कोरोना वायरस: वैक्सीन के बाद भी क्यों समाप्त नहीं होगा ख़तरा?

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कोरोना वायरस से मुक़ाबले के लिए भले ही कई देशों ने वैक्सीन तैयार कर ली है, लेकिन क्या आपको लगता है कि इतना प्रयास कोरोना वायरस संक्रमण के ख़तरे को हमेशा के लिए ख़त्म करने के लिए पर्याप्त है?

कुछ वैज्ञानिकों ने मेडिकल जर्नल द लांसेट में अपनी राय ज़ाहिर की है. वैज्ञानिकों के मुताबिक़, जब तक ग़रीब देशों में भी वैक्सीन सुलभ नहीं होती और लोगों को वैक्सीन नहीं लगती, कोरोना महामारी के ख़त्म होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है.

द लांसेट में प्रकाशित इस लेख में कहा गया है कि कोरोना वायरस को समाप्त करने के लिए बहुत बड़ी संख्या में वैक्सीन डोज़ेज़ की ज़रूरत है. लेकिन ग़रीब देश आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं और अमीर देश बड़ी संख्या में इसे ख़रीद ले रहे हैं.

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'वैक्सीन नेशनलिज़्म' से ख़तरा?

विशेषज्ञ चाहते हैं कि वैक्सीन का उत्पादन बढ़े ताकि वैक्सीन के दाम कम हों.

'वैक्सीन नेशनलिज़्म' लोगों की ज़िंदगियों को ख़तरे में डाल रही है और यह दुनिया के लिए एक नई चेतावनी भी है.

पिछले साल संयुक्त राष्ट्र महासभा में, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने इस संबंध में कहा था कि हममें से कोई भी सुरक्षित नहीं है, जब तक की हम सभी सुरक्षित नहीं हों.

मेडिकल जर्नल लांसेट के इस लेख के अनुसार, जैसे-जैसे ये ख़तरा बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ही वैक्सीन की उपलब्धता भी घटेगी. वैक्सीन उपलब्ध नहीं होगी तो वायरस के म्यूटेट होने का ख़तरा भी समय के साथ बढ़ता जाएगा.

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लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से संबद्ध और इस लेख के प्रमुख लेखक ओलिवियर वाउटर्स के मुताबिक़, "जब तक कोविड वैक्सीन को समान रूप से वितरित नहीं किया जाता, तब तक कोरोना वायरस पर वैश्विक नियंत्रण कर पाने में कई साल लग जाएंगे."

अमीर देशों के पास 70 फ़ीसदी वैक्सीन की ख़ुराक़

कोरोना वायरस को लेकर जो सबसे ख़ास बात है वो ये कि इससे लड़ने के लिए वैक्सीन बहुत जल्दी तैयार कर ली गई है. कुछ देशों ने तो एक साल से भी कम समय में वैक्सीन तैयार कर ली. यह अपने आप में काफी महत्वपूर्ण है.

मेडिकल जर्नल लांसेट के कुछ लेखों में इसके लिए ''असाधारण'' शब्द का इस्तेमाल किया गया है.

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लेकिन दुनिया के अलग-अलग देशों में तैयार अलग-अलग ख़ुराकों की क़ीमतों में काफ़ी अंतर है. सबसे सस्ती ख़ुराक 5 डॉलर की है तो सबसे महंगी ख़ुराक़ 60 डॉलर से भी अधिक की.

कुछ वैक्सीन ऐसी हैं जिन्हें रूम-टेंपरेचर पर रखा जा सकता है तो कुछ ऐसी हैं, जिन्हें बेहद कम तापमान पर रखना होता है और जिनके लिए विशेष उपकरण की आवश्यकता होती है.

वैक्सीन कैसे लगेगी ये तय करना भी एक बड़ी चुनौती है क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के कुछ सदस्यों के पास वयस्कों में टीकाकरण करने का अनुभव नहीं है. क्योंकि उन्होंने कभी भी वयस्कों में टीकाकरण कार्यक्रम नहीं किया है.

एक समस्या यह भी है कि अमीर देश थोक के भाव में वैक्सीन ख़रीद रहे हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार, अनुमान लगाया गया है कि कुल मौजूद वैक्सीन का 70 फ़ीसदी इन अमीर देशों के पास है.

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विशेषज्ञों ने इसे लेकर चेतावनी जारी की है. उनका कहना है कि अगर ऐसा होता है तो ग़रीब देशों में वैक्सीन की किल्लत हो जाएगी. साथ ही जो देश मध्यम-वर्गीय आय वाले हैं वहां भी वैक्सीन पहुंचने में सालों लग जाएंगे.

इसके मुताबिक़, "इतिहास में इतनी तादाद में कभी भी वैक्सीन की ज़रूरत नहीं हुई होगी, जितनी संख्या में कोविड के लिए चाहिए."

लेखकों की राय है कि कि जैसे-जैसे दूसरी वैक्सीन्स को अप्रूवल मिलता जाए उन्हें स्थानीय ज़रूरतों के हिसाब से मुहैया कराना चाहिए. उदाहरण के तौर पर ग़रीब देशों को ऐसी डोज़ उपलब्ध करायी जानी चाहिए जिसमें वैक्सीन का डोज़ एक ही बार लेना हो. क्योंकि वहां कई सप्लाई-चेन या रजिस्टरी की सुविधाओं का अभाव होता है.

BBC ISWOTY

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