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#आत्महत्यारोकथामदिवस: 'मैंने आत्महत्या को महसूस किया है और मैं वो मजबूरी समझती हूं'
- Author, फ़र्नैंडो डुआर्टे
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
एरिको कोबायाशी ने 2018 में अपना भाषण ख़त्म ही किया था कि दर्शकों में से एक महिला उनके पास पहुंची. यह महिला उम्र के 20वें दशक में थी.
उनके बारे में कोयाबाशी ने बीबीसी को बताया, "खुद को मारने की कोशिश करने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था. उन्होंने एक प्रोत्साहित करने वाले संदेश के साथ मुझे एक अंगूठी बतौर गिफ्ट दी. हमने एक-दूसरे को गले लगाया."
कोबायाशी एक कॉमिक बुक "डायरी ऑफ माय डेली फेल्यर्स" की लेखिका हैं जिसे 2017 में पहली बार रिलीज किया गया था. यह जापानी कॉमिक की मांगा विधा में तैयार की गई है.
इस किताब में कोबायाशी का एक सुसाइड सर्वाइवर के तौर पर अनुभव बताया गया है. उन्हें उम्मीद है कि इससे जोखिम वाले पाठक और अन्य लोग अपनी सबसे ख़राब दौर की भावनाओं को साझा करेंगे और इससे वे कैसे उबरे, इसे बताएंगे.
बीबीसी ने 10 सितंबर को वर्ल्ड सुसाइड प्रीवेंशन डे से पहले लेखिका से बात की और उनके काम और इससे दूसरों को कैसे मदद मिल सकती है, इस बारे में जानने की कोशिश की.
अपने मानसिक स्वास्थ्य और वित्तीय दिक्कतों के चलते कोबायाशी को अपनी जान लेने की कई मर्तबा कोशिश करनी पड़ी. तब वे महज 21 साल की थीं.
कोबायाशी मानती हैं कि उनकी दिक्कतें बचपन से ही शुरू हो गई थीं. वे कहती हैं कि जब वे बड़ी हो रही थीं तब उन्हें हिंसा और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा था.
मांगा विधा के जरिए उन्होंने अपने अंदर मौजूद "शैतान" की चर्चा की है और उन्होंने इसमें अस्पताल के दौरों का ज़िक्र किया है.
वे बताती हैं, "ऐसे हालात पैदा हो गए थे जहां मैं सो नहीं पाती थी और मुझे लगातार बुरे सपने आते थे."
"मेरे पेरेंट्स मुझे कई डॉक्टरों के पास ले गए, लेकिन किसी भी चीज से मुझे फायदा होता नहीं दिखा."
धमकाया जाना और चोरी
कोबायाशी को स्कूल में परेशान किए जाने से भी जूझना पड़ा. वे कहती हैं, "मेरे पिता की कमाई ज़्यादा नहीं थी. ऐसे में मुझे बमुश्किल ही स्कूल के कपड़े मिल पाते थे. सर्दियों में मुझे उन्हीं कपड़ों को बार-बार पहनना पड़ता था और इससे मैं दूसरे बच्चों का आसान शिकार बन जाती थी."
कोबायाशी ने अपनी यूनिवर्सिटी की पढ़ाई 90 के दशक के मध्य में पूरी कर ली. उस वक्त जापान में युवा लोगों के लिए रोजगार के ज्यादा मौके नहीं थे. इसे "रोज़गार का शीत युग" कहा जाता था.
जब उन्हें टोक्यो की एक पब्लिशिंग कंपनी में नौकरी मिली तो उन्हें कई घंटों तक काम करना पड़ता था और इसके बदले मामूली पगार मिलती थी.
उनकी वित्तीय स्थिति खराब थी और यहां तक कि उन्हें अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए सुपरमार्केट्स से खाने-पीने की चीजें चोरी तक करनी पड़ती थीं.
उसके बाद कोबायाशी ने पहली बार अपनी जान लेने की कोशिश की.
सौभाग्य से उनके एक दोस्त ने उन्हें उनके फ्लैट में बेहोश पाया. उन्हें अस्पताल ले जाया गया. हालांकि, तीन दिन बाद जाकर ही उनकी बेहोशी खत्म हुई.
खुदकुशी के हर साल 8 लाख मामले
आत्महत्या पूरी दुनिया में एक समस्या है और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अनुमान लगाया है कि हर साल करीब 8 लाख लोग आत्महत्या कर लेते हैं.
विकसित देशों में जापान सबसे ऊंची आत्महत्या दर वाले देशों में है. हालांकि, जापान में हर साल होने वाली कुल मौतों की संख्या गिर रही है, लेकिन युवा लोगों की मौत के मामले बढ़ रहे हैं.
सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि 10-14 साल की उम्र के बच्चों में मौत की एक बड़ी वजह आत्महत्या है.
2019 में 20 साल से कम उम्र के लोगों में आत्महत्या के मामले अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए थे. जापानी अधिकारियों ने 1970 के दशक से ये रिकॉर्ड रखना शुरू किया है.
इस खास हालात की वजह से कोबायाशी ने अपने संघर्ष को मांगा के रूप में प्रकाशित करने का फैसला किया.
"मेरा अनुभव बेहद निजी है, लेकिन मैं सोचती हूं कि लोगों को इनके बारे में पता चलना चाहिए."
एक निरंतर संघर्ष
कोबायाशी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों और आत्महत्या की जटिलताओं का एक उदाहरण हैं.
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, आम लोगों में पहले की गई कोशिश आत्महत्या के लिए सबसे अहम जोखिम वाला फैक्टर साबित होती है.
आत्महत्या की पहली कोशिश के 20 साल बाद भी कोबायाशी अभी तक आत्महत्या के विचारों से जूझ रही हैं.
वे कहती हैं, "जब मैं अकेला महसूस करती हूं और दफ्तर में चीजें ठीक नहीं होती हैं तो मेरे अंदर मरने की इच्छा पैदा होने लगती है."
कोबायाशी को अभी भी मनोचिकित्सक की जरूरत पड़ती है और इन विचारों से उबरने के लिए एक रुटीन विकसित करना पड़ा है.
वे कहती हैं, "जब ऐसे ख्याल आते हैं तो मैं अच्छी नींद लेने, मिठाइयां खाने और अच्छी सुंगध सूंघने की कोशिश करती हूं ताकि मुझे अच्छा लगे. साथ ही मैं कोशिश करती हूं कि ज्यादा वक्त तक अकेली न रहूं."
इसी वजह से उन्हें अपने प्रशंसकों से मिलकर काफी अच्छा लगता है. वे कहती हैं, "मैंने आत्महत्या को महसूस किया है और मैं दर्द और मजबूरी को अच्छी तरह से समझती हूं."
"जब ऐसे लोग आपसे मिलते हैं जो खुद भी आत्महत्या की कोशिश कर चुके हैं तो मुझे लगता है कि मेरा ज़िंदा रहना बेकार नहीं गया."
साझा अनुभव
वे मानती हैं कि दूसरे लोगों के अनुभव से भी आत्महत्या करने की सोच रहे लोगों को ऐसा करने से रोकने में मदद मिलती है. यह काउंसलिंग और दवाओं जैसे पारंपरिक उपायों के ही केवल इस्तेमाल करने की जगह एक अच्छा विकल्प है.
कोबायाशी कहती हैं, "जापान में बड़ी तादाद में साइकियाट्रिक बेड्स हैं और बड़े पैमाने पर दवाइयां लिखी जाती हैं. लेकिन, जो शख्स अपनी जान लेने की कोशिश कर चुका है वह दूसरों को अपने दिल की बात बताने से डरता है क्योंकि उसे लगता है कि कोई भी उसकी बात को समझेगा नहीं."
वे कहती हैं, "खराब पारिवारिक संबंध, वित्तीय दिक्कतें, अकेलापन जैसी कई समस्याएं लोगों के सामने होती हैं. ये दिक्कतें सुलझाना आसान नहीं होता है."
वे कहती हैं, "आत्महत्या की सोच रहे किसी शख्स के मकसद को नजरअंदाज करना इसका हल नहीं है. जो वह सोच रहा है उसे समझने की कोशिश की जानी चाहिए और उसकी मदद करनी चाहिए."
"मैंने पाया है कि बाहर जाने, अपने सहयोगियों से मिलने और दोस्तों से बातें करना काफी महत्वपूर्ण होता है."
पारिवारिक तनाव
इसके बावजूद कोबायाशी का काम खुद ही विवाद का ज़रिया रहा है. मांगा से पहले वे अपनी दिक्कतों को लेकर एक किताब लिख चुकी थीं. लोगों तक अपनी बात पहुंचाना उनके पिता को पसंद नहीं आया.
"मेरे पिता इस बात के खिलाफ थे कि मैं अपने संघर्ष के बारे में आम लोगों को बताऊं. हमारे संबंध अच्छे नहीं रहे और 10 साल से मैंने उन्हें नहीं देखा है."
उनके पिता क्या सोचते होंगे इसे लेकर कोबायाशी ज्यादा फिक्र नहीं करती हैं.
"जब मैं छोटी थी तब मैं आर्ट स्कूल जाना चाहती थी, लेकिन मेरे पिता ने इसका विरोध किया. दूसरी ओर, मेरी मां मेरे आम लोगों के बीच जाने और बोलने से काफी खुश होती हैं."
यह कॉमिक बुक अंग्रेज़ी समेत कई भाषाओं में अनुदित हो चुकी है.
महामारी से सबक
जापान के अधिकारियों ने इस साल की शुरुआत में ऐलान किया था कि पिछले साल के मुकाबले इस साल अप्रैल में आत्महत्या के मामलों में गिरावट आई है.
मेंटल हेल्थ से जुड़ी संस्थाएं बताती हैं कि इस गिरावट को अस्थाई माना जाना चाहिए क्योंकि यह स्कूलों के बंद होने और कामकाजी घंटों के कम होने की वजह से हो सकता है.
कोबायाशी कहती हैं, "सामान्य वक्त में सुसाइड की दर फिर से बढ़ सकती है."
कोबायाशी का मानना है कि महामारी ने अपने मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल को लेकर सजग रहने का सबक दिया है.
"लोग अब स्कूलों या दफ्तर में ज्यादा काम करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं और इस तरह से उनके जीवन में पहले के मुकाबले शांति है."
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