को वैक्सीन की पहली खुराक मिली है, जबकि देश भर में यह आकड़ा 87% है.
फादिल नौ दिनों के लिए आईसीयू में थे. 1985 में मोरक्को से आने के बाद पहली बार उन्होंने अस्पताल में रात बिताई थी.
वो कहते हैं,"जिंदा रहना बहुत प्यारा है."
"मेरी पत्नी ने टीका लिया, मैंने नहीं लिया. मेरा मन नहीं था. मैं खुद को समय दे रहा था, मैं सोच रहा था. मुझे लग रहा था कि मैं अपने जीवन में वायरस, बैक्टीरिया के साथ रहा हूँ, और मेरी प्रतिरक्षा प्रणाली काफी अच्छी है. महामारी की शुरुआत में मुझमें कोविड के लक्षण थे, मैंने सोचा कि शायद मैं संक्रमित हो चुका हूं. मुझे लगा कि मेरी प्रतिरक्षा प्रणाली वायरस को पहचान लेगी और मैं बच जाऊंगा."
"यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी गलती थी. इसने मुझे लगभग मार दिया था. मैंने अपने जीवन में कई मूर्खतापूर्ण निर्णय लिए हैं, लेकिन यह सबसे खतरनाक और गंभीर था"
फादिल को करीब एक महीने पहले अस्पताल से छुट्टी मिली लेकिन अभी भी वो पूरी तरह ठीक नहीं हैं.
"काश, मैं हर उस व्यक्ति के पास जा पाता, जो टीका लगाने से इनकार करता है और कहता कि देखो ये जीवन और मृत्यु का मामला है. आप जीना चाहते हैं या मरना चाहते हैं? अगर जीना चाहते हैं तो जाएं और टीका लगा लें"
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